औषधि सतावरी(Asparagus)
May 21st, 2011

सतावरी

सतावरी एक चमत्कारीक औषधि है जिसका भारत में हजारों वर्षो से आयुर्वेदिक चिकित्सा में प्रयोग किया जाता रहा  है। सतावरी  एक प्राकृतिक बेल है जो औषधीय प्रयोग के साथ साथ हर घर, बगीचे में सुन्दरता के लिए और बंजड पड़े जंगल में भी पाई जाती है, सतावरी की जड़ें पत्ते व नई कोपले सब हमारे लिए बहुत उपयोगी होती हैं।लेकिन जड़ का महत्व इन सब से अधिक है। अधिकतर जड़ों को ही औषधि के रूप में इस्तेमाल किया जाता हैं। सतावरी का स्वाद फीका होता है। नई निकली कोपलो से स्वादिस्ट सब्जी बनाई जाती है। सतावरी के फल मटर जैसे गोल लाल रंग के होते हैं। इस की जड़े लम्बी गोल, उंगली की तरह मोटी मटमैले रंग की होती हैं। सतावरी शीतल व स्निग्ध होती है। शारीरिक ताकत के लिए, कुशाग्र बुद्धि के लिए, स्मरण शक्ति व एकाग्रता बढ़ाने के लिए, पेट की जलन और आंखों के लिए इसका इस्तेमाल किया जाता है। स्त्री के स्तनों में दूध की वृद्धि के लिए स्त्री प्रजनन तंत्र की मजबूती के लिए यह एक बेहतर टानिक है। सतावरी वीर्यवर्धक, बलवर्धक, ठंडा, दूध को बढ़ाने वाली, खून को साफ करने वाली, तथा सूजन आदि को दूर करता है।यह दस्त तथा वातपित्त, गर्भ के विकार श्वेत प्रदर प्रदर रोग नपुंसकता स्वप्नदोष मूत्राघात मूत्रविकार दस्त बुखार मिर्गी अम्लपित्त विषनाशक बवासीर खूनी दस्त हिस्टीरिया श्वास मूर्छा अनिंद्रा सिर का दर्द सूखी खांसी पेट-दर्द ,पक्षाघात सर-दर्द, गठिया, घुटनो का दर्द ,पैर के तलवों में जलन, गर्दन अकड़ना, साइटिका, हाथों में दर्द ,पेशाब संबन्धी रोग, आंतरिक चोट के अलावा शुक्र-वर्धन ,यौन -शक्ति बढ़ाने, महिलाओं के बाँझपन के इलाज के लिए किया जाता है आयुर्वेदिक दवाओं सतावरी धृत, नारी वटी नारायण तेल, विष्णु तेल, सतावरयादी चुर्णू, शत मूल्यादि लौह आदि सतावरी से ही बनती हैं।


  • एक व्यक्ति द्वारा सतावरी की जड का रस 10 से 20 मिलीलीटर इसकी  जड का चूर्ण 3 से 6 ग्राम और जड़ का काढ़ा 50 से 100 मिलीलीटर तक की मात्रा में लिया जाना उपयुक्त होता है।
  1. 5 काली मिर्चों को पीस ले और दो चम्मच सतावरी चूर्ण के साथ मिला ले इसे दो गिलास पानी में उबाल ले इसे छान कर दिन में दो बार ले ने से जुखाम ठीक हो जाता है।
  2. सामान मात्रा में सतावरी और अड़ूसे के पत्ते और मिश्री को पानी में उबालकर दिन में 3 बार पीने से सूखी खांसी ठीक हो जाती है।
  3. सतावरी का काढ़ा बनाए इसमें 1 ग्राम पीपल का चूर्ण मिलाए रोगी को दिन में 2-3 बार  पिलाये  इस से कफ साफ़ होगा और खांसी भी ठीक हो जाएगी।
  4. 10 ग्राम सतावरी पिसी हुई को पांच काली मिर्च के साथ मिलाकर पानी में घोट कर सुबह-शाम पिया जायें तो जुकाम ठीक हो जाता है।
  5. सतावरी की ताजी जड़ का रस और बराबर मात्रा में तिल का तेल मिलाकर उबाल ले ओर इस तेल से सिर पर मालिश करने से सिर का दर्द और आधे सिर का दर्द खत्म हो जाता है।
  6. एक गिलास दूध में 25 ग्राम सतावरी चूर्ण और अदरक का रस मिलाकर उबाले इसे छान कर रोगी को दिन में 2 बार देने से आंखों के सभी रोग ठीक हो जाते हैं।
  7. सतावरी की नए कोपल की सब्जी देसी घी में बनाकर खाने से रतौंधी (रात का अंधापन) समाप्त होता है।
  8. गीली सतावरी को दूध के साथ पीसकर व छानकर दिन में 3-4 बार पीलाने से खूनी दस्त बंद हो जाते हैं।
  9. सतावरी की ताजा जड़ का रस शहद के साथ मिलाकर दिन 2 बार लेने से एसिडिटी का रोग दूर हो जाता है।
  10. गठिया रोग के लिए हर रोज घुटनों पर सतावरी के तेल की मालिश करने से घुटनों का दर्द ठीक होता है।
  11. सतावरी की खीर में घी मिलाकर खाने से अनिंद्रा की समस्या दूर होती है ।
  12. 2 चम्मच सतावरी की जड़ का रस 1 कप दूध के साथ सुबह-शाम सेवन से कुछ महीनो मे ही मिर्गी के रोग मे सुधार आता है।
  13. सतावरी के पत्तों का चूर्ण बनाकर दुगने घी में पकाकर घावों पर लगाने से पुराना घाव भी ठीक हो जाता है।
  14. 2 -2 चम्मच सतावरी और गिलोय के रस में शक्कर मिलाकर खाने से वात-ज्वर खत्म हो जाता है।
  15. या सतावरी और गिलोय के 50 से 60 ग्राम काढ़े में शहद मिलाकर पीने से भी ज्वर खत्म हो जाता है।
  16. धातु वृद्धी के लिए समान मात्रा में सतावरी, अश्वगंधा ,कौंच के बीज, गोखरू और आंवला मिलकर चूर्ण बना लें।एक छोटी चम्मच सुबह-शाम गाय के दूध या पानी के साथ ले। और 10 ग्राम सतावरी चूर्ण दूध मिश्री के साथ मिला कर पीने से वीर्य का पतलापन दूर हो जाता है।
  17. 2 चम्मच सतावरी चूर्ण में शक्कर मिलें दूध के साथ सुबह-शाम पीने से नपुंसकता दूर होती है।
  18. या सतावरी और असगन्ध के 5 ग्राम चूर्ण को दूध में उबाल कर पीने से नपुंसकता ठीक हो जाती है।
  19. 5 ग्राम सतावरी को एक गिलास दूध में धीमी आंच पर मिश्री मिलाकर 5 मिनट तक उबालें, इस दूध को पीने से ही कुछ महीनों में नपुंसकता बिलकुल ठीक हो जाती है। और सहवास की कमजोरी दूर हो जाती है।
  20. शारीरिक ताकत के लिए 250 ग्राम सतावरी की जड़ का चूर्ण और बराबर की मिश्री को पीसकर और एक चम्मच मिश्रण को एक गिलास गुनगुने दूध के साथ सुबह-शाम लेने से स्वप्नदोष  का रोग दूर होकर शरीर मजबूत बनता है।
  21. ताजा सतावरी की जड़ को बीच से चीरकर तिनके को निकाल दें और इसे 200 ग्राम दूध और मिश्री के साथ पिस कर खाएं तो भी धातु में वृद्धि होगी। और दूध के साथ इसके चूर्ण को पका कर खाने से संभोग शक्ति बढ़ती है।
  22. सतावरी या आंवला का रस शहद में मिला कर पीने से जल्द ही वीर्य शुद्ध होने लगता है। अथवा गोखुरू का काढ़ा बनाकर व शहद मिला कर पीने से भी वीर्य शुद्ध हो जाता है।
  23. गोखरू और सतावरी का शर्बत बनाकर पीने से मूत्रविकार ठीक हो जाते हैं। पेशाब के साथ धातु का आना भी बंद हो जाता है।
  24. 25 ग्राम सतावरी के रस में बराबर का गाय का दूध मिलाकर पीने से गुर्दे की पथरी टूट टूट कर पेशाब के रस्ते बाहर निकल जाती है।
  25. 20 ग्राम गोखरू और बराबर का सतावरी चूर्ण को 2 गिलास पानी में उबालकर, छानकर उसमे 10 ग्राम मिश्री और 2 चम्मच शहद मिलाकर पिलाने से रोगी की पेशाब की रूकावट और जलन खत्म हो जाती है।
  26. 5 ग्राम सतावरी के चूर्ण को दूध के साथ रोजाना सेवन करने से बवासीर के मस्से ठीक हो जाते हैं।
  27. 2 चम्मच सतावरी की ताजा जड़ का रस150 ग्राम दूध के साथ सुबह-शाम पीने से हिस्टीरिया ठीक हो जाता है।
  28. एक ग्राम सतावरी चूर्ण में समान मात्रा में घी मिलाकर दूध में उबालकर पीने से मूर्च्छा अम्लपित, रक्त पित, वात विकार, दमा और तृष्णा आदि रोग खत्म हो जाते है।वात रोग के रोगी समान मात्रा में सतावरी और पीपल को साथ साथ पीसकर छान ले और नियमित एक चम्मच चूर्ण सुबह दूध से ले वात रोगों में लाभ होता है।
  29. सतावरी की जड़ का चूर्ण और मिश्री बराबर मात्रा में मिलाकर पीसकर चूर्ण बना लें। यह चूर्ण1चम्मच दिन में 3 बार 1 कप दूध के साथ पिलाने से न केवल स्त्रियों  के स्तनों में दूध की  कमी दूर होगी, बल्कि मासिक स्राव के बाद आई कमजोरी भी दूर होगी।
  30. सतावरी को गाय के दूध में पीस कर सेवन करने से स्त्री का दूध मीठा और पौष्टिक हो जाता है।समान मात्रा में सतावरी, सौंफ, बिदारीकंद को पीसकर 5 ग्राम दूध या पानी से लेने से महिलाओं की छाती का जमा हुआ दूध उतरने लगता है।
  31. सतावरी और कमलनाल को समान मात्रा में लेकर पीसे और गाय के दूध के साथ सेवन करे इससे सातवें महीने में गर्भ के रोग नष्ट होते हैं।
  32. शहद के साथ सतावरी का चूर्ण सेवन करने से या शतावर के रस को शहद के साथ मिलाकर दिन में 2 चम्मच सुबह शाम  सेवन करने से प्रदर रोग मे आराम आता है।
  33. या सतावरी चूर्ण  को  एक गिलास दूध या पानी के साथ मिलाकर उबाले आधा रह जाने पर खांड मिलाकर सुबह-शाम सेवन करने से प्रदर रोग ठीक हो जाता है।
  34. रक्तपित्त के लिए 250 मिलीलीटर दूध में सतावरी की जड़ तथा गोखरू का 5 -5 ग्राम चूर्ण मिला कर आधा रह जाने तक उबाले यह दूध रोगी को दिन में 2 बार दे रक्तपित्त ठीक होगा।
  35. अथवा एक किलो पानी में 15 -15 ग्राम गोखरू और सतावरी की जड़ तथा एक गिलास गाय का दूध मिला कर आधा रह जाने तक उबाले और रोगी स्त्री को  दिन में 2 – 3 बार पिलाये योनी से रक्त स्राव रुक जाएगा।
  • विशेष:- एक चम्मच का अर्थ है चाय का छोटा चम्मच (5 ग्राम) एक गिलास यानी के 250 ग्राम( दूध पानी आदि)
  • सतावरी सिर में दर्द पैदा करता है। लेकिन शहद के साथ सतावरी का सेवन करने से इसका यह दोष खत्म हो जाता है।

R K Rao

अदरक (Ginger)
January 5th, 2012

अदरक

अदरक गुणों की खान है।आप इसे फल-सब्जी मानें या फिर विलक्षण दवा कहें अधिकतर घरों में अदरक का उपयोग तरह-तरह से किया जाता है।अदरक  भोजन में मसाले के रूप में और ताजा अदरक अचार और चटनी सलाद के रूप में इस्तेमाल किया जाता है. अदरक से  पुडिंग, जाम, सुरक्षित बनी रहती है भोजन के एक महत्वपूर्ण अंग और औषधि, दोनों रूपों में अदरक या सोंठ का प्रयोग किया जाता है। विशिष्ट गुणों से भरपूर अदरक का इस्तेमाल कई बड़ी-छोटी बीमारियों में भी किया जाता है यह कफ, खांसी,जुकाम, सिरदर्द, कमर दर्द, पसली और छाती की पीड़ा दूर करती है और पसीना लाकर रोम छिद्रों को खोलती है। औषधि के रूप में इसका प्रयोग गठिया, र्‌यूमेटिक आर्थराइटिस (जोड़ों की बीमारियों ) साइटिका और गर्दन व रीढ़ की हड्डियों की बीमारी होने पर भूख न लगना, मरोड़ पेचिश, खाँसी, जुकाम, दमा और शरीर में दर्द के साथ बुखार, कब्ज होना, कान में दर्द, उल्टियाँ होना, मोच आना, उदर शूल और मासिक धर्म में अनियमितता होना इन सब रोगों में भी अदरक (सोंठ) को दवाई के रूप में इस्तेमाल किया जाताहै। शरीर के स्वस्थ बने रहने में अदरक का बहुत बड़ा योगदान होता है।

अदरक के फायदे अचूक हैं। इसके टुकड़ों पर सेंधा नमक डाल कर खाने से जीभ और गला साफ होता है और भोजन के प्रति अरूचि मिटती है। अदरक की चाय जुकाम, खांसी, कफ, सिरदर्द, कमर दर्द, पसली और छाती की पीड़ा दूर करती है और यह स्वादिष्टहोती है।अदरक एक शक्तिशाली जिवानुनाशक भी है बड़ी आँत में पाए जाने वाली बैक्टीरिया का बढ़ना रोक देता है जिसके कारण गैस से राहत मिलती है । इसमें एंटी-ओक्सिडेंट गुण भी होते है , इसके सेवन से कैंसर बचाव में सहायक एंजायम सक्रीय हो जाते है । इस गुण के कारण कैंसर से भी बचा जा सकता है

अदरक के स्वास्थ्य लाभ

यह एक पोधे की जड़ है। यह भारत में एक मसाला के रूप में प्रमुख है। यह रसोई  घर या हर्बल दवाओं में भी पाया जाता है यह कहा गया है। अदरक एक दर्द रिलीवर के रूप में पाया गया है। इस का प्रयोग  दर्दनाक माहवारी, माइग्रेन, अपच और संक्रमण के लिए और अस्थमा के रूप में  राहत प्रदान और जीवन शक्ति और दीर्घायु को बढ़ावा देने के लिए किया जाता है।

पेट की समस्याओं  में लाभ कारी :-

बदहजमी, पेट का दर्द, ऐंठन, दस्त, पेट फूलना और अन्य पेट और आंत्र समस्याओं से संबंधित  की है अदरक या अदरक का तेल अदरक की चाय भी पेट की समस्याओं में लाभ कारी  है. अदरक अपच के लिए और पाचन में सुधार करने में मदद करता है इस का उपयोग  भोजन की विषाक्तता के लिए आंत्र जीवाणु संक्रमण और पेचिश के उपचार के लिए उपयोग किया जा सकता है अदरक की जड़  और  इसका तेल  मतली दस्त और उल्टी.के खिलाफ भी प्रभावी होता है अदरक का तेल चिंता अवसाद, मानसिक तनाव, थकान, चक्कर आना और बेचैनी को भी नियंत्रित करता है ।

अदरक का तेल

दिल की बीमारियों का इलाज में अदरक के तेल का उपयोग करें अदरक और रक्त कोलेस्ट्रॉल के स्तर में कमी की रोकथाम में सहायक हो सकता है अदरक  कोलेस्ट्रॉल के स्तर में कमी और रक्त थक्के में अवरोध दिल स्ट्रोक की घटनाओं को कम करने में सहायक हो सकता है गरिष्ठ भोजन करने से प्लेटलेट रक्त-कणों की चिपचिपाहट बढ़ जाती है।भोजन में रोज 10 ग्राम अदरक लेने से प्लेटलेट कणों के चिपचिपेपन पर रोक लगी रहती है। अदरक के उपयोग से उच्च रक्तचाप में सुधार और शरीर में रक्त के प्रवाह के संचालन को संतुलित करता है।

सांस की समस्याओं में लाभ कारी अदरक:-

यह सांस और ब्रोंकाइटिस, अस्थमा, में कारगर है। सांस की समस्याओं जैसे बलगम दूर करने में सर्दी, खांसी, फ्लू. गले और फेफड़ों अदरक बहुत प्रभावी है। इसलिए भारत में चाय के साथ अदरक  डाला जाता है।  शहद और अदरक का सांस की समस्याओं के उपचार में स्वास्थ्य लाभ को अच्छी तरह से जाना जाता है।

सूजन और दर्द कम कर देता है अदरक :-

अदरक का अर्क मांसपेशियों की सूजन और दर्द कम कर देता है। और मांसपेशियों में दर्द, गठिया, सिर दर्द, माइग्रेन, आदि अदरक का तेल की मालिश या अदरक का पेस्ट दर्द को कम कर के मांसपेशियों के दर्द और तनाव को कम करने में सहायक होता है एक अध्ययन में पाया गया कि अदरक पाउडर महिलाओं के गर्भाशय के डिम्बग्रंथि के कैंसर की कोशिकाओं में कैंसर कोशिका की मृत्यु कर देता है बालों के लिए भी उपयोगी है अदरक का रस रूसी को भी नियंत्रित करता है।

हानिकारक प्रभाव ( निम्न  व्यक्ति अदरक के अधिक उपयोग से बचे)

जिन व्यक्तियों को ग्रीष्म ऋतु में गर्म प्रकृति का भोजन न पचता हो कुष्ठ, रक्तपित्त ,पीलिया, ज्वर, घाव, शरीर से रक्तस्राव की स्थिति, मूत्रकृच्छ, जलन जैसी बीमारियों में इसका सेवन नहीं करना चाहिए। खून की उल्टी होने पर  गर्मी के मौसम में और खून की उल्टी होने पर  अदरक का सेवन नहीं करना चाहिए और यदि आवश्यकता हो तो कम से कम मात्रा में प्रयोग करना चाहिए। अदरक एक दिन में  पांच से दस ग्राम, सोंठ का चूर्ण एक से तीन ग्राम, रस पांच से दस से मिलीलीटर, रस और शर्बत दस से तीस  मिलीलीटर तक ही  सेवन  करना चाहिए।

 

R K Rao

गेहूँ के जवारे (Wheat Grass)
November 17th, 2011

गेहूँ के जवारे

  • गेंहूँ के जवारे का रस अमृत के समान, प्रक्रति का अनमोल उपहार, आसानी से उपलब्ध होने वाला, शीघ्रता से असर करने वाला, शारीरिक कमजोरी को दूर करने वाला, शक्तिवर्धक. जटिल रोगों के लिए बेशकीमती महा-औषधि, तथा रोग प्रतिरोधक क्षमता के गुणों से भरपूर है। गेहूँ के जवारे को संजीवनी बूटी भी कहा जाता है। इसमें क्लोरोफिल का सर्वश्रेष्ठ स्रोत हैं। और क्लोरोफिल के अलावा अन्य सैकड़ो पोषक तत्व् उपस्थित हैं। ज्वारे में विटामिन-डी और बी-12 के ईलावा सभी विटामिन (ई-बी.1, 2, 3, 5, 6, 8 और 17-सी-ई तथा के) प्रचुर मात्रा में मिलते हैं। उसमें उपस्थित विटामिन-बी-17 (लिट्राइल) को कई आरोग्यशास्त्री कैन्सर को नष्ट करने का एक मात्र उपाय मानते हैं। सभी स्वस्थ मिट्टी में पाये जाने वाले 100 से अधिक खनिजों सहित गेंहूँ के जवारे में केल्शियम, सोडियम, मेग्नीशियम, पोटेशियम, आयोडीन, सेलेनियम, लौह, जिंक और अन्य सभी आठ आवश्यक अमीनो एसिड और प्रोटीन होते हैं। 7 से 10 दिन पुरानी गेंहूँ के जवारे के रस में अन्य साग सब्जियों से अधिक एंजाइम शामिल हैं। गेहूँ के ज्वारे का रस और मानव-रक्त दोनों की रासायनिक संरचना पी.अच्.( pH)7.4 व क्षारीयता लगभग एक जैसी है। इसीलिए गेहूँ के ज्वारे का रस शीघ्रता से पचता है और रक्त में अवशोषित हो जाता है और शीघ्र शरीर के उपयोग में आकर शरीर को स्वस्थ करने लगता है। गेहूँ के जवारे के रस में रक्त और शरीर शोधन करने की अदभुत क्षमता है।
  • गेंहूँ के जवारे के रस के नियमित प्रयोग से अनिद्रा, त्वचा रोग, संधि वात, प्रदर रोग, बालों के रोग, पीलिया, जुकाम, मोटापा, पथरी, बवासीर, अस्थमा, एसिडीटी, कब्ज, खून की कमी (अनीमिया) गठिया एवं कैंसर जटिल जैसे रोगों से बच सकते हैं। गेहूँ के ज्वारे का रस कैंसर की कोशिकाओं को ढूंड-ढूंड कर नष्ट करता है। तथा उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को धीमा करता है और बुढ़ापे की कमजोरी को आने से रोकता हैं। तथा शारीरिक सौंदर्य और लम्बे समय तक चेहरे पर तेज भी कायम रखता हैं। गेहूँ के जवारे के रस को ग्रीन ब्लड (हरा खून) भी कहा जाता है। गेहूं घास का रस खून को साफ़ करता है तथा जहरीले घटकों (विषाक्त पदार्थों) जो की खून में जमा है उनको निकाल बहार करता है।
  • गेहूँ के जवारे के रस को निकालने के बाद तुरंत उपयोग करना अधिक सुरक्षित होता है। क्योंकि धीरे धीरे यह अपनी गुणवत्ता को खोने लगता है। गेहूँ के जवारे के रस में पालक से अधिक लोहा, मांस, मछली, अंडे, सेम या डेयरी उत्पादन से अधिक प्रोटीन,होते हैं इसमें लगभग 90 विभिन्न खनिज,19 एमिनो एसिड, 70% क्लोरोफिल, एंजाइम और अन्य पोषक तत्व अपने चरम सीमा पर होते है। गेहूँ के जवारे के रस रक्त शर्करा के स्तर में सुधार लाता है और शरीर में संचित विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालने में मदद करता है।
  • गेहूँ के जवारे के रस से (मौजूद क्लोरोफिल से) एंटीसेप्टिक लाभ के लिए, संक्रमण को बेअसर व काबू में करने के लिए, घावों को ठीक करने के लिए, कटी फटी त्वचा को जल्द ठीक कर के जोड़ने के लिए, पसीने की दुगंध को भगाने के लिए आंतो के घावों को चंगा करने के लिये योनि संक्रमण से छुटकारा पाने के लिए, टाइफाइड बुखार को कम करने करने के लिए, नाडी तत्र को ठीक करने के लिए, सूर्य विकरनो से होने वाले रोगों के इलाज करने के लिए, कान की सूजन को ठीक करने के लिए, गले में खराश के लिए तथा आंतो को सुचारू और सवस्थ करने के लिए प्रयोग किया जा सकता है। गेहूँ के जवारे के रस में क्लोरोफिल (जीवाणुरोधी) है जो शरीर के अंदर और बाहर औषधीय मरहम के तोर इस्तेमाल किया जाता है। नवरात्रि में नौ दिनों तक अक्सर हर घर में गेंहू के जवारे उगाने का रिवाज था। जब मिटटी के घड़े का पानी पिया जाता था तब इन दिनों घड़े में कुछ गेंहू के साफ़ जवारे डाल दिए जाते थे ताकि गेंहू के जवारो से घड़े का पानी शुद्ध हो कर विषाणु रहित हो जाए।
  • गेहूँ के ज्वारे के रस के नियमित सेवन से सहनशक्ति बढ़ती है, यौन ऊर्जा, विचारों की स्पष्टता में सुधार आता है। नशे की लत कम कर देता है यह भी त्वचा की बनावट और बड़ी उम्र के सूखेपन में सुधार होता हैं, और क्रोनिक रोग (पुराणी बीमारियाँ) और इम्यून सिस्टम (रोग प्रतिरोधक क्षमता) मजबूत होती है। गेहूँ के ज्वारे चबाने से गले की खारिश और मुंह की दुर्गंध दूर होती है। रस के गरारे करने से दांत और मसूड़ों के इन्फेक्शन में लाभ मिलता है। स्त्रियों को ज्वारे के रस का डूश लेने से मूत्राशय और योनि के इन्फेक्शन, दुर्गंध और खुजली में भी आराम मिलता है। त्वचा पर ज्वारे का रस लगाने से त्वचा का ढीलापन कम होता है और त्वचा में चमक आती है। अंकुरित गेंहूँ का तेल मांसपेशियों की समस्या में बहुत उपयोगी है। अंकुरित गेंहूँ का तेल प्रसव के बाद त्वचा पर बने निशानों को दूर करने का सबसे अच्छा उपाय होता है।
  • गेंहू के जवारे के रस में भरपूर क्लोरोफिल होता है,क्लोरोफिल शरीर में हीमोग्लोबिन का निर्माण करता है, जो शरीर को ऑक्सीजन से लबालब भर देता है। जिससे कैंसर कोशिकाओं को ज्यादा ऑक्सीजन मिलती है और ऑक्सीजन और कैंसर कभी एक साथ नहीं रह सकते और ऑक्सीजन की अधिकता से कैंसर की कोशिकाये मरने लगती है। अगर नियमित इस रस का सेवन किया जाए तो कैंसर की गाँठे तक गल जाती

गेहूँ के जवारों का उपयोग :—

  1. गेहूँ के ज्वारे के रस के सेवन से शरीर की सुरक्षा प्रणाली (इम्यून-सिस्टम) मजबूत होता है।
  2. गेहूँ के जवारों का रस, पावडर, अंकुरित गेंहू का तेल व टेबलेट आदि बाजार में भी मिल जाते है।
  3. गेहूँ के ज्वारे के रस के सेवन से जोड़ो, नींद, त्वचा, मासिक धर्म आदि की बीमारी से निजात मिलती है।
  4. गेहूँ के ज्वारे के रस का सेवन करने से रक्त की शुद्धि व रक्त में हिमोग्लोबिन की मात्रा भी संतुलित होती  है।
  5. गेहूँ के जवारे चटनी के रूप में, सलाद के रूप में, रस के रूप में, और गेंहू को अंकुरित कर प्रयोग किया जाता है।
  6. विटामिन ई की वजह से अंकुरित गेंहू मांसपेशियों, रक्त प्रवाह, आँखों और साँस के लिए बहुत अच्छा माना जाता है।
  7. गेहूँ के ज्वारे के रस के सेवन से ब्लड प्रेशर, दिल की बीमारी, कैंसर, थैलेसिमिया, मधुमेह (शुगर) आदि बीमारियों की रोकथाम होती है।
  8. सोराइसिस के लिए अंकुरित गेंहूँ का तेल व अरंडी का एक-एक चम्मच तेल लें कर इसमें 50 मि.ली. सूरजमुखी का तेल मिलाकर त्वचा पर मले।
  9. गेहूँ के ज्वारे के रस के सेवन से कब्ज, अल्सर, कोलाईटीस (आंव), बवासीर, अम्लपित्त आदि पेट सम्बन्धी सभी बीमारीयों के उपचार में मदद मिलती है।
  10. गेहूँ के ज्वारे के रस का सेवन शरीर में रक्त और पोषक तत्वों की कमियों (अनीमिया) को अति शीघ्रता से पूरा करता है, तथा शरीर के वजन को संतुलित करता है।
  11. रोगी को रोज सुबह-शाम गेंहू के जवारे का ताजा रस पिलाने पर आप देखेंगे कि गंभीर रोग भी दस बीस दिन के बाद ठीक होने लगेगे और दो-तीन महीने में मर्त समान प्राणी भी एकदम रोग मुक्त और स्वस्थ हो जाता है।

गेहूँ के जवारे का रस और क्लोरोफिल :—–

  1. क्लोरोफिल में शरीर के प्रतिकूल बैक्टीरिया को रोकने की क्षमता होती हैं।
  2. यह लीवर की शुद्धि करता है और शरीर में जले की जलन को कम करता हैं।
  3. यह उच्च रक्तचापज को कम करता है और कोशिकाओं का विस्तार करता है।
  4. यह कीटाणुरोधी हैं, कीटाणुओं को नष्ट करता है और उनके विकास को रोकता है।
  5. गेहूँ के ज्वारे का क्लोरोफिल श्रेष्ट है, क्लोरोफिल से हमें मेग्नीशियम प्राप्त होता है।
  6. गेहूँ के ज्वारे का रस नियमित पीने से एग्जीमा और सोरायसिस भी ठीक हो जाते हैं।
  7. गेहूँ के जवारे का रस तुरंत पच जाता है और शरीर की बहुत कम ऊर्जा का क्षय होता है।
  8. 23 किलो चुनिन्दा साग-सब्जियों से प्राप्त पोषण केवल एक किलो ज्वारे से प्राप्त प्राप्त हो जाता है।
  9. गेहूँ के ज्वारे में भरपूर ऑक्सीजन होती है। मस्तिष्क और संपूर्ण शरीर को ऊर्जावान और स्वस्थ रखता है।
  10.  कान में कोई भी रोग होने पर गेंहू के जवारे का रस पीने और थोड़ी सी बूंदे कान में डालने से आराम आता है।
  11. घास का रस, जो अनिश्चित काल से शाकाहारी पशुओं को जीवित रखने के लिए पूरक आहार माना जाता है।
  12. गेहूँ के जवारे के रस के नियमित प्रयोग से लोगों को 30 साल पुरानी बीमारियों से भी निज़ात मिल जाती है।
  13. अगर बांझ स्त्रियों को जवारे का रस हर रोज पिलाया जाए तो कुछ ही समय में उनका बांझपन दूर हो जाता है।
  14. गेहूँ के जवारे सभी घासों में श्रेष्ठ है। गेहूँ के ज्वारे के रस से मनुष्य को हर तरह का जरुरी पोषण मिल जाता है।
  15. गेहूँ के ज्वारे के ताजा रस का नियमित सेवन से एग्जीमा और सोरायसिस जसे जटिल रोग भी ठीक हो जाते हैं।
  16. गेहूँ के जवारे से प्राप्त क्लोरोफिल जो कि टिसूज (ऊतकों) में मिलकर उन्हें परिष्कृत और उन्हें खत्म करता है।
  17. अगर बच्चे को भी रोजाना लगभग 5 बूंदे इस रस की सेवन कराई जाए तो बच्चा सुन्दर और स्वस्थ बन जाता है।
  18. गेहूँ के जवारे के रस में कच्चा क्लोरोफिल उपलब्ध होता है इसे बिना किसी भी हानी या खतरे के पिया जा सकता है
  19. ज्वारे के रस का एनीमा लेने से आंतों और पेट के अंगों के सफाई और मरमत होती है और पाचन शक्ति को बढ़ाता है।
  20. लम्बे समय तक गेंहूँ के जवारे का सेवन किया जाये तो कील- मुहाँसों तथा दाग, धब्बे और झाइयां स्वयं साफ हो जाते हैं।
  21. घावों के लिए क्लोरोफिल अत्यंत प्रबल कीटाणुनाशक फंगसरोधी भी है और शरीर से टॉक्सिन्स को निकल बहार करता है।
  22. गर्भ वती नारी को रोजाना गेंहू के जवारे का रस पिलाने से उसका बच्चा बहुत ही सुन्दर, स्वस्थ और बुद्धिमान पैदा होता है।
  23. गेहूँ के ज्वारे का रस एक सम्पूर्ण आहार है। केवल गेहूँ के ज्वारे का रस पीकर ही मनुष्य का पूरा जीवन स्वस्थ बीत सकता है।
  24. अल्सर, वेरिकॉज-वेइन्स, वेरिकॉज-अल्सर और आतों की सूजन इत्यादि रोगों में गेंहू के ज्वारे के रस का उपयोग किया जाता है।
  25. यह आर्थ्राइटिस (जोड़ो के दर्द) को ठीक करता है, पेट और आंतो की शुधि करता है और आंतों के लाभप्रद कीटाणुओं को भी पोषण देता हैं।
  26. यह ताजा रस शरीर से हानिकारक पदार्थों (टॉक्सिन्स) को, भारी धातुओं और शरीर में जमा दवाओं के अवशेष को निकाल बहार करता है।
  27. यह ताजा रस कब्ज ठीक करता है, पाचन शक्ति को बढ़ाता है। ज्वारे के रस का एनीमा लेने से आंतों और पेट के अंगों का शोधन होता है।
  28. यह उच्च रक्तचाप कम करता है यह मोटापा कम करता है यह भूख को नियमित करता है, शरीर में रक्त के संचार को नियमित करता है।
  29. यह ताजा रस समस्त रक्त संबन्धी रोगों के लिए रामबाण औषधि है। थोड़ी देर गेहूँ के ज्वारे को दांतों से चबाने से दांतों का दर्द ठीक होता है।
  30. गेंहू के जवारे के ताजा रस से प्राप्त क्लोरोफिल रक्त बनाता है रोग पैदा करने वाले जीवाणु को नष्ट करता है और उनके विकास को रोकता है।
  31. ज्वारे का ताजा रस पीने से बाल समय से पहले सफेद नहीं होते और शरीर को स्वस्थ, ऊर्जावान, सहनशील, शांत और प्रसन्न चित् बनाता है।
  32. गेंहू के जवारे का रस का हर दिन सेवन करने से त्वचा स्वस्थ और चमकदार रहती है बालों का गिरना रुकता है और नाखूनों के लिए भी अच्छा होता है।
  33. यह मोटापा कम करता है क्यों कि यह भूख कम करता है, बुनियादी रसायनिक प्रतिक्रियाओं (मेटाबोलिस्म) दर और शरीर में रक्त के संचार को बढ़ाता है।
  34. यह ताजा रस दांतों को सड़न से बचाते है, दांत का दर्द ठीक करता है। और शरीर को दुर्गंध रहित रखता है। इसके गरारे करने से गले की खारिश ठीक हो जाती है।
  35. क्लोरोफिल कई पौधों में पाया व निकला जाता है, लेकिन गेहूँ के जवारे का रस इन सब में श्रेष्ट है क्योंकि इसमें मनुष्य के लिए आवश्यक 92 % खनिज तत्व पाए जाते है।
  36. ज्वारे के रस का उपयोग गले की ख़राश आदि में अत्यंत लाभ देता हैं। पायोरिया, चर्मरोग, मस्तिष्क का रक्तस्राव क्षय, हृदय-विकार, रक्त नाड़ी तंत्र के परवाह को नियंत्रित करता है।
  37. गेंहू के जवारे के रस का नियमित सेवन से गैस का रोग, एसिडिटी, डायबिटीज, पेट के कीड़े, चमड़ी के रोग, पथरी, मासिक धर्म समय से ना आना, दिल के रोग, कैंसर आदि में लाभ होता है।
  38. गेहूँ के जवारे के रस में मौजूद क्लोरोफिल में उच्च मैग्नीशियम एंजाइम होते है जो कि सेक्स हार्मोन को पुन: सक्रीय करता है जिससे स्त्री-पुरुष और पशुओं की प्रजनन शक्ति पुन: जाग्रत होती है।
  39. मैग्नेशियम की कमी से महिलाओं में पाँवों की मांसपेशियाँ कमजोर होना, पाँवों में बिवाइयां फटना, एकाग्रता में कमी, चिडचिडापन और मासिक-धर्म सम्बन्धी कई परेशानियाँ शुरू हो जाती है।
  40. गेहूँ के जवारे के रस में मौजूद क्लोरोफिल में लाल रक्त कोशिकाओं को पुन: निर्माण करने की क्षमता होती हैं। 4-5 दिन के सेवन करने से शरीर में आई कमी लाल रक्त कोशिकाओं की पूर्ति हो जाती है।
  41. गेहूँ के जवारे के रस में प्रचुर मात्रा में श्रेष्ट क्लोरोफिल उपलब्ध होता है। क्योंकि क्लोरोफिल के अलावा इनमें 100 से अधिक अन्य पौष्टिक तत्व भी होते हैं। गेहूँ के जवारे के रस से किसी भी अन्य तत्व की तुलना में अधिक सूर्य प्रकाश ऊर्जा और भरपूर ऑक्सीजन भी मिलती हैं।
  42. गेहूँ के ज्वारे के रस के सेवन से नशे की लत घटने लगती है, प्रजनन क्षमता बेहतर बनती है, जहरीले या शरीर के लिए नुकशान दायक बैक्टीरिया के विकास को रोकती है। यह दिल, दिमाग, मांसपेशियों, धमनियों, जोड़ों, हड्डियों, त्वचा, बाल, हार्मोनस, दृष्टि, पाचन शक्ति, गुर्दे, जिगर आदि शरीर की सभी प्रतिरक्षा प्रणाली को भी सुद्र्ड बनाती है।

मेग्नीशियम  से लाभ जो हमें गेंहू के जवारे से मिलता है:—–

  1. हमारे शरीर की हर एक कौशिका में सूक्ष्म मात्रा में लगभग 50 ग्राम मेग्नीशियम होता है।
  2. क्लोरोफिल कई रोग पैदा करने वाले कीटाणुओं को नष्ट करता है और उनके प्रसार को रोकता है।
  3. मेग्नीशियम जो की हमारी हड्डियों के निर्माण तथा नाड़ियों और मांसपेशियों को तनाव रहित रखता है।
  4. शरीर में लगभग तीन सौ ऍन्जाइम्स होते है जिनकी सक्रियता के लिए मैग्नेशियम अत्यंत आवश्यक है।
  5. कैल्शियम-मैग्नेशियम सन्तुलन में गड़बड़ी आने से स्नायु-तंत्र दुर्बल हो सकता है।जिसे यह दुरुस्त करता है
  6. क्लोरोफिल लीवर को शुद्ध और मजबूत करता है। यह रक्त बनाता है, आंतों के लाभप्रद जीवाणुयों को पोषण भी देता हैं।
  7. यह शरीर में जलन को कम करता हैं गठिया, पेट सम्बन्धी शोथ, आंत्र शोथ, गले की ख़राश आदि में अत्यंत लाभदायक हैं।
  8. घावों के लिए क्लोरोफिल अत्यंत प्रबल कीटाणुनाशक है। यह फंगसरोधी भी है और शरीर से टॉक्सिन्स को विसर्जन करता है।
  9. मैग्नेशियम शरीर में कैल्शियम और विटामिन सी का संचालन, नाडी तंत्र और मांसपेशियों की कार्यशीलता के लिये जरुरी है।
  10. मैग्नेशियम रक्तचाप तथा मधुमेह को नियमित करता है। अधिक शारीरिक मेहनत करने वाले लोगों को मैग्नेशियम की आवश्यकता है।

गेहूं के जवारे उगाने की विधि :-

  1. हमेशा अच्छी किस्म के जैविक गेहूँ के बीज,अच्छी उपजाऊ (उर्वरक) मिटटी और जैविक या गोबर की उम्दा खाद का ही उपयोग करें।
  2. रात को सोते समय लगभग 100 ग्राम गेहूँ एक पात्र में भिगो कर रख दें। मिटटी और खाद को अच्छी तरह मिलाकर गमलों के छेद को पत्थर या टूटे मिटटी के गमले के टुकड़े से ढक कर गमलों में मिटटी की डेढ़ दो इंच मोटी परत बिछा दें और पानी छिड़क दें।
  3. पहचान के लिए सातों गमलो पर एक से सात तक नंबर डाल दें।
  4. अगले दिन गेहुंओं को धो, निथारकर पहले गमले में गेहूँ को परत के रूप में बिछा दें और ऊपर से थोड़ी मिट्टी डाल दें और पानी से सींच दें।
  5. गमले को किसी छायादार स्थान जहां पर्याप्त हवा और प्रकाश आता हो पर धूप सीधी गमलों पर न पड़े।
  6. अगले दिन 2 नंबर के गमले में गेहूँ बो दीजिये और इस तरह रोज अगले नंबर के गमले में गेहूँ बोते रहें। इनमे कभी भी रासायनिक खाद या कीटनाषक न डाले।
  7. शुरू में दो-तीन दिन गमलों को गीले अखबार से ढक दें और गमलों में हर रोज स्प्रे बोटल से दो बार पानी दें ताकि मिटटी में नमी बनी रहे।
  8. जब गैहूँ के ज्वारे डेढ़ इंच के हो जाये तो एक बार ही पानी देना प्रयाप्त है। गर्मी के मौसम में ध्यान रखे कि मिट्टी में पर्याप्त नमी बनी रहे और पानी की मात्रा भी ज्यादा न हो।
  9. सात दिन बाद 5-6 पत्तियां के 7-8 इन्च लम्बे जवारे हो जाये तब इन को जड़ सहित उखाड़ कर और इनकी जड़े काट कर पानी से अच्छी तरह धो कर पीस ले और रस निकाल ले व इसका सेवन करे।
  10. जवारों के बचे हुए गुदे को आप त्वचा रोग पर मल सकते हैं।
  11. नियमित रूप से जवारें लेने के लिए जैसे-जैसे गमले खाली होते जाये खाद मिटटी बदल कर नए बीज उगाते जाएँ।
  12. जब तक जवारे चाहिए तब तक इस प्रक्रिया को निरंतर दोहराते रहे। इस तरह जवारा घर में पूरे साल भर उगाया जा सकता है।
  13. बिजली के गराइंडर (जूसर-मिक्सर) से रस निकालने से इनका पोष्टिक तत्व और क्लोरोफिल नष्ट हो जाता है। इस लिए कौशिश करे की रस निकलने के लिए हाथ की मशीन का ही उपयोग करे।

नोट:-

  1. शुरू में रस पीने से परेशानी हो तो कम मात्रा से धीरे-धीरे मात्रा बढ़ायें।
  2. ज्वारे का ताजा रस सामान्यतः 60-120 एमएल प्रति दिन खाली पेट सेवन करना चाहिये।
  3. यदि आप किसी बीमारी से पीड़ित हैं तो 30-60 एमएल रस दिन मे तीन चार बार तक ले सकते हैं।
  4. रस निकालकर तुरंत उपयोग करें। तीन घण्टे में जवारे के रस के पोषक गुण समाप्त होने लगते हैं।
  5. रस में अदरक अथवा खाने वाला पान मिला सकते हैं इससे उसके स्वाद तथा गुण में वृद्धि हो जाती है।
  6. इसे गिलोय, लोकी, नीम के पत्तो व तुलसी के पत्तों के रस के साथ भी मिल कर लिया जा सकता है।
  7. रस लेने के पूर्व व बाद में एक घण्टे तक कोई अन्य आहार न लें। आधे घंटे में यह रक्त में घुल मिल जाता है।
  8. रस को धीरे-धीरे घूंट घूंट करके पीना चाहिए और सादा भोजन ही लेना चाहिए तथा तली हुई वस्तुएं न खाए।
  9. कुछ लोगों को शुरु-2 में उल्टी-दस्त हो सकते है तथा सर्दी महसूस हो सकती है। यह सब रोगी होने के लक्षण है।
  10. खटाई ज्वारे के रस में मौजूद एंजाइम्स को निष्क्रिय कर देती है। इसमें नमक, चीनी आदि भी नहीं मिलाना चाहिये।
  11. सर्दीं, उल्टी या दस्त होने से ऐसा समझे की शरीर से दूषित एकत्रित मल बाहर निकल रहा है, इससे घबराने की जरुरत नहीं है।
  12. इसे खट्टे रसों (नीबू, संतरा, मौसमी) आदि खट्टे रसो को छोड़कर अन्य फलों और सब्जियों के रस के साथ मिला कर भी ले सकते है।

R K Rao

बेल , श्रीफल (Wood Apple)
November 2nd, 2011

बेल , श्रीफल

  • बेल इसे श्रीफल भी कहते हैं कई बीमारियों की अचूक औषधि बेल का पेड़ बहुत प्राचीन है। आयुर्वेद में बेल को स्वास्थ्य के लिए काफी लाभप्रद और अत्यन्त गुणकारी फल माना जाता है। शिव का प्रिय फल-’बेल’ पेट के तमाम रोगों (गैस, कब्जियत, जलन, खट्टी डकारें, बदहजमी, संग्रहणी, भूख न लगना, शुगर, हृदयरोग,घाव, कफ, ज्वर) आदि के लिये साक्षात ‘महाकाल’ है बेल पत्र इसी बेल नामक फल की पत्तियाँ हैं जिनका प्रयोग पूजा में किया जाता है। इस पेड़ में पुराने पीले लगे हुए फल दुबारा हरे हो जाते हैं तथा इसको तोड़कर सुरक्षित रखे हुए पत्तों को 6 महीने तक ज्यों के त्यों बने रहते हैं और गुणहीन नहीं होते। इस पेड़ की छाया शीतल और आरोग्य कारक होती हैं। इसलिए इसे पवित्र माना जाता हैं। पका हुआ बेल मीठा, पाचक ,रुचिकर,खुशबूदार और पौष्टिक तथा शीतल फल है। पेट की बीमारियों में जहां अधिकतर दवाइयां थोडे समय का असर दिखाकर निष्क्रिय हो जाती हैं, वहीं बेल फल एक अचूक और असरकारक औषधि के रूप में पेट की तमाम बीमारियों को जड़ से मिटा कर समाप्त करता है। पकने पर हरे से सुनहरे पीले रंग का हो जाता है। बेल का फल ऊपर से बेहद कठोर होता है। खोल को तोड़ने पर मीठा रेशेदार सुगंधित गूदा निकलता है। जिसमें पर्याप्त मात्रा में बीज होते हैं। इस अकेले फल में हजारों तरह के गुण विद्यमान हैं, जो कई रोगों के लिए बेहद लाभकरी है। बेल (श्रीफल) जिसके फल, फूल, पत्ते, जड़ और छाल भी उपयोगी हैं। इसका कच्चा फल जठराग्नि को तीव्र -पाचक रक्त को रोकने वाला पक्का फल कषाण, मधुर और हल्का रेचक होता है ।
  • पत्तों का रस घाव को ठीक करता है, दर्द को कम करता है, ज्वर को नष्ट करता है, जुकाम और श्वास रोग मिटाने तथा शुगर कम करता है। बेल की छाल और जड़ घाव, कफ, ज्वर, गर्भाशय का घाव, नाड़ी अनियमितता, हृदयरोग आदि रोगों को दूर करने में सहायक होती है। ये कृमि व दुर्गन्ध का नाश करते हैं। बेल में विद्यमान उड़नशील तैल व इगेलिन, इगेलेनिन नामक क्षार-तत्त्व आदि विद्यमान है। जिससे की बेल फल औषधीय गुणों से सरोबार हैं। बाजार में बेल का मुरब्बा, बेलफल का चूर्ण, पके हुए बेलफल का गुदा, बेल का कच्चा फल, बेल की जड़, पत्तियाँ बेल का शर्बत भी मिलता है। उदर विकारों में बेल का फल रामबाण दवा है। यह रोग निवारक ही नहीं बल्कि यह स्वास्थ्यवर्धक भी है। बेल का शरबत हमेशा खाली पेट ही अधिक फायदेमंद होता है, दिन भर बेल का शरबत पीने से उतना फ़ायदा नहीं मिलता जितना सुबह खाली पेट मिलता है।
  • बेल के फल में नमी 61.5 %, कार्बोहाइड्रेट 31.8 %,वसा 3 %, फाइबर 2.9 %,प्रोटीन 1.8 % तथा बेल फल के 100 ग्राम गूदे में कैल्शियम 85 मि.ग्रा., फॉस्फोरस 50 मि.ग्रा आयरन 2.6 मि.ग्रा, विटामिन ‘सी’ 2 मि.ग्रा। इनके इलावा बेल में 137 कैलोरी ऊर्जा म्युसिलेज पेक्टिन, शर्करा, टैनिन्स तथा कुछ मात्रा में विटामिन ‘बी’ भी पाया जाता है। बेल के गूदे में-गोंद ,ग्लूकोज, पतेल ,मार्मेलोसींन और प्रहासक ग्लूकोज तथा पत्तों में आयरन, कैल्शियम, मग्नीशियम और पोटेशियम भी पाए जाते हैं। बेल के गुद्दे में पेक्टिन नामक एक महत्त्वपूर्ण घटक है जो आंतो के लिए रक्षक के समान कार्य करता है । बड़ी आँत में पाए जाने वाले हुकवर्म हानिकारक जीवाणुओं को नष्ट करने की क्षमता भी इस पदार्थ में है।
  • बेल का मुरब्बा, बेलफल का चूर्ण, पके हुए बेलफल का गुदा, बेल का कच्चा फल, बेल की जड़, बेल की पत्तियाँ, बेल का शर्बत भी भारत में खूब मिलता है। पेचिश में मुरब्बा खाने से फौरन लाभ मिलता है। कब्ज वालों के लिए रोज रात को एक चम्मच बेलफल चूर्ण लेना फायदेमंद है। बेल का शर्बत जिन्हें कब्ज रहता है, उनके लिए तो यह महाऔषधि है। इससे आँतों में संचित मल और आँव साफ हो जाता है। पेट के अनेक रोग दूर हो जाते हैं। बेल का शर्बत गर्मियों में शीतलता प्रदान करता है। इससे पेट साफ होता है, गर्मियों में जब तक बेलफल मिलते रहें, इस शर्बत का नियमित सेवन किया जा सकता है। पेट के तमाम रोगों के साथ साथ बेल फल अन्य रोगों में भी असरकारी होता है। छोटे कच्चे बेल के फलों का संग्रह छीलकर काटकर सुखाकर बंद शीशे के जार में ठन्डे स्थान पर रखना चाहिए। प्रयोग के लिए जंगली बेल और खाने, शर्बत आदि के लिए बाग़ बगीचे के फल ही प्रयुक्त होते हैं। बेल का उपयोग औषधि के रूप में निम्न प्रकार से भी किया जा सकता है।
  1. हैजे की स्थिति में बेल का शरबत या बिल्व चूर्ण गर्म पानी के साथ देते हैं।
  2. बेल के ताजा पत्तों को पीसकर फोड़ों पर बांधने से फोड़े शीघ्र ठीक होते है।
  3. पके बेल के गूदे में काली मिर्च, सेंधा नमक मिलाकर खाने से गला साफ़ होता है।
  4. बेल के पत्तों के रस पानी में मिलाकर पीने से नाक से नकसीर आना रूक जाती है।
  5. बेल के गूदे को पानी में उबालें, ठंडा होने पर कुल्ले करें मुँह के छाले ठीक हो जायेंगे।
  6. गर्भवती स्त्रियों का जी मिचलाने लगे तो बेल और सौंठ के बने काढ़े का सेवन कराये।
  7. बेल का सेवन शहद या मिश्री के साथ अधिक अनुकूल (गुणकारी या प्रभावशाली ) होता है।
  8. बेल फल समस्त नाड़ी तंत्र को मजबूत करता है तथा कफ-वात के प्रकोपों को शांत करता है।
  9. बेल फल का शर्बत पीने से लू लगने पर शीघ्र आराम आता है और शरीर की गर्मी भी शांत होती है।
  10. बेल की जड़ को पानी में भिगोकर सुबह मसलकर और छानकर इसमें मिश्री मिलाकर पीने से पेशाब की जलन ठीक हो जाती है।
  11. बेल के पत्तों का रस पूरे शरीर पर मलिए और एक घंटे बाद नहा लीजिये त्वचा कान्तिमान होकर पसीने से दुर्गन्ध ख़त्म हो जाएगी।
  12. बेल के ताजे पत्तों के रस को जले भाग पर लगाने से आराम मिलता है। बेल के पेड़ की जड़ या लकड़ी को पानी में घिस कर फोड़े – फुंसियों पर लगाने से लाभ पहुंचता है।
  13. बेल की कोंपलो के रस में, पिसी काली मिर्च मिलाकर सुबह-शाम पिलाने से पीलिया में आराम आता है। शरीर पर बेल के पत्तो के रस की मालिस कर ने से सूजन में भी लाभ मिलता है।
  14. उन्माद (पागलपन) अनिद्रा में बेल की जड़ का चूर्ण फायदेमंद होता है। बेल की जड़ को कूट पिस कर काढ़ा बन ले इसे सुबह और शाम लेने से उदासीनता और पागलपन समाप्त हो जाता है।
  15. रक्त दोस के निवारण के लिए बेल की एक चम्मच जड़ चूर्ण में आधा चम्मच गोखरू चूर्ण मिला कर सुबह खौलते पानी में उबाल कर मिश्री या शहद मिला कर चाय की तरह से 15 -20 दिनों तक सेवन करे रक्त दोस दूर होंगे।

पाचन क्रिया के रोगों के लिए

  1. पके बेल का शर्बत नियमित सेवन से पेट साफ रहता है।
  2. छोटे बच्चों को नियमित पका बेल खिलाने से शरीर की हड्डियाँ मजबूत होती हैं।
  3. शारीरिक कमजोरी और पेट के सभी रोगों के लिए नियमित बेल का मुरब्बा खाए।
  4. सामान्य दुर्बलता के लिए टॉनिक के लिए बेल का उपयोग पुराने समय से ही किया जाता है।
  5. यह स्वादिष्ट,पचने में आसान, भूख बढ़ाने वाला, कमजोरी को दूर करके चुस्ती देने वाला है।
  6. बेल की पत्तिया सेंधानमक और कालीमिर्च के साथ सेवन करने से अपच का रोग दूर हो जाता है।
  7. बेल की जड़ के काढ़े में छोटी पीपल का चूर्ण मिला कर पीने से अपच की समस्या ठीक हो जाती है।
  8. धातु की कमजोरी में बेल के पत्तों के चूर्ण में शहद मिलाकर सुबह-शाम रोजाना चटाने से लाभ होता है।
  9. बेल के पत्तों के रस में या पत्तों की चाय में जीरा चूर्ण और दूध मिलाकर पीने से कमजोरी दूर होती है।
  10. पके बेल का फल शहद व मिश्री के साथ सेवन से शरीर का खून साफ होता है और खून में भी वृद्धि होती है।
  11. बेल के पत्तों के रस में थोड़ी कालीमिर्च और सेंधानमक मिलाकर दिन में 2-3 बार सेवन करने पेट की जलन समाप्त होती है।
  12. बेल की गिरी, कालीमिर्च, सफेद इलायची और थोड़ी-सी मिश्री को मिलाकर पानी के साथ सेवन से पाचन क्रिया मजबूत होती है।
  13. अजीर्ण में बेल की पत्तियों के दस ग्राम रस में, एक-एक ग्राम काली मिर्च और सेंधानमक मिलाकर पिलाने से आराम मिल सकता है।
  14. बेल गिरी के चूर्ण को मिश्री मिले हुए दूध के साथ सेवन करने से खून की कमी, शारीरिक दुर्बलता तथा वीर्य की कमजोरी दूर हो जाती है।
  15. बेल और हरसिंगार के 5-5 पत्ते पानी में चाय की तरह उबालकर रख लें। इस काढ़े में काला नमक मिलाकर पीने से पेट की गैस में लाभ मिलता है।
  16. सूखे बेल के पत्तों के चूर्ण में शहद मिला कर एक चम्मच सुबह-शाम सेवन करे या पके बेल के गूदे में थोड़ी मलाई मिलाकर खाने से मूत्र और वीर्य रोग ठीक होते हैं।
  17. बेलगिरी, असगंधा और मिश्री को बराबर मात्रा में मिला कर उसमें 1/4 भाग उत्तम केसर का चूर्ण मिलाकर, एक चम्मच सुबह-शाम गर्म दूध के साथ सेवन से कमजोरी दूर होगी।
  18. रक्त की कमी में पके हुए सूखे बेल की गिरी का चूर्ण मिश्री मिला गर्म दूध के साथ एक चम्मच पावडर प्रतिदिन के सेवन से शरीर में नए रक्त का निर्माण होकर स्वास्थ्य लाभ मिलता है।
  19. बेल के पके गूदे को 6 -7 घंटे पानी में भीगी इमली और 50 ग्राम बूरा मिला दही में मिला कर मिक्सी आदि में घोंट कर शरबत बना लें। इस शर्बत का कुछ दिन तक नियमित सेवन करे।
  20. 100 ग्राम बेलगिरी चूर्ण में 20 -20 ग्राम अदरक और इलायची के चूर्ण को पीसकर इसमें इच्छानुसार मिश्री मिलाकर रख लें और खाने के बाद आधा चम्मच चूर्ण गुनगुने पानी से सुबह शाम सेवन से पाचन क्रिया मजबूत होती है और भूख खुलकर लगती है। पका हुआ बेल गिरी फल खाने से मंदाग्नि नष्ट होती है और बुखार में भी आराम होता हैं।
  21. आधा किलो बेल के गूदे को 250 ग्राम साबुत मसूर के बने काढ़े में मिला कर 250 ग्राम देशी घी में पका लें फिर इसे कांच के चांदी के या मिट्टी के बर्तन में डाल कर रख लें एक चम्मच के नियमित सेवन से यह नुस्खा पीलिया, कामला, हैजा, पेट के सभी रोगों और पथरी जैसी बीमारियों में अदभुत असर दिखाती है।
  22. बेलगिरी को चावल के पानी (मांड) में पीसकर उसमें थोड़ी सी चीनी मिलाकर दिन में 2-3 बार पीने से गर्भवती स्त्री की उल्टी, पतले, दस्त, मंद-मंद बुखार चढ़ना, हाथ-पैरों की थकावट होना आदि सभी रोग दूर हो जाते हैं।

कब्ज, उल्टी और दस्त के रोगों के लिए

  1. बेल की छाल का काढ़ा पीने से अतिसार (दस्त) ठीक होता है।
  2. बेल गिरी का चूर्ण छाछ के साथ मिलाकर पीने से दस्त रुक जाता है।
  3. खांड के साथ बेल के गूदे को खाने से संग्रहणी दस्त) रोग ठीक होता है।
  4. पका हुआ बेल का फल का शर्बत पेट की आँतों को साफ कर उन्हें नयी ताकत देता है।
  5. यह कफ विकार, बुखार, बवासीर, अतिसार और पेचिश में अत्यधिक लाभ प्रदान करता है।
  6. वेगपूर्ण खूनी दस्त हो तो मात्र कच्चे फल का चूर्ण 5 ग्राम 1 चम्मच शहद के साथ 3-4 बार देते हैं।
  7. बेल के अंदर के गूदों को दही, छाछ तथा गुड़ के साथ खाने से खूनी पेचिश के रोगी को फायदा होता है।
  8. बेल के हरे पत्तों को सोंठ के साथ पानी में उबालकर काढ़ा बनाकर पीने से उल्टी और दस्त बंद हो जाते हैं।
  9. बेलगिरी का बारीक पिसा हुआ चूर्ण और अलसी के पत्तों का काढ़ा बनाकर पीने से दस्त ठीक हो जाते है।
  10. बेल की गिरी को सौंफ के रस में घिसकर पिलाने से बच्चों को आने वाले हरे और पीले दस्त ठीक हो जाते हैं।
  11. कब्ज व पेचिश में बेल के पत्तो का रस  लगभग 10 ग्राम 2-3 घंटे के अंतर से दिन में कई बार सेवन कराते है।
  12. सामान मात्रा में बेलगिरी और तिल को मिलाकर, मलाई या घी के साथ सेवन करने से पेचिस में आराम होता है।
  13. बेल गिरी  का चूर्ण और सोंठ के चूर्ण को गुड़ के साथ मिलाकर रोगी को देने से हर तरह का दस्त का रोग ठीक हो जाता है।
  14. पुरानी पेचिश व कब्जियत में पके फल का शरबत या 10 ग्राम बेल 100 ग्राम गाय के दूध में उबालकर ठण्डा करके सेवन करे।
  15. 15 -20 ग्राम कच्ची बेल को गर्म बालू या राख में सेंककर उसके गूदे में थोड़ी चीनी और शहद मिलाकर पिलाने से पेचिश में आराम मिलता है।
  16. बेल के फल के नियमित सेवन से कब्ज सदा के लिए समाप्त हो जाती है। कब्ज के रोगियों को बेल का शर्बत बना कर नियमित सेवन करना चाहिए।
  17. बेल का फल कब्ज की आदत को तोड़ कर बवासीर को रोकता है, आँतों की कार्य क्षमता को बढाता है, भूख को सुधारता है और इन्द्रियों को बल प्रदान करता है।
  18. होम्योपैथी में बेल के फल व पत्र दोनों को समान गुण का मानते हैं। काली मिर्च के साथ दिया गया बेल के पत्तो को पीलिया तथा पुराने कब्ज में आराम पहुँचाता है।
  19. बेल गिरी और मिश्री 50 -50 ग्राम लेकर एक गिलास पानी में मिलाकर शर्बत बना लें और हर रोज इसका सेवन करने से कब्ज़ नष्ट होकर, चेहरे पर चमक आ जाएगी।
  20. कच्चे बेल को धूप में सुखा लें। इन्हें बारीक पीस कपड़छान करके शीशी में भर लें। छोटे बच्चों के दाँत निकलते समय दस्तों में भी यह चुटकी भर चूर्ण शहद के साथ चटाये।
  21. कच्चे बेल को आग में भून कर उसका गूदा, रोगी को खिलाने से पतले दस्त (अतिसार) में फौरन लाभ मिलता है। आंतों के रोगियों के लिए बेल का एक फल प्रतिदिन सेवन करना चाहिए।
  22. पका फल न मिलने पर कच्चे बेल फल को गरम बालू रेत या राख में भूनकर खाना चाहिए। कच्चे या पके बेल उपलब्ध न हों तो कच्चे फल के गुद्दे को धूप में सुखाकर चूर्ण बनाकर रख लेना चाहिए।
  23. कच्चे फल के गूदे का चूर्ण और सामान मात्रा में काले तिल का चूर्ण लेकर दोनों को मिला कर घी के साथ मिला कर दस ग्राम चूर्ण सुबह शाम सेवन करे। यह उपयोग पतले दस्त में बहुत लाभकारी है।
  24. कब्ज में शाम को बेल का मुरब्बा या गुद्दा मिश्री के साथ ली जाती है। अग्निमंदता, अतिसार में बेल का गूदा गुड़ के साथ पकाकर या शहद मिलाकर देने से खुनी दस्त व खूनी बवासीर में लाभ पहुँचाता है।
  25. पुरानी पेचिस, अल्सरेटिव कोलाइटिस जैसे जीर्ण असाध्य रोग में भी यह लाभ करता है। गैस एवं हैजे में अत्यंत उपयोगी और अचूक औषधि माना है। इसमें विषाणु के प्रभाव को निरस्त करने तक की क्षमता है।
  26. बेल के फूलों को प्यास, उल्टी और दस्त को खत्म करने वाला बताया गया है। बेल के फूलों को पानी में 2 घंटे के लिए डालकर रख दें इन फूलों को पीसकर पानी में छान लें और मिश्री मिलाकर दिन में कई बार पीने से उल्टी आना बंद हो जाती है।
  27. साबूत कच्चे बेल के फल को गर्म राख में भूनकर इसे छिलके सहित पीसकर रस निकालकर मिश्री मिलाकर दिन में दो बार नियमित 10-15 दिन तक सेवन करने से पुराना दस्त ठीक हो जाता है।
  28. बेलगिरी को गुड़ के साथ नियमित दिन में 3 बार खाने से खूनी दस्त धीरे धीरे समाप्त हो जाता है।
  29. बेलगिरी, कत्था, आम की गुठली की गिरी, ईसबगोल की भूसी और बादाम गिरी इन सब को बराबर मात्रा में मिलाकर चीनी या मिश्री के साथ रोजाना 3-4 चम्मच सेवन करने से पुराने दस्त, तथा पेचिश में आराम मिलता है। बेल की गिरी और आम की  गुठली की गिरी को बराबर मात्रा में पीसकर एक चम्मच चावल के पानी के साथ या ठंडे पानी के साथ सुबह-शाम सेवन करने से दस्त ठीक हो जाता है।

दमा, कफ और खांसी के रोगों के लिए

  1. पके फल का सेवन वात और कफ का शामक होता है।
  2. बेल के पत्तों का रस का शहद के साथ सेवन करने से खांसी दूर हो जाती है।
  3. बेल के पत्तों और अडूसे के पत्तों का 5-5 ग्राम रस तथा सरसों के तेल को मिलाकर सप्ताह भर नियमित सेवन से श्वास (दमा) रोग  में आराम आता है।
  4. दमा के रोगीयो के जमा कफ को बहार निकालने के लिए बेल की पत्तियों का काढ़ा एक-दो चम्मच सुबह-शाम शहद मिला कर सेवन करे या एक चम्मच बेल पत्तो का रस में बराबर मात्रा में सरसों का शुद्ध तेल मिला कर सेवन करे।
  5. 100 ग्राम बेल गिरी को आधा किलो पानी में हल्की आँच पर तीन सौ ग्राम रह जाने तक पका कर उतार कर छान लें। एक किलो मिश्री की एक तार चासनी बनाकर इसमें मिला ले। इसमें थोडा केसर और जावित्री डालकर इसे गुनगुना घूँट-घूँट कर सेवन से छाती में जमे कफ से राहत मिलती है।

नेत्र (आँखें) के रोगों के लिए

  1. बेल के पत्त्तों की लुगदी आँख पर बाँधने से आँख में दर्द होने पर काफी आराम मिलता है।
  2. गर्मी से आँखें में जलन और लाल हो जाती है इसके बेल के पत्तों का रस एक-एक बूँद आँखो में डाले। आँखों की लाली व जलन ठीक होगी।
  3. आँखें दुखने पर पत्तों का रस, स्वच्छ पतले वस्त्र से छानकर एक-दो बूँद आँखों में टपकाएँ। दुखती आँखों की पीड़ा, चुभन, शूल ठीक होकर, नेत्र ज्योति बढ़ेगी।

मधुमेह के रोगों के लिए

  1. श्वांस एवं मधुमेह रोगों के निवारण हेतु भी पत्र का रस सफलतापूर्वक प्रयुक्त होता है।
  2. बेल की पत्तियों का रस का दिन में दो बार सेवन करने से डायबिटीज की बीमारी में भरपूर राहत मिलती है।
  3. मधुमेह [शुगर] के रोगियों को बेल के ताजा बीस ग्राम पत्तों का रस रोज सेवन करे फायदा मिलेगा इससे हैजा और मल त्याग में आने वाली अनेक परेशानियों से भी निजात मिलती है।
  4. बेल की सूखी पत्तियां, ग्वारपाठा, मेथी दाना, जामुन की गुठली और करेले की पत्तियों को पीसकर चूर्ण बना कर एक चम्मच चूर्ण रोजाना पानी के साथ सेवन करने से मधुमेह रोग ठीक हो जाता है।
  5. बेल गिरी शक्तिवर्धक तथा दिल को मजबूत बनाने वाला है पत्तो का रस मधुमेह एवं श्वांस रोग में लाभकारी है। 10-15 बेल के पत्ते और पाँच काली मिर्च पीस कर चटनी बना कर रोज खाए तो मधुमेह नियन्त्रित होता है।
  6. बेल और नीम के 10 -10 पत्ते तथा तुलसी के 5 पत्ते एक साथ पीसकर गोली बनाकर सुबह रोजाना पानी के साथ सेवन करने से मधुमेह के रोग में फायदा मिलता है। 10 ग्राम बेल का रस रोजाना पीने से मधुमेह रोग में शर्करा आना कम हो जाता है।
  7. 5-5 ग्राम बेल के पत्ते, हल्दी, हरड़, बहेड़ा, आंवला, और गिलोय को एक गिलास पानी में रात को कांच या मिट्टी के बर्तन में भिगों दें। सुबह इसे खूब मसलकर और छानकर आधी मात्रा में सुबह-शाम 2 महीने तक रोगी को सेवन कराने से मधुमेह नियमित होता है।

आंव के रोगों के लिए

  1. अधपके बेलफल का प्रतिदिन सेवन करने से पुराने आँव रोग से निजात मिलती है।
  2. बेल की जड़ का काढ़ा बनाकर मिश्री को डालकर बच्चों को पिलाने से आंव आना रुक जाता है।
  3. पाचन तंत्र में खराबी के कारण आंव के रोगी को बेलगिरी और बराबर मात्रा में आम की गुठली की गिरी कूट-छान कर चूर्ण बना लें। आधा ग्राम चूर्ण सुबह चावल की माड के साथ दिन दो-दो घंटे बाद सेवन करें। दूसरे दिन दो बार और तीसरे दिन सिर्फ़ सुबह लें। आंव बन्द हो जाने पर चूर्ण न लें। इससे रोग के कारण से आयी हुई कमजोरी भी दूर होती है।

बदन दर्द और चोट के लिए

  1. चोट और सुजन पर बेल के पत्ते बांधने से दर्द और सूजन कम होती है।
  2. शरीर में कहीं दर्द हो तो इसके कच्चे फल के गूदे का चूर्ण गुड मिला कर खाएं।
  3. बेल से दर्द निवारण भी होता है बदन दर्द के लिए कच्चे फल के गूदे का चूर्ण गुड में मिला कर खाने से बदन दर्द में राहत मिलती है।
  4. गुम चोट या मोच आने पर बेल पत्रों को पीस कर थोड़े गुड़ में पकाकर पुल्टिस बना कर मोच या चोट पर दिन में तीन चार बार गर्म करके बाँधने पर आराम आ जाएगा।
  5. बेल के सूखे पत्तों का चूर्ण बनाकर जख्मों पर बांधने से जख्म जल्द ही भर जाते है। बेल के बीजों का काढ़ा बनाकर पीने से पेट के जख्मों का दर्द मिट जाता है।
  6. बेल के चूर्ण को गरम किए ठन्डे तेल में मिलाकर पेस्ट बना लें। इसे जले स्थान पर लेप करने से फौरन आराम मिलता है। पके बेल के गूदे का भी लेप किया जा सकता है।
  7. बेल के पत्तों को पानी के साथ पीस, छानकर उसमें थोड़ी सी मिश्री मिलाकर दिन में 3-4 बार रोगी को पिलाने से छाती की जलन में आराम मिलता है।

हृदय (दिल) के लिए

  1. विषम ज्वरों के लिए बेल की जड़ का चूर्ण व बेल के पत्तो का रस उपयोगी है।
  2. बेल की जड़ की छाल का काढ़ा बनाकर पीने से दिल की धड़कन सामान्य होती है।
  3. हृदय की अनियमितता में फल, संकर्मण रोगों में बेल के पत्तो का रस का प्रयोग होता है।
  4. 10-10 ग्राम बेलपत्र रस और शहद में 5 ग्राम देशी घी मिलाकर चाटने से दिल के रोगो में लाभ होता है।

सर दर्द  के लिए

  1. सूखी बेल की जड़ को पानी के साथ पीसकर माथे पर गाढ़ा लेप लगाने से सिर दर्द में लाभ होता है।
  2. बेल गिरी को पानी या दूध में उबाल कर 10-15 दिन तक पीने से पुराना सिर का दर्द भी ठीक हो जाता है।
  3. सर दर्द में बेल पत्र के रस से भीगी पट्टी माथे पर रखें। आठ-दस  बेल पत्तों का रस निकाल कर थोड़े पानी के साथ पीने से कितना ही पुराना सर दर्द हो ठीक हो जाएगा।

बवासीर के लिए

  1. कच्चे बेल गिरी का चूर्ण तथा सोंठ चूर्ण को दिन में 3 बार सेवन करने से खूनी बवासीर में आराम मिलता है।
  2. खूनी बवासीर के लिए पके बेल के गूदे का सोठ मिला कर काढा बना एक हफ्ते तक सेवन करे खूनी बवासीर ठीक होगा।
  3. बेलगिरी के चूर्ण में बराबर मात्रा में मिश्री को मिलाकर एक चम्मच ठंडे पानी के साथ सेवन करने से खूनी बवासीर में लाभ मिलता है।

बच्चों के लिए

  1. बच्चों के पेट में कीड़े होंने पर बेल फल के पत्तों का रस पिलाए।
  2. जब बच्चों को दाँत निकलते समय दस्त लगते हैं तो बेल का 10 ग्राम चूर्ण एक कप पानी में पकाकर 20 ग्राम बाकी रह जाने पर एक चम्मच शहद में मिलाकर बच्चे को 2-3 बार चटाए।

गर्मी के लिए

  1. गर्मियों में लू लगने पर मिश्री डालकर बेल का शर्बत पिलाएं तुरंत राहत मिलती है। बेल के ताजे पत्तों को पीसकर मेहंदी की तरह पैर के तलुओं ,सिर, हाथ, छाती पर भी इसकी मालिश करें।

R K Rao

 

 

 

बथुआ (Chenopodium album)
September 26th, 2011

बथुआ

बथुआ सर्दीयों के मौसम में दुनिया भर में आसानी से पाया जाने वाला पोधा है,जो मनुष्य के लिए अत्यंत गुणकारी होता है डाक्टरों की  राय में बथुए को भोजन में किसी न किसी रूप में अवश्य शामिल करना चाहिए। यह स्वास्थ्य के लिए काफी फायदेमंद होता है। बथुए का साग पोष्टिक गुणकारी तथा स्वादिष्ट होता है। भारत में बथुए के पतों से साग, रायता पराठे पकौड़े आदि बनाकर खूब प्रयोग किया जाता है। सुबह के समय इसका प्रयोग सबसे अधिक गुणकरी होता है। बथुआ में विटामिन ए भरपूर मात्रा में होता है जो की नेत्र ज्योति के लिए बहुत आवशयक होता है जिससे बथुआ के सेवन से नेत्र ज्योति व इससे संबंधीत रोग ठीक होते हैं। यह वात, पित्त और कफ मे बहुत लाभदायक है.शरीर की मांसपेशीयों को मजबूत करके शरीर को बल प्रदान करता है।

बथुए में आयरन, पारा, सोना, क्षार, कैल्सियम और विटामिन ए व डी का भरपूर भंडार है। बथुए से कब्ज, पेट में गैस और इससे उत्पन्न सिरदर्द, आँखों की लाली या सुजन, चरम रोग ,यकृत विकार में भी लाभकारी होता है बथुआ रक्त को शुद्ध करके उसमे वृद्धि करता है बुखार और उष्णता में भी इसका उपयोग बहूत ही कारगर होता है। खनिज लवणों की प्रचुरता से बथुए के सेवन से औरतों में आयरन, कैल्सियम तथा रक्त की कमी की पूर्ति बखूबी होती है। यह एनिमिया रोग को दूर करता है। बथुआ शुक्रवर्धक भी होता है। इसकी पतियों के रस की तासीर ठंढी होने के कारण बुखार, फेफड़ों एवं आँतों की सुजन में फायदेमंद है बथुए का रस बच्चों को पिलाने से उनका मानसिक विकास होता है। बथुए का रस बच्चों को पिलाने से उनका मानसिक विकास होता है तथा जीवन शक्ति को बढाता है।

बथुए के औषधीय गुण :-

  1. रोगों के निवारण के लिए भी घरेलु औषधि के रूप में इसका प्रयोग खूब किया जाता है। शरीर में रक्त की कमी होने पर कुछ दिनों तक बथुए के साग का सेवन करने अथवा आटे के साथ मिलाकर रोटी बनाकर खाने से रक्त की वृद्धि होती है।
  2. फोड़े,फुंसीया और त्वचा पर चकते होने पर मुल्तानी को बथुए के रस के साथ लेप बनाकर लगाने से आराम मिलता है साथ में बथुए का साग या इस का रस का सेवन भी करना चाहिये इससे रक्त की शुद्धि होती है।
  3. फोड़ा होने पर बथुए की पतियों को सोंठ व नमक को साथ पीसकर फोड़े पर बांधने से फोड़ा बैठ जाता है या पककर ठीक हो जाता है ।
  4. पीलिया होने पर बथुए का साग खाए तथा सूप बनाकर पीने से पीलिया ठीक हो जाता है।
  5. गर्भवती महिला को प्रसव से 20 दिन पहले बथुआ के 10 ग्राम बीजों को कूटकर काढ़ा बनाकर पिलाये इससे बच्चा बिना ओपेरेसन और कम प्रसव पीड़ा के बच्चे पैदा होते है।
  6. बथुए की पत्तियों को कच्चा चबाने से मुंह का अल्सर, श्वास की दुर्गध, पायरिया और दांतों से जुड़ी काफी बिमारियों में बड़ा लाभ होता है।
  7. पेट की समस्याएं (भूख में कमी, भोजन का देर से पचना, खट्टी डकार, पेट का फूलना और बवासीर आदि  में लगातार कुछ सप्ताह तक बथुआ खाना काफी गुणकारी होता है।
  8. बथुए की लाल पत्तियों को इकट्ठा कर लगभग आधा कप रस निकाल कर सेंधानमक डालकर सेवन करने से दिल के रोगों में आराम मिलता है।
  9. तिल्ली बढ़ने पर उबला हुआ बथुआ काली मिर्च और सेंधा नमक के साथ लेंने से तिल्ली धीरे-धीरे घट जाती है ।
  10. उबाले हुये बथुए का रस, पिने से पेट के हर प्रकार के रोग यकृत, तिल्ली, अजीर्ण, गैस, कृमि, दर्द, अर्श पथरी आदि ठीक हो जाते हैं।
  11. कच्चे बथुआ के एक गिलास रस में शक्कर को मिलाकर पिने से पत्थरी टूट-टूटकर बाहर निकल जाती है।
  12. बथुआ का रस संक्रामक रोगों (मलेरिया, बुखार और कालाजार) में भी फायदेमंद होता है।
  13. बथुआ का साग, रस और इसका उबला हुआ पानी आदि किसी भी रूप में सेवन से या बथुआ और चौलाई की भुजी को मिलाकर सेवन करने से कब्ज ठीक हो जाती है।
  14. बथुआ के बीजों का चूर्ण शहद के साथ मिलाकर पीने से आमाशय की सफाई करके पित्त और कफ (बलगम) को भी बाहर निकाल देता है।
  15. कच्चे बथुए के रस में शक्कर मिलाकर रोज पीने से पथरी गलकर बाहर निकल जाती है।
  16. आँखों में सूजन या लाली हो तो प्रतिदिन बथुए की सब्जी खाएँ।
  17. बथुआ के बीजों को पीसकर 1 चम्मच शहद में मिलाकर चाटने से पेट के कीड़े दूर हो जाते हैं, या बथुए का रायता, साग,रस, काढ़ा आदि का सेवन करने से पेट के किडे स्वयं ही मर जाते है। कच्चे बथुआ के रस में इच्छानुसार नमक मिलाकर रोजाना पीने से भी पेट के कीड़ें खत्म हो जाते हैं।
  18. बथुए की पतियों के उबले हुए गुनगुने पानी से सिर धोने से सारे जुएँ और लीखे ख़त्म हो जाते है और सिर के बाल भी साफ हो जाता है।
  19. बथुए के 20 ग्राम बीज को पानी में उबालकर, छानकर गर्भवती स्त्री को पिला देने से प्रसव पीड़ा कम हो जाती है।
  20. अनियमित मासिक धर्म के लिए 50 ग्राम बथुए के पत्तो का काढ़ा कर नियमित कुछ दिनों तक पीने से मासिक धर्म नियमित होता है ।
  21. गुर्दा, मूत्राशय और पेशाब के रोगों में बथुआ का रस पीने से काफी लाभ मिलता है।
  22. बथुआ के बीस ग्राम बीजों को एक गिलास पानी में उबालकर काढ़ा बना कर पीने से गर्भपात हो जाता है।
  23. बथुआ को उबाल कर नींबू का रस, नमक और जीरा मिलाकर पीने से पेशाब की जलन और दर्द ठीक होता है ।
  24. चर्म रोगों (सफेद दाग, दाद, खुजली फोड़े) में बथुवे को प्रतिदिन उबालकर इसका रस पीना चाहिए।
  25. बथुआ उबालकर इस पानी से दर्द वाले घुटने की सिंकाई करें .बथुए का साग अधिक से अधिक खाएं.कुछ दिनों में ही घुटने के दर्द से राहत मिलने लगेगी।
  26. बथुआ उबालकर पानी छान कर नियमित चेहरा धोये, चेहरा मुलायम और सुन्दर दिखने लगेगा तथा झुर्रियां भी कम होंगी।
  27. बथुए के उबले हुए पानी से चर्म को धोएँ। बथुए के कच्चे पत्तो का रस में तिल का तेल (4/1भाग में) मिलाकर मंद-मंद आग पर पानी जैसा रंग हो जाने तक गर्म करें और छानकर शीशी में भर लें इसे चर्म रोगों पर लंबे समय तक नियमित मालिस करने से लाभ होगा।
  28. हरे बथुए के पत्तों का नियमित सेवन करने से मनुष्य की मर्दानगी बढ़ती है, खून की वृद्धि होती है, याददाश्त तेज और आमाशय मजबूत होता है, पथरी, कब्ज और पेट में होने वाली जलन से छुटकारा मिलता है। यदि हरा बथुआ न मिले तो इसे सूखाकर रोटी ,सब्जी में मिलाकर खाने से भी बहुत लाभ होता है।
  29. आप इसे (बथुए को) अपनी इच्छा अनुसार किसी भी रूप में अवश्य सेवन करे इससे फायदा ही होगा।

सावधानी :- पथरी के रोगी को बथुए के साग का सेवन नहीं करना चाहिये,क्योंकी इसमें लौह तत्व अधिक होने के कारण से पथरी का निर्माण भी होता है।

R K Rao

 

ईलायची (CARDAMOM)
September 16th, 2011

ईलायची
  • छोटी ईलायची की भीनी खुशबू मन को बहुत भाती है। ईलायची हमारे जीवन मे बहुत उपयोगी और सुगन्धित मसाला है। यह दो प्रकार की होती है। छोटी हरी ईलायची तथा बड़ी ईलायची छोटी ईलायची स्वाद में चरपरी, हल्की और शीतल होती है। इसका प्रयोग घर में, पान की दुकान में और औषधि के रूप में काफी किया जाता है। बड़ी ईलायची व्यंजनों को लजीज बनाने के लिए मसाले के रूप में प्रयोग होती है, हरी ईलायची मिठाइयों की खुशबू और सुन्दरता बढ़ाती है। ईलायची का भोजन मे पकवानों में तथा मिठाईयों को स्वादिष्ट और सुगन्धित बनाने में खूब प्रयोग किया जाता है। आयुर्वेद मे ईलायची को एक औषधि के रुप मे भी प्रयोग मे लाया जाता है। ईलायची बारह माह प्राप्त होने वाली औषधि है, ईलायची दुनिया भर के लोग खूब इस्तेमाल करते है। इसमें सांसों में दुर्गंध मिटाने वाले और बैक्टीरिया को मारने वाले गुण मोजूद होते है।
  • ईलायची में कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, वाष्पशील तेल, कच्चे फाइबर, कैल्शियम, फास्फोरस, मैंगनीज, पोटेशियम और लौह तत्व पाए जाते है। ईलायची में नियासिन और विटामिन सी सहित कई महत्वपूर्ण विटामिन पाए जाते हैं जो स्वास्थ्य के लिए अत्यंत आवश्यक हैं। ईलायची में एक बहुत ही आकर्षक गंध होती है जिससे नर्वस सिस्टम को स्फूर्ति मिलती है। एक थके और उदास व्यक्ति को ईलायची डालकर बनी चाय पिलाने से चमत्कारीक स्फूर्ति मिलती है। ईलायची में एंटीआक्सीडेंट होता है। जीससे रोगप्रतिरोधक क्षमता बढ़ने के साथ साथ चेहरे पर चमक आती है और जल्दी झुर्रियां भी नहीं पड़ती व ईलायची डालने से चाय का गुण भी कई गुना बढ़ जाता है। ईलायची में सुगंधित तेल, उपयोगी रसायन तथा विभिन्न प्रकार के टरपिंन्स रसायन पाये जाते हैं। ईलायची शीतल, पाचक, सुगंधित, रूचिकर और स्वाद में मधुर होती है। वह हृदय बलदायक, कफनशाक, वमननाशक, दुर्गंधनाशक मूत्रजनक, पिडाहारक, मुखशोधक, अग्निगंध तथा बलदायक होती है।
  1. सांसो की बदबू को हटाने के लिए छोटी ईलायची को कुछ देर तक चबाते है तथा भारत में चाय में भी इसका बहुत उपयोग होता है।
  2. ईलायची के दाने मुंह में रखकर धीरे धीरे चबाने से आसपास का वातावरण लुभावना लगता है, मुंह सुगंधित और साफ रहता है। पेट विकार दूर होते हैं और पाचन क्रिया ठीक रहती है।
  3. गले का बठना और खराश के लिए सुबह शाम छोटी ईलायची चबा-चबाकर खाएँ तथा गुनगुना पानी पीएँ। मूली के पानी में छोटी ईलायची पीसकर सेवन करने से गले की सूजन में लाभ मिलता है।
  4. खाँसी- जुकाम के लिए एक छोटी ईलायची, एक अदरक का टुकड़ा, लौंग तथा पाँच तुलसी के पत्ते एक साथ पान में रखकर खाएँ।
  5. बड़ी ईलायची को पानी में एक-चौथाई रह जाने तक उबाले तथा ठंडा कर के उलटी लगाने पर रोगी को दे इससे रोगी की उल्टियाँ बंद हो जाती हैं।
  6. मुँह में छाले हो जाने पर बड़ी ईलायची का बारीख चूर्ण में पिसी मिश्री मिलाकर मुँह में डाल कर रखे शीघ्र परिणाम मिलते है।
  7. केले ज्यादा खा लिए हो तो एक ईलायची खा लेंने से केले शीघ्र हजम हो जाते है।
  8. सफ़र करते वक्त यदि जी मिचलाता या घबराता है तो छोटी ईलायची मुँह में रख लें शीघ्र राहत मिलती है।
  9. हैजा हो जाये तो एक माह तक ईलायची का चूर्ण या इसके तेल की 5-7 बुँदे अनार के शर्बत के साथ पीने से जी घबराने और उल्टियों से छुटकारा मिलता है।
  10. स्मरण शक्ति बढाने तथा आँखों की कमजोरी दूर करने के लिए ईलायची के बीज, बादाम और पिस्ता को एक साथ भिगोकर बारीख पीस कर गाढ़ा होने तक दूध में पकाएँ और मिश्री मिलाकर धीमी आँच पर गाढ़ा होने तक फिर पकने दें और रोगी को सेवन कराये।
  11. ईलायची बीज का चूर्ण में इसबगोल की भूसी बराबर मात्रा में मिलाकर और आंवले के रस में यह मिश्रण डाल कर गोलियां बना लें। सुबह-शाम गाय के दूध से एक-एक गोली लेने से स्वप्नदोष की समस्या ठीक होती है।
  12. छोटी ईलायची के दाने, सफेद मिर्च, बादाम, मिश्री व शुद्ध देसी घी मिलाकर खाली पेट लें। आंखों की जलन दूर होती है और नेत्र ज्योति बढ़ती है।
  13. आमतौर पर दांतों में संक्रमण के इलाज के लिए ईलायची का प्रयोग किया जाता है।
  14. ईलायची गैस से राहत पहुंचाने के साथ कलेजे की जलन को भी कम करती है।
  15. ईलायची की चटनी बनाकर माथे पर लगाने से सिरदर्द में शीघ्र आराम मिलता है, ईलायची चूर्ण को दूध में उबालकर पीने से सिरदर्द ठीक हो जाता है।
  16. धूप में जाते समय मुंह में ईलायची अवश्य रक्खे इससे मुंह से दुर्गन्ध नहीं आती और लु भी नहीं लगती ।
  17. ईलायची को मुहं में रखने से सांस लेने की तकलीफ में आराम मिलेता है।
  18. ईलायची के पाउडर को शहद के साथ चाटने से अस्थमा और कफ के रोगी को लाभ मिलता है।
  19. यात्रा पर जाते वक्त ईलायची साथ लेकर जाए जी ख़राब होने पर एक ईलायची मुहं में रखे उल्टी नहीं आएगी।
  20. ईलायची के चूर्ण को ठण्डे दूध में मिश्री मिलाकर पीने से हृदय में दर्द, पेट में जलन या गर्मी होने से लाभ मिलता है।
  21. ईलायची के चूर्ण में तुलसी की पत्ती और पोदीना की पत्ती के चूर्ण के साथ इमली के चूर्ण में मिश्री मिला कर चूसने से मानसिक थकान, चिड़चिड़ापन या गुस्से की अधिकता समाप्त होती है।
  22. कफ युक्त खांसी होने पर ईलायची के चूर्ण को दिन में तीन बार चूसने पर लाभ होता है।
  23. ईलायची के चूर्ण या दोनों को पान में चबाने से मुंह की दुर्गन्ध दूर करने में लाभ होता है।
  24. ईलायची के चूर्ण को ठण्डे दूध के साथ मिश्री मिलाकर उपयोग करने से मूत्र जलन में लाभ होता है।
  25. ईलायची के चूर्ण को शहद के साथ लगाने या चाटने से मुंह के छाले हो जाने पर लाभ होता है।
  26. ईलायची के चूर्ण को सामान मात्रा में नाग केसर का चूर्ण और मिश्री मिलाकर मलाई वाले दूध का सेवन करने से श्वेत प्रदर के रोगी को लाभ मिलता है।
  27. पिसी ईलायची का काढ़ा बना कर ठंडा होने पर मिश्री मिलाकर हर घंटे बाद 2-2 चम्मच पिएं। जी मिचलाने, उलटी होने, डकार कमजोर पाचन शक्ति आदि ठीक होती है।
  28. ईलायची तो चूर्ण को आंवला चूर्ण, सौंठ समान मात्रा में लेकर और थोडा सा सेंधा नमक लेकर ठंडे पानी से पीने से पेट दर्द, अफारा, गैस आदि में लाभ मिलता है।
  29. ईलायची के साथ अदरक, लौंग धनिया और चुटकी भर सेंधा नमक का काढ़ा बना कर सेवन से हाजमाँ प्रभावी ढंग से दुरुस्त होता है।
  30. ईलायची चूर्ण और समान मात्रा में काली मिर्च, सौंठ, दालचीनी को पानी में काढ़ा बनाकर गुनगुना सेवन करने से जुकाम ठीक होता है।
  31. ईलायची के चूर्ण को मिश्री के साथ चूसने से अधिक प्यास लगने या मुंह सूखने से राहत मिलती है।
  32. छिलके सहित छोटी ईलायची का चूर्ण और बराबर मात्रा में सोंठ मिला लें। एक घंटे बाद चुटकी भर मुंह में डाल कर चूसते रहने से काफ और सूखी खांसी दूर होगी और छाती हल्की हो जाएगी।
  33. ईलायची चूर्ण को पानी मिले कच्चे दूध में डाल कर फेंटें और खाली पेट प्रातः काल पीने से एसिडिटी दूर हो जाती है।
  34. छोटी ईलायची के चूर्ण के साथ भुनी हुई हींग का चूर्ण, नींबू रस के साथ लेंने से पेट का भारीपन, अफरा आदि से राहत मिलती है।
  35. ईलायची में असरकारक पाचन क्षमता होती है भोजन के बाद ईलायची का सेवन करने से भोजन शीघ्र हजम हो जाता है जी मचलाने पर एक छोटी ईलायची मुंह मे रखने से जी मचलना कम होता है
  36. ईलायची अर्क की दो बूंदें बताशे पर डाल कर एक दिन छोड़कर खाने में नकसीर आना बंद हो जाती है।
  37. दो ईलायची का चूर्ण चाय में डाल कर पीने से अपच के कारण हुआ सिर दर्द में राहत मिलती है।
  38. ईलायची के नियमित सेवन करने से दांतों और मसूड़ों में सड़न समाप्त होती है।
  39. ईलायची के नियमित सेवन करने से ब्लैड प्रशर नियमित होता है।
  40. ईलायची को आंवला, दही और शहद के साथ सेवन करने से पेशाब की जलन शांत होती है।
  41. ईलायची, काली मिर्च को घी में मिलाकर सेवन करने से अपचसे होने वाली होने वाली शिकायते दूर होती है।
  42. ईलायची को मुहं में डाल कर चबाने से सांस लेने की तकलीफ में आराम मिलता है, मंह से दुर्गन्ध ख़त्म होती है और उल्टी बंध होती है।
  43. साबुत ईलायची को आग में जलाकर राख कर लें तथा शहद में मिलाकर चाटे उल्टी बंद हो जाती है।
  44. साबुत हरी ईलायची 1 भाग, सौंफ 2 भाग, मिश्री 4 भाग तीनों को बारीख पीसकर मिला लें। प्रातः एक चम्मच चूर्ण दूध के साथ सेवन से नेत्र ज्योति बढ़ती है व दिल मजबूत होता है।
  45. ईलायची, लौंग, छोटी हरड़ और सेंधा नमक तीनों को सामान मात्रा में लेकर पीस लें। भोजन करने के बाद एक चम्मच चूर्ण, पानी के साथ सेवन करने से पेट रोग ठीक होते हैं।
  46. छोटी ईलायची, लौंग, सौंफ, थोडा नारियल बराबर मात्रा लेकर कूट-पीस कर मुँह में रखने से मुख शुद्ध और दाँत मजबूत होते हैं।
  47. स्वादिष्ट व सुगन्धित चाय बनाने के लिए साबुत हरी ईलायची, सौंठ, कालीमिर्च और दालचीनी समभाग में लेकर बारीख पीस लें चाय में अन्य वस्तुओं के साथ यह चूर्ण भी डाल कर चाय बनाए और स्वाद खुद अनुभव करे।

R K Rao

तुलसी (Holy Basil)
August 21st, 2011

तुलसी (Holy Basil)

  • तुलसी का भारत में महत्वपूर्ण स्थान है। हिंदू घरों में तुलसी का पौधा लगाने की प्रथा हजारों वर्ष पुरानी है। तुलसी एक राम बाण औषधि और औषधियों की खान हैं, आयुर्वेद ने इसे महा औषधि की संज्ञा दी हैं। तुलसी का धार्मिक और औषधिय महत्व है। आयुर्वेदिक औषधियों में तुलसी का खूब उपयोग होता है। इसके प्रभाव से मानसिक शांति घर में सुख समृद्धि और जीवन में अपार सफलताओं का द्वार खुलता है। आयुर्वेद के अनुसार तुलसी संजीवनी बुटि के समान है जो बड़ी-बड़ी जटिल बीमारियों को ठीक करके उनकी रोकथाम करने में सहायक है। इसकी जड़, तना, पत्तियां फूल तथा बीज सभी उपयोगी होते हैं। तुलसी का पौधा घर में वातावरण को पवित्र बनाता है और हवा में बीमारी के बैक्टेरिया आदि को नष्ट करता है। तुलसी का एक पत्ता रोज सेवन करने से हमारे शरीर की रोगप्रतिरोधक क्षमता काफी बढ़ जाती है। कभी बुखार नहीं आता ,तुलसी हमें श्वास संबंधी कई रोगों से बचाती है। तुलसी कई प्रकार की होती हैं इनमें कृष्ण यानि के श्याम तुलसी सर्वप्रिय मानी जाती है। तुलसी का प्रतिदिन दर्शन करना पापनाशक है तथा पूजन करना मोक्ष दायक माना जाता है। जिस घर में तुलसी और गाय है उस घर का सदस्य सदा निरोगी होता है। तुलसी का पौधा तमाम पौधों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण पौधा है। कार्तिक मास में प्रात:काल निराहार तुलसी के कुछ पत्तों का सेवन किया जाये तो वर्ष में मनुष्य रोगों से मुक्त रहता है। मंदिरों में आरती के बाद जो चरणामृत पिलाया जाता है उसमें 5 अमृत (तुलसी के साथ दूध, गंगाजल, शहद, गोमूत्र ) मिले होते हैं। तुलसी के पौधे से निकलने वाली सुगंध में मच्छरों का नाश करने की शक्ति होती है। तुलसी की पत्तियों का यथा सम्भव उपयोग नियमित आहार में करना चाहिए, तुलसी की पत्तियां बैक्टीरिया का नाश करती हैं। युगो से तुलसी की पत्तियों का रस तरकारी में और तुलसी की पत्तियां चावल और पुलाव में सुगंध के लिए डाला जाता था। तुलसी की गंध वायु के साथ जितनी दूर तक जाती हे, वहा का वातावरण और निवास करने वाले सब प्राणी पवित्र और निर्विकार हो जाते है।
  • जो व्यक्ति प्रतिदिन तुलसी की पांच पत्तियां खा लेते हैं वह अनेक प्रकार के रोगों से सुरक्षित रहते हैं। इसके तीन महीने तक सेवन करने से खांसी, सर्दी,बुखार, मलेरिया, कालाजार, जुकाम या काफ, जन्मजात जुकाम, श्वास रोग, दमा, स्मरण शक्ति का अभाव, पुराना से पुराना सिरदर्द, नेत्र-पीड़ा, उच्च अथवा निम्न रक्तचाप, ह्रदय रोग, शरीर का मोटापा, अम्लता, पेचिश, कब्ज, गैस, मन्दाग्नि,गुर्दे का ठीक से काम न करना, गुर्दे की पथरी खून की कमी,दांतों का रोग, सफ़ेद दाग तथा अन्य बीमारियां, गठिया का दर्द, वृद्धावस्था की कमजोरी, विटामिन ए और सी की कमी से उत्पन्न होने वाले रोग, सफेद दाग, कुष्ठ तथा चर्म रोग, शरीर की झुर्रियां, पुरानी बिवाइयां, महिलाओं की बहुत सारी बीमारियां, बुखार, खसरा आदि रोग दूर होते है। सिर, गले, नाक का दर्द, आंख के रोग, सूजन, खुजली, अजीर्ण, उलटी , हृदयरोग, कृमि, फोड़े, मुहांसे, जलन , बालतोड़, लू लगना, स्नायूपीड़ा, स्वप्नदोष, मूर्छा, विष आदि तथा स्त्रियों और बच्चों के सामान्य रोगों के लिए चिकित्सा स्वयं ही की जा सकती है। तुलसी स्वाईन फ्लू को दूर रखने के लिए उपयोगी है। तुलसी के उपयोग से मनुष्यों में रोग प्रतिरोधक क्षमता तीव्रता से बढ़ती है और खाली पेट बीस-पच्चिश तुलसी के पत्तों का सेवन करने से स्वाईन फ्लू से बचा जा सकता है। तुलसी दमा टी.बी .में गुणकारी हैं।
  • तुलसी की पत्तियां का बनाया गया काढ़ा शहद के साथ नीयमित 6 माह सेवन करने से किडनी की पथरी मूत्र के रस्ते से बाहर निकल जाती है। दिल की बीमारी में यह वरदान और खून में कोलेस्ट्राल को नियंत्रित करके थकान दूर करने वाले गुण भी पाए जाते हैं। इसके नियमित सेवन से “क्रोनिक-माइग्रेन” के निवारण में मदद मिलती है। तुलसी सेवन से जीवन अवधि में वृद्धि होती है। पुदीना और तुलसी के मिश्रण के लगातार सेवन से कैंसर पैदा होने की संभावना समाप्त होती है। उल्लेखनीय है कि कैंसर के इलाज में रेडिएशन के प्रभाव को कम करने के लिए “एम्मी फास्टिन” का प्रयोग महंगा तो है ही, इसके इस्तेमाल से लो- ब्लड प्रेशर और उल्टि की शिकायतें होती हैं। जबकि तुलसी के पेस्ट के प्रयोग से ऎसे दुष्प्रभाव सामने नहीं आते। विषैले बैक्टीरिया से बचाव की इसमें अदभुत क्षमता है। तुलसी टी.वी .में भी अत्यंत लाभकारी है।
  1. तुलसी की 20 से 35 स्वच्छ पत्तियाँ चटनी के जैसे  पीस लें और 10 से 30 ग्राम ताजा  मीठे  दही में अथवा शहद में मिलाकर प्रतिदिन प्रातः खाली पेट तीन माह तक दिनभर में एक बार ही लें। कैंसर जैसे असह्य दर्द और कष्टप्रद रोगो में 2-3 बार भी ले सकते हैं। आधा घंटे पश्चात नाश्ता ले सकते हैं। रासायनिक द्रव्यों एवं गुणों से भरपूर, मानव हितकारी तुलसी रूखी गर्म उत्तेजक, रक्त शोधक, कफ व शोधहर चर्म रोग निवारक एवं बलदायक होती है। 
  2. तुलसी के पत्ते पानी में डाल कर पानी का शुद्धिकरण किया जा सकता है । तुलसी के पत्तों को साफ पानी में उबाल कर उबले पानी को पीने में उपयोग करें। तुलसी की पत्तियो को छाछ या दही के साथ सेवन करें।

  3. तुलसी के पॉच पत्ते दो काली मिर्च, रात को पानी में भीगी व छिलका उतरी दो बादाम इन सब की चटनी बनाकर शहद के साथ सेवन करना उपयोगी है इसके बाद लगभग 40 – 45 मिनट कुछ भी न खाए।
  4. तुलसी की 5 पत्तियाँ या 2-3 चम्मच तुलसी के रस का सेवन प्रतिदिन सेवन करने वाले व्यक्ति की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ जाती है और वह सदा स्वस्थ रहता है। स्मरण शक्ति में वृद्धि होती है तथा व्यक्तित्व भी प्रभावशाली हो जाता है।
  5. तुलसी के रस में मच्छरों को नष्ट करने की अद्भुत क्षमता पाई जाती है जिससे मलेरिया बुखार से बचाव होता है।
  6. तुलसी के कुछ पत्ते डालकर चाय बना कर पिए तो सर्दी, बुखार व मांसपेशियों के दर्द में राहत मिलती है।
  7. सर्दी जुकाम होने पर तुलसी का अर्क या तेज बुखार को कम करने के लिए तुलसी की पत्तियों को चाय में उबालकर पीने से राहत मिलती है।
  8. तुलसी की 10 पत्तियों को 4 कालीमिर्च के साथ पीस कर सेवन किया जाए तो मलेरिया और मियादी बुखार दूर रहते हैं तथा पाचन शक्ति की कमजोरी समाप्त हो जाती है।
  9. तुलसी के कुछ पत्ते डालकर चाय बना कर पिए तो सर्दी, बुखार व मांसपेशियों के दर्द में राहत मिलती है।
  10. तुलसी में कोलेस्ट्रॉल की मात्रा नियंत्रित करने की क्षमता रखती है। इसके नियमित सेवन से भारी व्यक्ति का वजन घटता है एवं पतले व्यक्ति का वजन बढ़ता है यानी तुलसी वजन को संतुलन में रखता है।
  11. दोपहर भोजन के पश्चात तुलसी के पत्ते चबाने से पाचन शक्ति मजबूत होती है।
  12. तुलसी के काढ़े में थोड़ा-सा सेंधा नमक और सौंठ मिलाकर सेवन करने से कब्ज दूर होती है।
  13. तुलसी के पत्तो के साथ 4-5 भुने हुए लौंग चूसने से हर तरह की खाँसी से निजात मिलती है।
  14. तुलसी के रस में देसी शक्‍कर मिलाकर पीने से खाँसी और सीने के दर्द से छुटकारा मिलता है।
  15. तुलसी के पत्तो को पिस कर इसे त्वचा पर मलने से डिप्रेशन एवं लो ब्लड प्रेशर तुरन्त सामान्य होता है।
  16. तुलसी के रस को शहद के साथ सेवन करने से हिचकी बांध होती है तथा अस्थमा में भी आराम मिलता है।
  17. संक्रामक बीमारियों एवं स्मरण शक्ति को मजबूत करने के लिए पानी के साथ तुलसी की 5 पत्तियाँ रोजाना सुबह चबाये।
  18. तुलसी के रस की कुछ बूँदों में थोड़ा-सा नमक मिलाकर बेहोश व्यक्ति की नाक में डालने से रोगी शीघ्र होश में आ जाता है।
  19. सूखी पत्तियों का चूर्ण दही या छाछ और गुड के साथ सेवन करें। जिससे एसिडीटी अर्थात अम्लता की तकलीफ में लाभ होता है।
  20. तुलसी के पत्ते और नींबू का रस से बनी चटनी को गुड़ मिले ताजा पानी में घोलकर सेवन करने से रक्त का शुद्धिकरण करके रोग प्रतिरोधक शक्ति बढ़ाती है।
  21. तुलसी के पत्तो को पिस कर हर प्रकार की गुम चोट और पीड़ा, मोच आदि में लेप करते हैं। शरीर के बाहरी कृमियों में भी इसका लेप करते हैं।
  22. तुलसी के पत्तो को पिस कर नियमित सेवन से अरुचि, पेट दर्द तथा आँतों के कृमियों को बहार निकालने में उपयोगी है। यह रक्त को शुद्ध भी करती है।
  23. तुलसी के पत्तों का रस और अदरक का रस समान मात्रा में गर्म करके सेवन करने से पेट-दर्द, और पेट रोगों में लाभ होता है।
  24. तुलसी की जड़ को चूसने से खाँसी और बठे गले को आराम मिलता है।
  25. श्याम तुलसी का शुद्ध रस काली मिर्च के साथ सेवन करने से खाँसी का उबाल शान्त होता है।
  26. फेफड़ों में कफ की खरखराहट व खाँसी होने पर तुलसी की सूखी पत्तियाँ मिश्री के साथ देते हैं।
  27. हिचकी एवं श्वांस रोगों में तुलसी का शुद्ध रस दो भाग तथा एक भाग शहद के साथ देते हैं।
  28. तुलसी के पत्ते काले नमक के साथ सुपारी की तरह मुँह में रखने से श्वांस रोगों में आराम मिलता है।
  29. त्वचा यंहा तक कुष्ठ रोग की तुलसी सर्वश्रेष्ठ औषधि है। दाद, खाज, खुजली और ल्यूकोडर्मा जैसे त्वचा सम्बन्धी रोगों के लिए तुलसी के अर्क को प्रभावित जगह पर कुछ दिनों तक लगाये।
  30. तुलसी के पत्तो का रस खाँसी, दमा तथा इस कारण मांसपेशियों व रीड़ की हड्डी में जकड़न आदि में बहुत फायदे मंद है।
  31. जुकाम में समपूर्ण तुलसी चूर्ण (फल, फूल,जड़ ताना और पत्ते) व समान भाग में अदरक लेकर काढ़ा बनाये और इस का दिन में तीन बार सेवन करे।
  32. तुलसी के पत्तो का रस एवं गौ घृत दिन में 2 या 3 बार लेने से ज्वर और कब्ज भी मिटता है।
  33. तुलसी के पत्तो के रस को नियमित सेवन करने से पुराना कब्ज दूर होता है और उलटी होने को भी बंद करता है।
  34. तुलसी के पत्तो का काढ़ा या तुलसी के पत्तो का रस शहद के साथ 3-3 घंटे बाद सेवन करने से विषम ज्वर ठीक होता है।
  35. सभी प्रकार के ज्वरों के लिए बीस तुलसी के पत्ते एवं दस काली मिर्च का काढ़ा पिलाने से ज्वर तुरन्त उतर जाता है।
  36. मोतीझरा यानि के टायफाइड के लिए 10 -15 तुलसी के पत्ते 2 -3 ग्राम जावित्री के साथ पानी में पीसकर शहद के साथ दिन में तीन चार बार सेवन करे।
  37. उबाक या उलटी आने पर तुलसी के पत्तो का रस शहद के साथ आवश्यकता अनुसार सेवन करें। छोटी इलायची, अदरक का रस व तुलसी के पत्तों का रस मिलाकर पिने से उल्टी आना रुक जाती हैं।
  38. पेट की मरोड़ में तुलसी के पत्तो का रस को मिश्री के साथ देते हैं, संग्रहणी (खाने का नहीं पचाना) में तुलसी के बीजों का चूर्ण का सेवन सुबह-शाम मिश्री के साथ तथा बवासीर में इसी चूर्ण को दही के साथ करते हैं।
  39. पाचन शक्ति मजबूत करने के लिए, अपच रोगों तथा बच्चो के लीवर और तिल्ली संबंधी रोगों के लिए तुलसी के पत्तो का रस पिलाते हैं। तुलसी के 8-10 पत्तों को 3 ग्राम जीरे में पीसकर दिन में 3-4 बार चाटने से दस्त बंद हो जाते हैं।
  40. बच्चो के संक्रामक (मलेरिया, टायफायड, चेचक, इन्फ्लुएन्जा आदि) रोगों में तुलसी के बीज पीसकर देसी गाय के दूध में मिलाकर पीने से लाभ होता है।
  41. तुलसी के पत्तो का शुद्ध रस प्रतिदिन प्रातः पीने से कुष्ठ रोग में लाभ होता है।
  42. तुलसी पंचांग को नींबू के रस में मिलाकर लेप करने से दाद, खाज व खुजली ठीक होती है।
  43. तुलसी के बीज तथा गुलाब के फूल एक साथ पीसकर शरबत बनाकर पीने से फोड़े, कील- मुंहांसे निकलना बंद होता हैं।
  44. तुलसी के बीज व पुनर्नवा की पत्ती समान मात्रा में लेकर क्वाथ बनाकर पीने से पित्ती निकलने पर रोक लगाती है।
  45. तुलसी के पत्तो का रस और संतरे का रस मिलाकर चेहरा धोकर मुँहासों पर लेप करने से लाभ हैं।
  46. जख्मों भरने तथा संक्रमण ग्रस्त जख्मों को धोने के लिए तुलसी के पत्तों का क्वाथ बनाकर धोते है तथा लेप करते हैं।
  47. तुलसी व गिलोय का सामान मात्रा में लेकर क्वाथ बनाकर दिन में दो बार मिश्री के साथ लेने से रक्त विकारों में सुधार आता हैं।
  48. तुलसी के पाँच पत्ते जल के साथ प्रतिदिन प्रातः चबा चबा कर सेवन करने से बुद्धि कुशाग्र होती है।
  49. तुलसी के सूखे बीज शहद के साथ सेवन करने से आधा शीशी यानि माइग्रेन दर्द में लाभ होती है।
  50. तुलसी में अनेक गुणों के साथ-साथ थकान दूर करने तथा जटिल माइग्रेन के उपचार में मदद मिलती है।
  51. तुलसी के पत्तो का रस कपूर मिलाकर जटिल सर दर्द में सिर पर लेप करने से तुरन्त आराम मिलता है।
  52. तुलसी के सूखे पत्तों का चूर्ण कपडे में छानकर सूंघने से सिर दर्द में फायदा होता है।
  53. तुलसी का काढ़ा बना कर पीने से सिर दर्द में आराम आ जाता है।
  54. तुलसी का (वन तुलसी) फुल और काली मिर्च को अंगारे पर डाल कर धुंआ सूंघने से तेज सिर का दर्द भी ठीक हो जाता है।
  55. तुलसी का 2 ग्राम पंचांग चूर्ण गाय के दूध के साथ सुबह शाम सेवन से संधिशोध और गठिया दर्द में लाभ देता हैं।
  56. तुलसी के बीज शाम को पानी में भिगोकर इस पानी को सुबह सेवन करने से पेशाब की जलन शांत होती हैं।
  57. तुलसी के पत्तो का रस को मिश्री के साथ सुबह-शाम लेने से भी जलन में आराम मिलता है ।
  58. तुलसी के दो ग्राम बीज गाय के दूध के साथ सुबह और शाम को सेवन करने से धातु दौर्बल्य समाप्त होता हैं।
  59. तुलसी के साथ में शहद अथवा शक्कर मिलाकर खाने से चक्कर आना बंद हो जाता है।
  60. तुलसी के पत्तों को चबाने से खांसी कफ और नजले में मदद मिलती है।
  61. बच्चों को सर्दी और खांसी की शिकायत होने पर तुलसी के पत्ते का रस उपयोगी सिद्ध होताहै।
  62. तुलसी के पत्ते, अदरक और काली मिर्च से तैयार की हुई चाय पीने से खांसी-जुकाम में तुरंत लाभ पहुंचता है।
  63. तुलसी के बीजों का चूर्ण दस्तो में देने पर तुरन्त फायदा देता हैं।
  64. तुलसी के पत्तों का चूर्ण शहद में मिलाकर सेवन करने से बच्चो के दांत निकलतने में तथा तेज दस्तो में लाभ होता है।
  65. तुलसी और पान के पत्तो का रस बराबर मात्रा में मिलाकर दिन में तीन बार सेवन से छोटे बच्चो के पेट अफारे मे काफी लाभ होता है।
  66. तुलसी अपने आस पास के वायुमंडल को शुद्ध रखने तथा प्रदुषण को बचाने में सक्षम होती है ।
  67. किसी भी पेय जल में यदि तुलसी के पत्तों को डालकर सेवन किया जाए तो काफी रोगों से बचाव् होता है।
  68. तुलसी के नियमित सेवन से हमारे शरीर में उर्जा शक्ति का बहाव नियंत्रित होता है और उम्र में वृद्धि होती है।
  69. तुलसी के पत्ते से बना क्वाथ सेवन करने से सियाटिका रोग में लाभ मिलता हैं।
  70. तुलसी के प्रत्येक हिस्से में सांप का खतरनाख जहर भी निकलने की क्षमता होती है सांप के कांटे व्यक्ति को यदि समय पर तुलसी का सेवन कराया जाए और सांप के कटे के स्थान पर तुलसी की जड़ को मक्खन या घी में घिसकर लेप करने तो उस व्यक्ति की जान बच सकती है। इस प्रकिर्या में लेप के काले होने पर लेप को शीघ्र बदलना चाहिए क्योंकि जहर बहार आने से लेप काला हो जाता है।
  71. तुलसी की कुछ पत्तियों को हर रोज चबाने से अल्सर और मुंह का संक्रमण दूर हो जाता है।
  72. तुलसी के पत्ते कालीमिर्च के साथ पीसकर पिलाने से उलटी तथा ज्वर में शीघ्र लाभ होता है।
  73. तुलसी की जड़ को पीसकर, सोंठ मिलाकर जल के साथ प्रात: पीने से कुष्ठ रोगो में लाभ मिलता है।
  74. तुलसी की पत्तियों को उबालकर पीने से गले की खराश दूर हो जाती है। इस पानी से आप गरारा भी करे ।
  75. तुलसी के सम्पूर्ण सूखे पौधे का चूर्ण बना कर सेवन करने से लीवर को सक्रिय पाचक रस प्रदान होता है।
  76. तुलसी के पत्तों का एक चम्मच रस पानी में मिलाकर पियें एवं तुलसी पीसकर कर कीड़े के काटे भाग पर लगायें।
  77. तुलसी और अडूसे के पत्तों के रस बराबर मात्रा में मिलाकर सेवन करने से पुरानी खाँसी तक ठीक हो जाती है।
  78. तुलसी के रस में अदरक का रस व शहद मिलाकर सेवन करने से हर प्रकार की खाँसी में लाभ होता है।
  79. तुलसी के बीजों का चूर्ण बनाकर शहद के साथ चाटने से खाँसी और कफ,ठीक होता है तथा गले और सीने की खरखराहट मिटती है।
  80. तुलसी की सूखी पत्तियों को सरसों के तेल में मिलाकर दांत साफ करने से पायरिया सांसों की दुर्गध समाप्त हो जाती है।
  81. तुलसी के पत्तों को नमक के साथ पीसकर लगाने से बिरड, ततैया, बिच्छू के डंक का दर्द व जलन शीघ्र समाप्त हो जाती है।
  82. तुलसी के बीज के चूर्ण के सेवन से पेशाब की जलन व त्यागने में कठिनाई, ब्लैडर की सूजन व पथरी में तुरन्त फायदा होता है।
  83. तुलसी की पत्तियां सरसों के तेल में जल जाने तक पकायें तथा ठंडा होने पर 2 – 2 बूँद कान में डालने से कान के रोगों में आराम आता है।
  84. श्यामा तुलसी के अर्क की दो बूंदें रात में सोते समय आंखों में डालने से आंखों की जलन व आंखों की अन्य समस्यों से मुक्ति मिलती है।
  85. तुलसी की पत्तियों में तनाव रोधीगुण की मोजुदगी तनाव पीड़ित व्यक्ति तुलसी के 10 -12 पत्तों का दिन में दो बार सेवन कर सकता है।
  86. तुलसी के 25 -30 ताजे पत्ते पीसकर नियमित सेवन से कैंसर की वृद्धि की गति को रोकने के लिए कारगर हो सकती है।
  87. तुलसी के सूखे पत्तों को व फिटकरी खूब बारीक पीसकर घाव पर छिड़कने से घाव शीघ्र ठीक होता है।
  88. तुलसी का रस व नारियल तेल फेंटकर जले पर लगाने से जलन दूर होती है जख्म ठीक होता है व जख्म का निशान भी नहीं रहता।
  89. तुलसी, शहद और अदरक को मिलाकर बनाया गया काढ़ा पीने से ब्रोंकाइटिस, दमा, कफ और सर्दी में तथा श्वास संबंधी समस्याओं राहत मिलती है।
  90. मूत्रदाह की शिकायत में तुलसी के पत्तों का दो तोला रस पावभर दूध व डेढ़ पाव पानी में पिलाकर पी जाएँ।
  91. चिकनपॉक्स या मीजल्स होने की दशा में यदि दाने निकलने में वक्त लग रहा हो तो तुलसी की पत्तियों का काढ़ा केशर के साथ मिलाकर पिलाएँ। इससे दाने तेजी से निकलते हैं और बच्चे को राहत मिलती है।
  92. तुलसी के बीज का चूर्ण या जड़ बराबर मात्रा में पुराने गुड़ के साथ मिला कर इस की दो तीन ग्राम की मात्रा गाय के दूध के साथ दो माह तक सेवन करने से नपुसंकता में लाभ होता है।
  93. यह हर प्रकार के विषम ज्वर के चक्र से फ़ौरन निजात दिलाता है। नमक, लौंग और तुलसी के पत्तों से बनाया गया काढ़ा इंफ्लुएंजा (एक तरह का बुखार) में फौरन राहत देता है।
  94. तुलसी के बीज पीसकर खाने से पर्याप्त पौष्टिकता मिलती है और वीर्य को गाढ़ा बनाकर पुरुष के पोरुष को बढ़ता है। तथा दुर्बलता का नाश करते हैं ।
  95. तुलसी के पत्तो से बने काढ़े का एक कप यदि हर माहवारी के बाद तीन दिन तक नियमित रूप से सेवन किया जाए तो गर्भधारण की सम्भावना समाप्त हो जाती है।
  96. तुलसी का अर्क शहद में मिलाकर छह महीने तक नियमित सेवन करने से गुर्दे की पथरी निकल जाती है। तथा तुलसी खून में कोलेस्ट्राल के स्तर को घटाती है और हृदय को मजबूत बनाती है।
  97. तुलसी के पत्तो को पीसकर चेहरे पर उबटन करने से चेहरे की कान्ति बढ़ती है।
  98. तुलसी क्वाथ से कुल्ला करने पर मुख के छालों में तथा दांतों के दर्द में तुलसी की जड़ का क्वाथ बनाकर कुल्ला करें।
  99. बिच्छू के काटे में तुलसी के पत्तो का रस मलने से तथा पानी के साथ तुलसी के पत्तो का रस पाँच-पाँच मिनट में पिलाने से पीड़ा शान्त होती है।
  100. तुलसी, काली मिर्च व मिश्री को मिलाकर पानी में काढ़ा बना ले या तीनों को पीसकर छोटी छोटी गोलियाँ बना ले और दिन में तीन-चार बार लेने से जुकाम, हरारत, फ्लू व मौसमी बुखार में लाभ होता है।
R K Rao
शहद (Honey) 2
August 7th, 2011

शहद (Honey) 2

  1. शहद के साथ ब्राह्मी के पत्तों के सेवन से मिरगी के दौरे आना बंध होता हैं।
  2. प्रतिदिन तीन बार एक-एक चम्मच शहद एक गिलास पानी में मिलाकर पिलाने से पीलिया रोग में लाभ होता है।
  3. शहद को घोडा बच के साथ मिलाकर दिन में दो बार सेवन से क्रोध शांत होने लग जाता है। शहद के साथ गिलोय का रस मिलाकर दिन में दो बार सेवन से पित्त द्वारा उत्पन्न क्रोध शांत होने लगता है।
  4. हृदय की घबराहट, कमजोरी जब महसूस हो तो गुनगुने पानी में शहद घोलकर दिन में दो-तीन बार नियमित सेवन करें।
  5. शहद हृदय शक्ति के लिए औषधियों में सर्वोत्तम हैं हृदय फेल होने से बचाता है। जब हृदय की धड़कन बढ़ जाये, दम घुटने लगे तो शहद सेवन करने से (दिल की कमजोरी, दिल का बैठना आदि ) हृदय सबल व मजबूत बनता है।
  6. काली मिट्टी में शहद डालकर फोड़े-फुंसिया पर लगाने से फायदा होता है।
  7. उच्चरक्तचाप कम करने के लियें शहद का प्रयोग लगभग एक सप्ताह तक करें।
  8. शहद को गुनगुने पानी से एक डेढ़ माह तक नियमित सेवन से से हर प्रकार के चमड़ी रोग (दाद- खाज-खुजली चकते एवं कोढ़ के रोग भी ) ठीक हो जाते है।
  9. शहद में 1 /4 ग्राम शुद्ध गन्धक को मिलाकर खाने से खुजली पूरी तरह से ठीक हो जाती है।
  10. शहद में कलौंजी का चूर्ण मिलाकर चाटने से याददास्त तेज होती है।
  11. 30 ग्राम शहद के साथ 20 ग्राम घी मिलाकर भोजन के बाद नित्य सेवन से याददास्त तेज होती है। (सावधानी :मात्रा का विशेष ध्यान रखे, समान मात्रा में घी और शहद जहर होता है )
  12. शहद और पीपल चूर्ण छाछ के साथ पीने से छाती के दर्द में लाभ मिलता है।
  13. शहद के साथ लगभग 1 /4  भाग चांदी की भस्म सुबह और शाम को लेने से बुद्धि के विकास में वृद्धि होती है।
  14. शहद का सेवन खाने के बाद के पेट दर्द समाप्त होते है। पानी से शहद मिलाकर पीने से भी पेट दर्द में राहत आती है।
  15. शहद के साथ लगभग 1 /4 भाग जटामांसी का चूर्ण रोगी को सुबह और शाम देने से कम्पन के दोरों में (कंपकंपाना) लाभ मिलता हैं।
  16. जिस ओर सिर में दर्द हो रहा हो उसके दूसरी ओर के नाक के नथुने में एक बूंद शहद डालने से आधे सिर के दर्द में आराम मिलता है।
  17. रोजाना भोजन में शहद लेने से आधे सिर दर्द में आराम व उल्टी बंद हो जाती हैं।
  18. शहद या गुड़ के साथ पके हुए गूलर के फल खाने से नकसिरी बंद हो जाती है।
  19. नींबू का रस और शहद को सामान मात्रा में मिलाकर रात को सोने से पहले सेवन करे नींद खुले तब पुन: ले पानी के साथ शहद डालकर पीने से भी अच्छी नींद आ जाती है।
  20. शहद चाटने से या शहद को पानी में मिलकर दिन में दो बार पीने से पेट के कीड़े मर जाते है।
  21. शहद का रोज दूध में मिलाकर सेवन करने से कमजोरी दूर होकर सामान्य मोटापा बढ़ता हैं।
  22. शहद में लगभग 2 ग्राम पोस्ता पीसकर या शहद में लगभग 10 ग्राम बहेड़ा चूर्ण मिलाकर सुबह शाम सेवन करने से अच्छी नींद आती है।
  23. चूना और शहद को अच्छी तरह से मिलाकर फोड़े पर लगाने से आराम आता है।
  24. शहद में 1 / 4 भाग केसर मिलाकर या शहद और त्रिफला सामान मात्रा में मिलाकर सुबह-शाम सेवन से शीतपित्त में लाभ मिलता है।
  25. शहद को मुंह में भरकर कुछ देर तक रखकर कुल्ला करें। इससे तेज प्यास शांत हो जाती है।
  26. अधिक तेज प्यास को शांत करने के लिए शहद को मुंह में 10 मिनट तक रखें और कुल्ला कर दें। पानी में शहद मिलाकर पीने से गले की जलन व प्यास मिटती है।
  27. मोच या चोट के स्थान पर शहद और चूना मिलाकर लेप करे और इसका असर स्वयं देखे ।
  28. शहद में चुटकी भर अफीम घिसकर चाटने से पेचिश का रोग दूर हो जाता है।
  29. एक कप शहद पानी में मिलाकर एक माह तक सेवन करने से शरीर का लकवा ठीक हो जाता है।
  30. शहद और दूध मिलाकर पीने से नपुंसकता (वीर्य) की कमी दूर होती है। और शरीर बलवान होता है।
  31. शहद में काला नमक और नींबू का रस मिलाकर सेवन करने से हिचकी में आराम आता है।या प्याज के रस में शहद मिलाकर या सिर्फ शहदको उंगली से चाटने से भी हिचकी बंद हो जाती है।
  32. गर्भावस्था में महिलाओं के लिए शहद आवश्यक टानिक है महिलाओं को चाहिए की ( गर्भधारण के शुरू से ही या अंतिम तीन महीनों में) दो चम्मच शहद का दूध के साथ नियमित सेवन करने से रक्त की कमी दूर होकर शारीरिक शक्ति बढ़ती है और बच्चा ह्रष्ट पुष्ट बुद्धिमान और सुन्दर होता है।
  33. निमोनिया रोगी के शरीर की पाचन-क्रिया ध्वस्त हो जाती है इसके लिए सीने तथा पसलियों पर शुद्ध शहद की मालिश करें और थोड़ा सा शहद गुनगुने पानी में मिलाकर निमोनिया रोगी को पिलाये।
  34. छोटी मक्खी का शहद, अदरक का रस, नींबू का रस और सफेद प्याज का रस इन सबको मिलाकर और छानकर एक बूंद हर शाम आंखों में डालते रहें इससे मोतियाबिंद दूर हो जाता है।और इसमे गुलाब जल डालकर रोजाना आँखों में डालने से आंखों की रोशनी तेज होकर चश्मा हट जाता है।
  35. शुद्ध शहद हफ्ते मे 1 से 2 बार डालने से आंखों की रोशनी कभी कम नही होती, बल्कि उम्र बढ़ने के साथ-साथ तेज होती है । साथ ही चार पांच बादाम रात को भिगो दे सुबह उठते ही चार पांच काली मिर्च और मिश्री के साथ पीसकर चाटे या चबाकर और ऊपर से दूध पी लें ।
  36. शहद या एरण्ड तेल (कस्टर आयल) की 1 से 2 बूंद आंखों मे डालने से आंख में गिरी हुई चीज बाहर आ जायेगी और आंखों की चुभन दूर हो जायेगी।
  37. स्त्री-संग सम्भोग से एक घण्टा पहले पुरुष की नाभि में शहद लगाये पुरुष का जल्दी स्खलन नही होता और लिंग शिथिल नहीं पड़ता।
  38. शहद और अदरक का रस समान मात्रा में मिलाकर सुबह-शाम के सेवन से जुकाम ठीक हो जाता है और भूख भी बढ़ जाती है।
  39. एक गिलास गुनगुने दूध में 2 चम्मच शहद और आधे चम्मच मीठे सोडे को एक साथ मिलाकर दिन में दो बार पीने से जुकाम,फ्लू ठीक हो जाता है।यह मिश्रण पीते वक्त सुरक्षित कमरे में होना चाहिए जंहा बाहरी हवा न लगे क्योंकि इससे रोगी को बहुत पसीना आता है जिसमे हवा का लगना नुकसानदायक हो सकती है।
  40. शहद में सेंधानमक और हल्दी को एक कप पानी में डालकर उबाल लें। गुनगुना होने पर सोते समय पीने से जुकाम ठीक होता है।
  41. शहद में गुड़ मिलाकर या केवल शहद को चाटने से उल्टी बंद हो जाती है।
  42. शहद में लौंग चूर्ण मिलाकर चाटने से गर्भावस्था के समय आने वाली उल्टी से छुटकारा मिल जाता है।
  43. काली खांसी के लिए सबसे  पहले कब्ज को दूर करे उसके बाद सौंफ, धनियां तथा अजवायन को बराबर मात्रा में लेकर पीस लें। इसका दिन में तीन बार सेवन करना चाहिए। इससे कब्ज दूर होती है। तथा शहद में लौंग के तेल की एक बूंद तथा अदरक के रस की दस बूंदे मिलाकर दिन में तीन बार सेवन करे।
  44. पायरिया के लिए शहद की मसूढ़ों तथा दांतों पर मालिश करे या नींबू का रस, नीम का तेल तथा शहद मिलाकर या शहद में लहसुन, करेला, अदरक का रस मिलाकरमसूढ़ों की मालिश करके गुनगुने पानी से कुल्ला करे। इससे पायरिया तथा मसूढ़ों के रोग खत्म हो जाते हैं।
  45. गले के बैठ जाने पर मुलहठी का चूर्ण शहद के साथ चाट़े या फूली हुई फिटकरी चूर्ण शहद में मिलाकर सेवन करें। इसमें पानी मिलाकर कुल्ला किया जा सकता है।
  46. बहेड़ा के चूर्ण को शहद के साथ सुबह और शाम सेवन करने से या गुनगुने पानी में शहद मिलाकर गरारे करने से भी आवाज खुल जाती है।
  47. शहद में हल्दी पाउडर, अजवायन और सौंठ को मिलाकर सेवन करें तथा सोने से पहले अजवायन का तेल छाती पर मलें।
  48. ताजे पानी से आंखों को सुबह नियमित धोए दो बूंदे नीम का रस तथा दुगना शहद मिलाकर आंखों में लगाए। गिलोय का रस तथा शहद को मिलाकर आँखों में लगायें या गिलोय का रस और आधी मात्रा में शहद मिलाकर और आंखों में नियमित लगायें। अथवा शहद, सफ़ेद प्याज का रस, अदरक का रस और निम्बू का रस को समान मात्रा में मिलाकर हर शाम आंखों में लगाकर सो जांए। आंखों की खुजली, दर्द, मोतियाबिंद आदि सभी रोगों के लिए यह उपयोगी है। शहद को आंखों में लगाने से रतौंधी रोग दूर होता है। आंखों की रोशनी भी बढ़ती है।
  49. तवे पर सुहागे को फुलाकर शहद के साथ छालों पर लगाना चाहिए। इससे मुंह के छाले ठीक हो जाते हैं।
  50. शहद में छोटी इलायची चूर्ण मिलाकर मुंह के छालों पर लगायें।
  51. फिटकरी को पानी में घोल कर शहद के साथ मिलाकर कुल्ला करें। यह कुल्ला भोजन करने से पहले सुबह, दोपहर तथा शाम को करना चाहिए।
  52. त्रिफला चूर्ण शहद के साथ ले या केवल आंवले का चूर्ण शहद के साथ लेने से भी पेट की गर्मी शांत हो कर मुंह के छाले ठीक होने लगते हैं।
  53. आंख में जलन के लिए शहद के साथ निबौंली (नीम का फल) का गूदा मिलाकर आंखों में काजल की तरह लगना चाहिए।
  54. शुद्ध शहद को सलाई या अंगुली की सहायता से काजल की तरह आंख में लगायें। या सिर पर शुद्ध शहद का लेप करें ।
  55. शहद में दुगनी मात्रा में देशी घी मिलाकर सिर पर लगाए। और सूखने से पहले दोबारा दर्द ठीक होने तक फिर से लगाये । साथ ही थोड़ा शहद चाटीए या भोजन के साथ शहद लेने से सिर का दर्द दूर हो जाता है।
  56. पेट की खराबी, सर्दी या गर्मीके कारण सिर दर्द हो तो नींबू के रस में शहद को मिलाकर माथे पर लेप करे ।अथवा शहद में थोडा चूना मिलाकर माथे के दर्द वाले भाग लगा देने से सिर का दर्द ठीक हो जाता है।
  57. सौंफ, धनियां तथा अजवायन बराबर मात्रा में लेकर तीनों के पिसे चूर्ण को शहद के साथ प्रतिदिन तीन बार सेवन करने से कब्ज दूर होती है। धनिये तथा जीरे का चूर्ण बना लें और शहद में मिलाकर चाटीए इससे अम्लपित्त समाप्त होता है। सौंठ, कालीमिर्च, पीपल, सेंधानमक इन सब का चूर्ण या दो कालीमिर्च तथा दो लौंग के चूर्ण को दिन में तीन बार शहद के साथ चाटने से भूख लगना प्रारम्भ हो जाता है।
  58. अजवायन का चूर्ण को शहद के साथ दिन में तीन बार लेने से पेट के कीड़े मर जाते हैं।
  59. पानी में नींबू का रस तथा शहद मिलाकर पीने से अजीर्ण समाप्त हो कर भूख खुल कर लगने लगती है। इसके लिए शहद में दो काली मिर्च का चूर्ण मिलाकर या अजवायन तथा सौंठ से बना चूर्ण भी शहद के साथ चाट सकते है ।
  60. पेट के दर्द के लिए शुद्ध शहद ताजा पानी में मिलाकर पीने से या सौंठ को शहद में मिलाकर चाटने से काफी लाभ होता है।या तुलसी की दो पत्तियां पीस कर शहद के साथ सेवन करें।
  61. शहद में सौंफ, धनिया तथा जीरा का चूर्ण मिला कर दिन में कई बार चाटने से दस्तो में लाभ होता है। अनार दाना चूर्ण शहद के साथ चाटने से भी दस्त ठीक हो जाते हैं।
  62. सोने से पहले शहद का नियमित सेवन करने से बच्चों का निद्रावस्था में पेशाब निकल जाने का रोग ठीक हो जाता है।
  63. हानिकारक : शहद का सेवन अधिक करने से पेट में आमातिसार का रोग पैदा हो जाता है और यह कष्टदायक होता है।तथा इसका इलाज भी ज्यादा कठिन है।इसके लिए धनिया का चूर्ण सेवन करके ऊपर से बीस ग्राम अनार का सिरका पी लेना चाहिए।

R K Rao

शहद (Honey)
July 31st, 2011

शहद (Honey)

शहद का प्रयोग युगों युगों से होता आया है प्रक्रति का अनूठा करिश्मा की शहद को हजम करने की आवश्यकता नहीं होती यह एक स्वयं पचा हुआ पोषक आहार है, इसके सेवन से शरीर को सीधे तोर पर उर्जा मिलती है जिसका उपयोग बच्चे, बूढ़े, जवान और रोगी सभी कर सकते है । शहद जितना पुराना होता है उतना ही श्रेष्‍ठ भी होता है । समय के साथ साथ शहद का रंग बदलने लगता है तथा लौह-तत्व भी बढ़ता जाता है। हरतंगेज बात तो यह है कि 1923 ई. मे मिस्त्र के फराओ नूनन खामेन के पिरामिड में रूसी वैज्ञानिक को एक शहद से भरा पात्र मिला। उस समय हैरत में डाल देने वाली बात यह थी कि यह शहद 3300 वर्ष पुराना होने के बावजूद खराब नहीं हुआ था। उसके स्वाद और गुण में कोई अंतर नहीं आया था।

  1. शहद को दूध में मिला दे तो यह श्रेष्ठ और सम्पूर्ण आहार बन जाता है और रक्त में हीमोग्लोबिन निर्माण में मदद करता है।10 ग्राम शहद से 55 कैलोरी ऊर्जा मिलती है जो कि अन्य खाद्य पदार्थो में लगभग 7 अण्डों के,130 ग्राम दूध के, 80 ग्राम प्लम के,190 ग्राम हरे मटर के, 130 ग्राम सेब व 200 ग्राम गाजर के बराबर होती है।
  2. शहद में सभी शरीर के लिए उपयोगी तत्व (कार्बोहाइड्रेट्स, खनिज, अमीनो एसिड, प्रोटीन्स, मैग्नीशियम, पोटेशियम, केल्शियम, सोडियम किलोरिन, आयरन और विटामिन्स) पाए जाते हैं। शरीर में इन तत्वों की कमी होने से रोगों की सम्भावना तेज हो जाती है शहद में इन तत्वों की मोजुदगी शरीर को रोगों से बचाता हैं।
  3. शहद में विटामिन बी-कॉम्प्लेक्स होता है, इसमें मोजूद एंजाइम्स जो की जो की भूख बढ़ाने में सहायक है शुद्ध शहद के प्रतिदिन सेवन से उम्र लंबी होती है इसके लिए किसी जड़ी या संजीवनी बूटी की आवश्‍यकता नहीं है।
  4. शहद कि गुणवत्ता मधुमक्खियों दुवारा बनाये जाने वाले छत्ते के स्थान पर निर्भर करता है छत्ते के आसपास लगे फूलों के गुण शहद में संचित रहते है। नीम पर लगे छत्ते का शहद आँखों के लिए, जामुन पर लगे छत्ते का शहद मधुमेह के लिए, सहजने पर लगे छत्ते का शहद हृदय, वात तथा रक्तचाप के लिए अधिक उपयोगी होता है। शहद शीघ्र हजम होकर रक्त में मिल जाता है। शहद को दूध, दही, पानी, सब्जी, सूप, फलों के रस में मिलाकर सेवन कर सकते हैं। सर्दियों में शहद का सेवन गुनगुने दूध या पानी से करना चाहिये।

शहद कि शुद्धता :-

  1. शुद्ध शहद कि महक खुशबूदार होती है।
  2. शुद्ध शहद गर्मी में पिघलने लगता है और ठण्ड में जम जाता है।
  3. शुद्ध शहद को कुत्ता कभी नहीं खाता। अशुद्ध शहद को कुत्ता चाट जाता है।
  4. शुद्ध शहद पानी में डालने पर बिना घुले नीचे तली में बैठ जाता है जबकि नकली शहद शीघ्र घुलने लगता है।
  5. शुद्ध शहद को कागज या कपडा शीघ्र नहीं सोखता जबकि अशुद्ध शहद को कपडा या कागज शीघ्र सोख लेता है।
  6. शुद्ध शहद पर मक्खियां बैठकर भी आसानी से उड़ जाती हैं जबकि अशुद्ध शहद पर बैठ कर मक्खी उसमे फंस जाती हैं।
  7. शुद्ध शहद बर्तन में डालने पर साँप की कुंडली जैसा गिरता है, जबकि अशुद्ध शहद बर्तन में डालते ही फैल कर बैठ जाता है।
  8. शुद्ध शहद में रुई की बत्ती को भिगो कर जलाने पर सरसों के तेल जैसी खुशबू छोड़ता है।
  9. अशुद्ध शहद की बत्ती को जलाने पर शक्कर या गुड़ जैसी गंध आती है।

शहद एक औषधि:-

  1. शहद में मोजूद विटामिंस (B और C)त्वचा को एलर्जी से बचाता है।
  2. शहद को खाने से मस्तिष्क स्वस्थ और पुष्ट होता है।
  3. शहद को नींबू के रस में लेने से गहरी नींद आती है।
  4. शहद चाटने से लगातार आ रही हिचकी रुक जाती है।
  5. शहद में अदरक का रस मिलाकर लेने से खाँसी से राहत मिलती है।
  6. शहद में एक बडी इलायची पीसकर पीने से पेट दर्द में फायदा होता है।
  7. शहद शूगर की मात्रा को कोलस्ट्रोल को नियंत्रित करता है। और साथ ही शरीर को ऊर्जावान बनाता है ।
  8. खट्टे फलों मोसमी, निम्बू, संतरा, अंगूर, अमरूद, गन्ना, टमाटर के साथ शहद का सेवन अमृत के सामान है।
  9. शहद को एक शानदार एंटीबैक्टीरियल और एंटिसेप्टिक माँना जाता रहा है। चोट, घाव और जले के घाव पर शहद लगाने से ये जल्दी ठीक हो जाते हैं तथा निशान भी नहीं पडते, सूजन और दर्द में भी आराम मिलता हैं और घावों से आने वाली दुर्गंध भी नष्ट होती है। शहद से नुकसान दायक बैक्टीरिया भी नष्ट हो जाते हैं शहद की पट्टी बांधने से मृत कोशिकाये पुष्ट हो जाती है।
  10. शहद में एंटीऑक्सीडेंट तत्व भी पाए जाते हैं, जो रोगप्रतिरोधक क्षमता को बढाते हैं। ये कैंसर और ह्रदय की बीमारियों को भी रोकता हैं। और शक्ति का संचार होता है।
  11. शहद किडनी और आँतों को ठीक रखता है शहद को हमारे शरीर के खून को भी साफ करता हैं।
  12. शहद के नियमित सेवन से हीमोग्लोबिन बढता हैऔर शरीर में रक्त की कमी दूर हो जाती है।
  13. शहद में अदरक और तुलसी के पत्तों का रस बराबर मात्रा में मिलाकर सेवन से जुकाम ठीक होता है।
  14. शहद शीघ्रता से पच जाती है। आंतों को विश्राम मिलता है। थकान होने पर शहद का उपयोग थकान से तत्काल राहत देता है।
  15. सुबह खाली पेट नीबू और शहद का सेवन से वजन बिना किसी दोष के कम हो जाता है।
  16. सुबह नियमित शहद और नीबू का उपयोग गुनगुने पानी से करने पर मोटापा घटता है, कब्ज दूर होता है, रक्त को शुद्ध करता है।
  17. बादाम को भिगोकर पीस लें और इसे शहद मिले दूध में मिलाकर पूरे परिवार को पिलाने से परिवार के सभी सदस्य स्वस्थ होंगे ।
  18. प्याज का रस और शहद मिलाकर सेवन से उल्टी और हिचकी में रोक लगती है और फेफड़े और गले में जमा कफ भी निकल जाता है।
  19. शहद को दूध के साथ मिलकर कुछ दिन सेवन करने से पेट और आंतो के छोटे-छोटे शुरुआती घाव ठीक हो जाते है निर्बल आमाशय व आँतों को बल मिलता है।
  20. समान मात्रा में शहद व नींबू का रस सेवन करने से सूखी खाँसी में लाभ होता है और शहद व अदरक का रस मिलाकर चाटने से सांसो की तकलीफ और खाँसी में भी आराम आता है और हिचकियाँ भी बंद हो जाती हैं।
  21. रात को एक गिलास दूध में शहद मिलकर पीने से दुबलापन दूर होकर शरीर स्वस्थ, सुंदर,चुस्त, सुडौल, ह्रष्ट -पुष्ट व मजबूत बनता है और आयु को बढ़ता है।
  22. मोटापा बढ़ाने के लिए शहद को दूध में मिलाकर पिएं।
  23. शहद में विटामिन ‘ए’ और ‘बी’ की मोजुदगी आँखों की ज्योति को बढ़ाता है व भूख बढती है ।
  24. शहद व नींबू गुनगुने पानी के सेवन से चुस्ती -स्फूर्ति आती है और कमजोरी भी दूर हो जाती है।
  25. गुनगुने पानी में एक चम्मच शहद मिलाकर गरारे करने से गला साफ़ होता है और आवाज खुल जाती है।
  26. कब्ज होने पर सुबह-शाम शहद को गुनगुने पानी में मिलाकर पीए। प्रातः शहद-नींबू का गुनगुने पानी के साथ सेवन करने से रक्त शुद्ध होता है व कब्ज तथा मोटापे को दूर करता है।
  27. पोदीने के रस के साथ शहद का प्रयोग उल्टी को शांत करता है।
  28. लहसुन और शहद के नियमित सेवन से रक्तचाप सामान्य रहता है।
  29. टमाटर या संतरे के रस में शहद डालकर सेवन करने से कब्ज में लाभ होता है।
  30. मीठे आम का रस और शहद मिलाकर पीने से पीलिया के रोग में आराम आता है।
  31. सोते वक्त शहद व नींबू का रस मिलाकर पानी पीने से कमजोर हृदय में शक्ति का संचार होता है।
  32. शहद और प्याज का रस मिलाकर चाटने से कफ और आँतों में जमे विषेले द्रव्यों को निकाल कर कीड़े नष्ट करता है।
  33. शहद और प्याज का रस मिलाकर पानी में घोलकर एनीमा लेने से पेट सम्बन्धी रोगो में लाभ होता है आंते साफ़ होकर मजबूत होती है ।
  34. शहद में सेंधा नमक मिलाकल मलहम बना लें, इसे नासूर पर लगाने से घाव का मवाद बंद हो जाता है।
  35. मवाद पड़े घाव में पैदा बैक्टीरिया का खात्मा मनुका और शहद के सेवन से हो सकता है।
  36. शहद में दालचीनी मिलाकर दिन में दो बार चाटने से गले की टांसिल रोग ठीक हो जाता है।
  37. शहद में सिन्दूर मिलाकर पसलियों के दर्द वाले जगह पर लेप करे और पसली की सिकाई करें तो दर्द में जल्द आराम मिलता है।
  38. मनुका शहद को अगर एंटीबायोटिक दवाओं के साथ मिलाकर दिया जाए तो दवाये ज़्यादा असरदार साबित हो सकती है
  39. जिन रोगियों पर शक्तिशाली एंटीबायोटिक भी कारगर नहीं होते ऐसे संक्रमणों से निपटने के लिए मनुका और शहद का इस्तेमाल किया जा सकता है।
  40. शहद बहुत उपयोगी होता है। यह जल्दी पच जाता है। इसे हम दूध, दही, चाय, मलाई, पानी, सब्जी, फलों के रस आदि में मिलाकर ले सकते हैं।
  41. प्रतिदिन एक बादाम सुबह पानी में भिगो कर शाम को छिलका उतार कर घिस कर एक गिलास ठंडे दूध में शहद और घिसी बादाम मिलाकर घूँट-घूँटकर के सेवन करने से बल और वीर्य की वृद्धि होती है।

मां और बच्चो का टॉनिक शहद :-

  1. बच्चों को मसूडों पर शहद लगाने से दाँत आसानी से आते हैं।
  2. नव जात शिशु को जन्म से ही शहद का सेवन अमृत के सामान है।
  3. जिन बच्चों को शकर का सेवन मना है, उन्हें शकर के स्थान पर शहद दिया जा सकता है।
  4. रोजाना शहद ताजा पानी में मिलाकर शर्बत की तरह पिलाने से बच्चें की बेडोल तोंद कम हो जाती है।
  5. मां के दूध में शुद्ध शहद को मिलाकर बच्चे को एक माह तक पिलाने से सूखा रोग ठीक हो जाता है।
  6. बच्चों को एक चम्मच पानी में दो बूंद शहद मिलाकर चटाने से उनकी ग्रोथ अच्छी होती है और वे सेहतमंद रहते हैं।
  7. बच्चे जिनकी पाचन क्रिया ठीक से संचालित नहीं होती है, उन्हें दूध, दही, चावल, दलिया, केला, खीर आदि के साथ-साथ थोड़ी मात्रा में शहद दे दिया जाए तो पाचन आसानी से हो जाता है।
  8. शहद को मां के दूध के बाद सर्वाधिक पोषक तत्व संज्ञा दी गई है। बच्चों के शारीरिक विकास एवं पाचन क्रिया को सुचारु रखने के लिए जिन पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है, लगभग वे सभी पोषक तत्व शहद में पाए जाते हैं।
  9. गर्भवती महिला द्वारा दो चम्मच शहद रोजाना लेने से उसे रक्त की कमी नहीं होती।
  10. गर्भावस्था के दौरान स्त्रियों द्वारा शहद का सेवन करने से पैदा होने वाली संतान स्वस्थ एवं मानसिक दृष्टि से अन्य शिशुओं से श्रेष्ठ होती है।

त्वचा निखारने के लिए:——–

  1. शहद या मीठे तेल में नौसादर को मिलाकर लगाने से सफेद कोढ़ मिट जाता है
  2. शहद, नींबू और गुलाब जल मिलाकर नियमित चेहरे पर लगाए चेहरा निखर जाता है।
  3. शुद्ध शहद में नींबू का रस मिलाकर चेहरे पर लगाने से चेहरे पर झुर्रियां नहीं पड़ती है।
  4. आटे और शहद को मिलाकर लेप बना लें और इसे फुंसियों पर लगा लें फुंसियों जल्द ही ठीक होती है ।
  5. गुनगुने पानी में शहद को मिलाकर दो तीन महीनों तक नियमित सेवन से फोड़े और फुंसिया दूर हो जाती है।
  6. गन्ने का रस में शहद और आंवला मिलाकर पीने से खून साफ होता है त्वचा मुलायम और सुंदर होती है।
  7. गाजर के रस में शहद मिलाकर नियमित सेवन से त्वचा में निखार और आँखों की ज्योति में सुधार होता है।
  8. सुन्दरता बढ़ने के लिए प्रतिदिन एक चम्मच शहद का सेवन करना चाहिए। इससे शरीर के हार्मोंन्स भी कंट्रोल में रहते हैं।
  9. शहद, बेसन, नींबू व तिल्ली का तेल मिलाकर उबटन बना कर त्वचा पर मलने से त्वचा में चमक और चेहरे पर कांति आती है।
  10. संतरों के छिलकों का चूर्ण लेकर उसमें ठीक से शहद मिलाले इस मिश्रण को उबटन की तरह चेहरे और त्वचा पर मलने से त्वचा निखर कर कांतिवान बन जाती है।
  11. त्वचा पर निखार लाने के लिए संतरों के छिलकों का चूर्ण और शहद मिलकर कर त्वचा पर लगाये या शहद, दूध क्रीम व बेसन मिलाकर उबटन बनाकर त्वचा पर लगाये अथवा गुलाब जल, नींबू और शहद मिलाकर लगाने से त्वचा कोमल होती है और त्वचा पर निखार आता है।
  12. शहद बालों को गिरने से भी रोकता है। जैतून के गरम तेल में एक चम्मच शहद और एक चम्मच दालचीनी पाउडर मिलकर पेस्ट बनाले और इस को 15 – 20 मिनट के लिये बालों पर लगा लें। बाद में सिर को गरम पानी से धो ले। कुछ ही दिनों तक नियमित प्रयोग से बाल झडऩे रुक जाएगे और बाल काले, लंबे और मुलायम हो जायेगे। जतुन और शहद को मिलाकर बालो को धोना भी फायदेमंद होता है।

शहद की मात्रा:-

बच्चे के लिए 10 से 15, युवक के लिए 30 से 35, पुरूष के लिए 30 से 50 और एक वर्द्ध के लिए 20 से 30 ग्राम प्रतिदिन पर्याप्त मानी गयी है।

सावधानियां :–

  1. शहद को कभी गर्म नहीं करना चाहिए।
  2. शहद को मांस, मछली के साथ कदापि न खायें।
  3. शहद को चाय या काफी के साथ इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।
  4. शहद के साथ दूध या पानी समान मात्रा में मिलकर सेवन हानिकारक है।
  5. शहद को चीनी, गुड़ और मिश्री के साथ मिलाना अमृत को जहर बनाने जैसा है।
  6. शहद को समान मात्रा में घी, तेल या मख्खन के साथ मिलकर सेवन जहर के समान है।
  7. हर रोज एक चम्मच शहद का सेवन ही फायदेमंद है, शहद का अधिक मात्रा में सेवन फायदे की बजाए नुक्सान कर सकता है ।

R K Rao

सौंफ (Aniseed)
July 21st, 2011

सौंफ (Aniseed)

 

सौंफ : लाजवाब औषधि सौंफ को मसालों का राजा कहा जाता है। सौंफ के औषधीय गुणों को हर कोई जानता है। इसमें अनेक चमत्कारी औषिधीय गुण मौजूद होते हैं जो कि स्वास्थ्य के लिए अत्यंत लाभकारी होते है। सोंफ के रस से कई प्रकार के एन्जाईम भी बनाये जाते हैं। भोजन के बाद माउथ फ्रैशनर के तौर पर भी इसका प्रयोग किया जाता हैं। सौंफ का अचार में, मसालो में, पान में, आम की चटनी में, शरबत में, चाय में, इत्र और विभिन्न घरेलु नुस्खों आदि में पाचक के रूप में, औषधीयों में और सुगंघ के लिए, खाने का स्वाद बढ़ाने के लिए कढ़ी एवं सूप में भी प्रयोग किया जाता है। और इन सब में सौंफ को विशेष स्थान हैं। सौंफ की तासीर ठंडी होती है। सौंफ का तेल भी कई प्रकार के रोगों का उपचार के लिए काम में आता है। सौंफ में कैल्शियम, सोडियम, फॉस्फोरस, आयरन और पोटेशियम जैसे महत्वपूर्ण तत्व होते हैं पेट के कई विकारों जैसे मरोड़, दर्द और गैस्ट्रो विकार, अस्थमा, कफ और खाँसी का इलाज हो सकता है और कॉलेस्ट्रोल भी काबू में रहता है। लीवर और आँखों की ज्योति ठीक रहती है। गुड़ के साथ सौंफ खाने से मासिक धर्म नियमित होता है। तवे पर भुनी हुई सौंफ से अपच के मामले में बहुत लाभ होता है।

सौंफ पेट साफ करने वाला, हृदय को शक्ति देने वाला, घाव, उल्टी, दस्त, खांसी, जुकाम, बुखार, अफारा, वायु विकार, रतौंधी, बवासीर (अर्श), पित्त, रक्तविकार, ज्वर, वमन (उल्टी), अनिंद्रा और अतिनिंद्रा, पेट के सभी रोग (अपच, कब्ज (अजीर्ण) दस्त, खाने के बाद तुरंत दस्त लग जाना, आंव आना, पेट का दर्द, खूनी बवासीर, पाचन, मासिक स्राव, संग्रहणी, बच्चो के दांत निकलना, खाज-खुजली, आंखों की रोशनी के लिए, दिन में दिखाई न देना, मोतियाबिन्द, बांझपन व गर्भपात, धूम्रपान, मुंह के छाले, याददास्त का कमजोर होना, अधिक भूख लगना, हिचकी आना, कान का दर्द, मुंह की दुर्गन्ध, मूत्ररोग, हकलाना, तुतलाना, बहरापन, मासिकधर्म सम्बंधी परेशानियां, प्यास अधिक लगना, गर्मी अधिक लगना, सिर का दर्द, माइग्रेन, स्तनों में दूध की कमी, नकसीरी, बेहोशी, हैजा, हृदय सम्बंधी परेशानियां, मानसिक पागलपन, नाभि का हटना (धरण) पसीना लाने के लिए शारीरिक शक्ति आदि के लिए प्रयोग किया जाता है।

सौंफ की उपयोगिता:

  1. सौंफ का रस दही के साथ मिलाकर हर रोज 2-3 बार सेवन करने अधिक भूख पर रोक लगती है।
  2. सौंफ पीसकर प्रतिदिन सुबह पानी के साथ सेवन से पेट सम्बंधित सभी रोगो के लिए लाभकारी हैं।
  3. बदहजमी होने पर सौंफ को उबालकर छान कर गुनगुना ठंडा करके पीने से गैस एवं बदहजमी दूर होती है।
  4. सौंफ को पीसकर सिर पर लेप कने से सिर दर्द, गर्मी व चक्कर आना शांत होता है।
  5. सौंफ के पत्तों का रस पानी में मिलाकर रोगी को पिलाने से पसीना आने लगता है।
  6. सौंफ का शरबत बनाकर पीने से जी का मिचलाना बंद हो जाता है और पेट की गर्मी भी शांत हो जाती है।
  7. पेट में वायु की शिकायत हो तो कुछ दिनों तक दाल अथवा सब्जी में सौंफ का छोंक लगा कर प्रयोग करे।
  8. सामान मात्रा में सौंफ का रस और गुलाबजल मिलाकर पीने से हिचकी आना रुक जाती है।
  9. सौंफ और थोड़े से पुदीने के पत्ते आधा रह जाने तक पानी में उबालें। इस पानी को ठंडा करके दिन में तीन बार सेवन करने से उल्टी होने पर या जी घबराने पर आराम आता है।
  10. सौंफ में लौंग डालकर पानी में उबालकर काढ़ा बनाए इसे छानकर देशी बूरा या खांड मिलकर पीने से जुकाम शीघ्र ही ठीक हो जाता है।
  11. सौंफ को घी में सेंक कर रख लें। जब भी धूम्रपान की तलब लगे तो इसे चबाये इससे धुम्रपान की लत धीरे धीरे छूट जाएगी।
  12. सौंफ और मिश्री का समान मात्रा में मिलाकर चूर्ण बना कर रख ले। खाने के बाद इस मिश्रण के दो चम्मच सुबह शाम दो महीने तक सेवन करने से दिमागी कमजोरी दूर हो जाती है तथा मंदाग्नि भी दूर होती है।
  13. सौंफ, धनिया व मिश्री समान मात्रा में लेकर चूर्ण बनाकर भोजन के बाद एक चम्मच लेने से हाथ-पाँव और पेशाब की जलन, एसिडिटी व सिरदर्द का उपचार हो जाता है।
  14. सौंफ ,धनिया और मिश्री मिलाकर दिन में दो तीन बार पानी के साथ लेंने से माइग्रेन दर्द (आधे सिर का दर्द) दूर होता है।
  15. बच्चों के पेट के रोगों में दो चम्मच सौंफ का चूर्ण एक गिलास पानी में एक चौथाई पानी शेष रहने तक अच्छी तरह उबाल कर काढ़ा बना ले और छानकर ठण्डा कर लें। इसे दिन में तीन-चार बार एक-एक चम्मच पिलाने से पेट का अफारा, अपच, उलटी ,प्यास, जी मिचलाना, पित्त-विकार, जलन, पेट दर्द, भूख में कमी, पेचिश मरोड़ आदि शिकायतें दूर होती हैं।
  16. सौंफ, जीरा और धनिये को बराबर मात्रा मिलाकर काढ़ा बनाये इसे सुबह-शाम सेवन से या सौंफ और मिश्री को पीसकर चूर्ण बना ले प्रतिदिन सुबह-शाम दूध के साथ सेवन से बवासीर के रोगो में लाभ होता है।
  17. सौंफ और मिश्री को पीसकर प्रतिदिन दूध के साथ सेवन से खूनी बवासीर से छुटकारा मिलता है। या सौंफ, जीरा और धनियां को मिलाकर काढ़ा बनाये इसमें देशी घी मिलाकर नियमित सेवन करने से खूनी बवासीर से निजात मिलती है।
  18. सौंफ रक्तशोधक एवं चर्मरोग नाशक है। खालिस सौंफ (बिना कुछ मिलाए) एक एक चम्मच सुबह शाम रोजना चबाने से या ठंडे पानी से नियमित सेवन करने से खून साफ हो जाता है और त्वचा भी साफ हो जाती है। प्यास उल्टी जी मिचलाना अजीर्ण पेट में दर्द और जलन पित्त विकार मरोडे आंव आदि में भी सौफ का सेवन बेहद लाभकारी होता है।
  19. बुखार में रोगी यदि बार-बार उल्टी करता हो तो हरी सौंफ को पीसकर उसका रस निकालकर थोड़ी-थोड़ी देर बाद रोगी को पिलाएं। या सौंफ का काढ़ा बनाकर, छानकर इसमें थोड़ी सी मिश्री मिलाकर रोगी को पिलाएं तथा सौंफ के चूर्ण का सेवन करने से भी उल्टी बंद हो जाती है।
  20. सौंफ, कालानमक और कालीमिर्च को 10 : 2 : 1 के अनुपात में लेकर पीस ले और सुबह-शाम खाना खाने के बाद एक चम्मच गर्म पानी के साथ लेने से कब्ज और कब्ज से उत्पन्न गैस, मरोड़ व पेट दर्द भी ठीक होता है। सौंफ और हरड़ को बारीक पीसकर चूर्ण बना लें। रात को खाना खाने के बाद यह चूर्ण सेवन करने से कब्ज दूर हो जाती है। अथवा बराबर का जीरा और सौंफ ले और दो दो गुना मात्रा में एलोवेरा का गूदा और सोंठ को मिलाकर पीस ले और छोटी-छोटी गोलियां बना लें और कब्ज के लिए एक गोली सुबह-शाम पानी के साथ ले। सौंफ की जड़ को सुबह-शाम सलाद के रूप में सेवन करने से कब्ज नष्ट होता है।
  21. सौंफ को घी में भून कर इसमें मिश्री मिलाकर चूर्ण बना लें। यह चूर्ण हर रोज एक चम्मच 3 बार ठंडे पानी के साथ सेवन से आंव दस्त में आराम होता है। सौंफ का तेल, मिश्री में मिलाकर हर रोज तीन चार बार सेवन करने से दस्त में आंव आना बंद होता है। अथवा 4 : 2 :1 के अनुपात में सौंफ, बेलगिरी और ईसबगोल का मिश्रण बना ले इस चूर्ण के सेवन करने से आंव दस्त बंद हो जाता है। या सौंफ, धनिया और भुना हुआ जीरा ये सब बराबर मात्रा में लेकर खूब पीस ले थोड़ी-थोड़ी मात्रा में दिन में तीन बार मट्ठे के साथ सेवन करे आंव दस्त में आराम मिलेगा ।
  22. सौंफ और छोटी हरड़ सामान मात्रा में लेकर घी में भून लें और कुल मात्रा के बराबर मिश्री मिलाकर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण का सेवन करने से दस्तो में आराम आता है। और लस्सी, दही या रस के साथ सौंफ का चूर्ण पीने से दस्त में आंव व खून आना बंद होता है।
  23. सौंफ, अजवायन और जायफल इन सब के चूर्ण को थोड़े सौंफ के रस के साथ दस्त वाले रोगी को पिलाएं आराम मिलेगा ।
  24. सौंफ एक चम्मच धनिया एक चम्मच, जीरा आधा चम्मच और बराबर मात्रा में एक कलि वाला लहसुन लेकर बारीख पीस लें इच्छानुसार सेंधा नमक मिलाकर एक-एक चम्मच दिन में तीन चार बार मट्ठा के साथ सेवन से बार-बार का दस्त आना ठीक हो जाता है। और शरीर में पानी की कमी भी नहीं आएगी।
  25. सौंफ को थोड़ा भूनकर मिश्री या शक्कर के साथ मिलाकर पीने से अथवा भुनी सौंफ, भुनी सोंठ और भुनी हरड़ 3 : 3 : 1 के अनुपात में मिलाकर खूब पीस ले। इसमें खण्ड या बूरा मिलाकर दो चम्मच दिन में 3 बार सेवन करने से दस्तो में आराम मिलता है।
  26. यदि जिगर या प्लीहा रोग हो जाएं तो सौंफ से काबू में लाए जा सकते हैं। पेशाब जलन के साथ आता हो तो सौंफ का चूर्ण ठंडे पानी से, दिन में दो बार लेना फायदेमंद रहता है।
  27. धनिया, सौंफ और मिश्री समान मात्रा में मिलाकर पीस लें इस चूर्ण का खाना खाने के बाद एक चम्मच हर रोज लगभग दो माह तक सेवन करने से हाथ परों में जलन छाती की जलन, नेत्रों की जलन, पेशाब की जलन व सिरदर्द की शिकायत दूर हो जाती है। चक्कर आना, अफरा, एसिडिटी व कमज़ोरी दूर होती है नींद नियमित होती है, नेत्र की ज्योति व याददस्त भी बढ़ती है
  28. सौंफ में कॉलेस्ट्रोल को नियंत्रित करने की क्षमता होती है अत: भोजन के बाद सौंफ और मिश्री अवश्य चबाये जिससे हाजमा भी दुरूस्त रहता है। लीवर और आंखों की ज्योति भी ठीक रहती है। प्रतिदिन दो से पांच ग्राम सौंफ नियमित सेवन से मोतियाबिन्द ठीक हो जाता है।
  29. आँखों की रोशनी की बेहतरी के लिए सौंफ, बादाम और मिश्री बराबर मात्रा में लेकर पीस लें। सुबह-शाम इस चूर्ण का एक चम्मच पानी के साथ दो महीने तक लगातार सेवन करने से आंखों की कमजोरी दूर हो जाती है।
  30. हरी सौंफ का रस गाजर के रस में मिलाकर तीन माह तक सेवन करने से आंखों की रोशनी तेज होती है तथा रात को न दिखाई देने (रतौंधी) वाले को भी दिखाई देने लगता है।
  31. कच्ची व भुनी सौंफ बराबर मात्रा में मिलाकर चूर्ण बना ले दो चम्मच चूर्ण मठ्‌ठे के साथ सेवन करने से अतिसार (दस्तो) में लाभ होता है। तथा इस सौंफ चूर्ण को सुबह शाम भोजन के बाद पानी के साथ दो माह तक नियमित सेवन करने से नेत्र ज्योति में भी वृद्धि होती है।
  32. सौंफ और मिश्री समान भाग लेकर पीस लें। इसकी एक चम्मच मात्रा सुबह-शाम पानी के साथ दो माह तक लें। इससे आँखों की कमजोरी दूर होती है तथा नेत्र द्रष्टि मजबूत होती है।
  33. सौंफ का चूर्ण बनाकर रात को सोते समय मिश्री मिले दूध या पानी के साथ लेने से आंखों की रोशनी बढ़ती हैं। भोजन के बाद नियमित सौंफ खाने से आंखों की रोशनी बढ़ती है। पाचन क्रिया में सुधार आता है और मूत्र रोग भी दूर होते है।
  34. तवे पर भुनी हुई सौंफ के मिश्रण से अपच, एसिडिटी और दस्तो में भी बहुत लाभ होता है।
  35. अच्छी उबली हुई एक चम्मच सौंफ को दिन में तीन बार लेने से अपच, अस्थमा, कफ और खांसी के इलाज के लिए काफी फायदेमंद है।
  36. सौंफ और धनिया बराबर मात्रा में कूट-छानकर मिश्री मिलाकर खाना खाने के बाद एक चम्मच लेने से कुछ ही दिनों में हाथ-पाँव की जलन में आराम आता है।
  37. सौंफ के चूर्ण को शकर के साथ बराबर मिलाकर लेने से हाथों और पैरों की जलन दूर होती है।
  38. सोंफ एक अच्छा माउथ फरसनर भी है। सौंफ खाने से मुंह की दुर्गंध दूर होती है। सांसो को तरोताजा रखने के लिए भोजन के बाद सौंफ चबाइए। इससे पाचन क्रिया भी दुरुस्त रहती है।
  39. सौंफ को पानी में उबालकर मिश्री डालकर ठंडा करके दिन में दो-तीन बार पीने से प्रयोग से खट्टी डकार में भी आराम मिलता है ।
  40. दूध में सौंफ उबालकर, छान ले और मीठा मिलाकर सेवन से उल्टी आना बंध हो जाती है।
  41. सौंफ तथा मिश्री को एक साथ पीसकर एक चम्मच चूर्ण दिन में दो तीन बार पानी के साथ सेवन से खूनी दस्तो में लाभ होता है।
  42. सौंफ को उबालकर तथा मिश्री मिलाकर दिन में दो तीन बार सेवन करने से खट्टी डकारें आना बंद हो जाता है। तथा पेट दर्द के लिए भुनी हुई सौंफ चबाने से शीघ्र फायदा मिलता है।
  43. बच्चे के जन्म के बाद यदि माता के स्तनों में दूध न उतरे तो सौंफ, सफेद जीरा व मिश्री को बराबर मात्रा में लेकर पीस ले इस का एक चम्मच चूर्ण दूध के साथ दिन में तीन बार सेवन करने से स्तनों में दूध उतरने लगता है।
  44. सौंफ के पत्ते का काढ़ा बनाकर सेवन करने से स्त्रियों के स्तनों में दूध की कमी दूर होती है और पाचन क्रिया भी तेज होती है।
  45. सौंफ, मिश्री और शतावर को मिलाकर चूर्ण बना लें और गर्म दूध में डालकर दिन में 4 बार पीने से स्त्री के स्तनों में दूध की कमी नहीं रहती। तथा सौंफ में पिसी हुई मिश्री मिलाकर सुबह-शाम नियमित गुनगुने दूध के साथ सेवन करने से भी स्त्री के स्तनों में दूध बढ़ जाता है।
  46. गोरा व सुंदर बच्चे की चाह रखने वाली गर्भवती माता को गर्भावस्था के बाद से प्रतिदिन भोजन के बाद सुबह शाम सौंफ चबाना चाहिए। प्रतिदिन सौंफ और मिश्री नियमित रूप से चबा चबाकर खाने से खून और रंग दोनों साफ होते हैं।
  47. सौंफ को उबालकर काढ़ा बना लें। इसमें थोडा सेंधा या कालानमक मिलाकर छान लें। और इसका प्रतिदिन सेवन करने से पेट की गैस, अफारा, मरोड और दर्द सब ठीक हो जाता है। यह बच्चों और गर्भवती महिलाओं के लिए भी बहुत लाभदायक है।
  48. बेल पत्थर का गूदा और सौंफ का सुबह शाम सेवन से अजीर्ण मिटता है तथा अतिसार (दस्तों) में लाभ होता है।
  49. ग़ुड में पिसी सौंफ, मिलाकर एक सप्ताह तक रोज खाने से पेट की नाभि का अपनी जगह से खिसकना रुक जाता है।
  50. बारबार मुंह में छाले होने पर सौंफ का काढ़ा बना कर इसमें चुटकी भर भुनी फिटकरी मिलाकर दिन में दो तीन बार गरारे करें। सौंफ को मुंह में चबाते रहने से भी बैठा गला साफ हो जाता है और गले में खारिश ठीक हो जाती है। सौंफ का चूर्ण बनाकर प्रतिदिन भोजन के बाद चबाने से और मुंह के छालों पर लगाने से भी छाले ठीक होते हैं।
  51. रात्रि को कब्ज की शिकायत को दूर करने के लिए सोते समय गुनगुने पानी के साथ पिसी सौंफ का सेवन करने से कब्ज की शिकायत दूर होती है। या सौंफ को पीसकर इस को गुलकंद के साथ मिला कर सुबह-शाम भोजन के बाद खाएँ।
  52. गले में खराश होने पर सौंफ को मुँह में डाल कर दिन में कई बार चबाने से बैठा गला धीरे धीरे साफ हो जाता है। मुँह की दुर्गंध भी दूर हो जाती है। और पाचन क्रिया भी सुधरती है।
  53. सौंफ का रस और शहद मिलाकर दिन में दो तीन बार इसे चाटने से खांसी ठीक हो जाती है। या सौंफ में दुगनी मात्रा में अजवायन मिलकर पानी में उबाल लें और इसमें शहद मिलाकर छान लें। यह काढ़ा दो तीन चम्मच की मात्रा में हर घंटे के अंतर से रोगी को देने से खांसी में लाभ मिलता है। सौंफ के चूर्ण को भी शहद में मिलाकर लेंने से खाँसी में तुरंत आराम मिलता है।
  54. पेट में वायु की शिकायत हो तो कुछ दिनों तक दाल अथवा सब्जी में सौंफ का छोंक लगा कर अवश्य प्रयोग करे लाभ मिलेगा।
  55. सौंफ को पानी में उबालकर मिश्री डालकर ठंडा करके दिन में दो-तीन बार पीने से प्रयोग से खट्टी डकार में आराम मिल आता है।
  56. सौंफ और जीरा सामान मात्रा में लेकर हल्का हल्का भूनले और स्वादानुसार काला नमक मिलाकर चूर्ण बना लें। यह प्रभाव शाली पाचक चूर्ण है। भोजन के बाद इसे गुनगुने पानी से लें।
  57. सौंफ एक चम्मच, दो-दो चम्मच छोटी हरड़ और मिश्री लेकर बारीक चूर्ण बना लें। सोते समय 5 ग्राम गुनगुने पानी से लेंने से कब्ज, मंदाग्नि, गैस व आफरा में आराम मिलता है।
  58. यदि माहवारी स्राव अधिक हो रहा हो तो सौंफ का सेवन करने से मासिक धर्म नियमित हो जाता है।
  59. सौंफ की गीरी और बराबर की मिश्री मिलाकर बारीक पीसकर चूर्ण बना कर सुबह शाम ताजा पानी या गर्म दूध से फंकी लें। इसके सेवन से दिमाग ठंडा और स्मरण शक्ति तेज होती है।
  60. सौंफ और बादाम की गिरी को पीसकर चूर्ण बना लें। रात को सोते समय गुनगुने दूध या पानी के साथ सेवन से भूलने वालो की समरण शक्ति तीव्र हो जाती है।
  61. घमोरियों को दूर करने के लिए एक घडे़ में रात को आधा कप सौंफ भिगों कर सुबह उसी पानी से नहाएं। इससे शरीर की गर्मी और घमोरियां ठीक हो जाती हैं।
  62. बुखार में कभी कभी तेज प्यास लगती है तो सौंफ को पानी में उबालकर ठंडा करके रोगी को थोडा थोडा करके पिलाए तेज प्यास शांत हो जाएगी।
  63. सूखी खांसी होने पर खांसी आते ही मुंह में सौंफ रखकर चबाते रहना चाहिए इससे निश्चित तोर से आराम होता है।
  64. सौंफ के चूर्ण का काढ़ा बना कर एक गिलास दूध और मिश्री मिलाकर रात को सोने से पहले कुछ महीनों तक नियमित सेवन से हकलाने का रोग ठीक हो जाता है।
  65. सौंफ के चूर्ण का काढ़ा बना कर इसको दो तीन चम्मच घी और एक गिलास गाय के दूध में मिलाकर पीने से बहरापन ठीक हो कर कानो से ठीक से सुनाई देने लगता है।
  66. सौंफ का काढ़ा बना लें और काढ़े को छानकर खांड मिलाकर सेवन करें। इससे पित्त बुखार ठीक होता है।
  67. सौंफ और पोदीना, तीन चार लौंग तथा गुलाब का गुलकन्द मिलाकर बना काढ़ा हैजा से पीड़ित रोगी को सेवन कराने से हैजे में आराम मिलता है।
  68. बदहजमी में बच्चे को प्रतिदिन सौंफ व पोदीना पीसकर शहद में मिलाकर चटाने से बदहजमी दूर हो जाती है।
  69. सौंफ को रात को पानी में भिगो दें। सुबह सौंफ को इसी पानी में हल्का पीस कर छाल लें और मिश्री मिलाकर नियमित सेवन करने से हृदय रोग दूर होता है। तथा सौंफ और सूखा धनिया मोटा-मोटा कूटकर रात को एक कप गुलाब जल में भिगो दें। सुबह सौंफ व धनियां को इसी पानी में रगड़ मसल कर छान लें और किसमिस खाकर ऊपर से इस पानी को पीने से हृदय शूल में आराम आ जाता है।
  70. सौंफ को नीबू के रस में मिलाकर भोजन के बाद थोड़ा-थोड़ा खाने से भोजन पचाने में आसानी होती है और पेट का भारीपन तथा बेचैनी भी दूर होती है।
  71. एक गिलास पानी में दस ग्राम सौंफ में पुरानी ईमली और कालानमक मिलाकर शर्बत बनाकर पीएं। इससे पाचन शक्ति, मन्दाग्नि और कब्ज के रोग दूर होते है।
  72. सौंफ के रस में थोड़ी हींग डालकर पीने से पेशाब खुल कर आता है। बताशे में सौंफ के तेल की दस पंद्रह बूंदे डालकर कर सेवन करने से भी पेशाब खुलकर आने लगता है।
  73. रात को सौंफ पानी में भिगोकर रख दें सुबह सौंफ को छानकर चबा ले ऊपर से सोंफ के पानी को घूंट घूंट करके पीने से सभी मूत्ररोग रोग दूर होते हैं।
  74. सौंफ और मिश्री को बराबर मात्रा में लेकर चूर्ण बना कर सुबह-शाम भोजन के बाद सेवन करने से शरीर को शक्ति व सफुर्ति मिलती है। इससे बुखार में भी फायदा होता है ।
  75. सौंफ के पत्तों का काढ़ा प्रसूता स्त्री को पिलाने से खून साफ होता है गर्भाशय की शुद्धि होती है और सभी रक्तविकार दूर होते हैं।
  76. सौंफ का काढ़ा बनाकर दूध में मिलाकर पीने से नींद न आना (अनिंद्रा) दूर होता है। अथवा सौंफ का काढ़ा बना कर दस पंद्रह ग्राम घी व इच्छानुसार मिश्री मिलाकर रात को सोते समय सेवन करें। इससे नींद अच्छी आती है। अथवा जब रोगी हर समय नींद में या सुस्ती में रहता है, ऐसे रोगी को सौंफ का काढ़ा बना कर थोड़ा सा सेंधा नमक मिलाकर सुबह-शाम हफ्ते तक पिलाएं। इससे सुस्ती दूर होती है तथा जरुरत से अधिक नींद भी नहीं आती।
  77. सौंफ, कालानमक और कालीमिर्च को 10 : 2 : 1 के अनुपात में लेकर पीस ले और सुबह-शाम खाना खाने के बाद एक चम्मच गर्म पानी के साथ लेने से कब्ज और कब्जसे उत्पन्न गैस, मरोड़ व दर्द भी ठीक होता है। सौंफ और हरड़ को बारीक पीसकर चूर्ण बना लें। रात को खाना खाने के बाद यह चूर्ण सेवन करने से कब्ज दूर हो जाती है। अथवा बराबर का जीरा और सौंफ ले और दो दो गुना मात्रा में एलोवेरा का गूदा और सोंठ को मिलाकर पीस ले और छोटी-छोटी गोलियां बना लें और कब्ज के लिए एक गोली सुबह-शाम पानी के साथ ले। सौंफ की जड़ को सुबह-शाम सलाद के रूप में सेवन करने से कब्ज नष्ट होता है।
  78. सौंफ को घी में भून कर इसमें मिश्री मिलाकर चूर्ण बना लें। यह चूर्ण हर रोज एक चम्मच 3 बार ठंडे पानी के साथ सेवन से आंव दस्त में आराम होता है। सौंफ का तेल, मिश्री में मिलाकर हर रोज तीन चार बार सेवन करने से दस्त में आंव आना बंद होता है। अथवा 4 : 2 :1 के अनुपात में सौंफ, बेलगिरी और ईसबगोल का मिश्रण बना ले इस चूर्ण के सेवन करने से आंव दस्त बंद हो जाता है। या सौंफ, धनिया और भुना हुआ जीरा ये सब बराबर मात्रा में लेकर खूब पीस ले थोड़ी-थोड़ी मात्रा में दिन में तीन बार मट्ठे के साथ सेवन करे आंव दस्त में आराम मिलेगा ।
  79. सौंफ और छोटी हरड़ सामान मात्रा में लेकर घी में भून लें और कुल मात्रा के बराबर मिश्री मिलाकर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण का सेवन करने से दस्तो में आराम आता है। और लस्सी, दही या रस के साथ सौंफ का चूर्ण पीने से दस्त में आंव व खून आना बंद होता है।
  80. सौंफ, अजवायन और जायफल इन सब के चूर्ण को थोड़े सौंफ के रस के साथ दस्त वाले रोगी को पिलाएं आराम मिलेगा ।
  81. सौंफ एक चम्मच धनिया एक चम्मच, जीरा आधा चम्मच और बराबर मात्रा में एक कलि वाला लहसुन लेकर बारीख पीस लें इच्छानुसार सेंधा नमक मिलाकर एक-एक चम्मच दिन में तीन चार बार मट्ठा के साथ सेवन से बार-बार का दस्त आना ठीक हो जाता है। और शरीर में पानी की कमी भी नहीं आएगी।
  82. सौंफ को थोड़ा भूनकर मिश्री या शक्कर के साथ मिलाकर पीने से अथवा भुनी सौंफ, भुनी सोंठ और भुनी हरड़ 3 : 3 : 1 के अनुपात में मिलाकर खूब पीस ले। इसमें खण्ड या बूरा मिलाकर दो चम्मच दिन में 3 बार सेवन करने से दस्तो में आराम मिलता है।
  83. देसी गाय के दूध में थोड़ा सौंफ उबालकर प्रतिदिन तीन चार बार पिलाने से दांत आसानी से निकल आते हैं। अथवा सौंफ को पानी में उबालकर भी दिन में 3 से 4 बार बच्चे को पिलाने से दांत आसानी से निकल आते है।
  84. बराबर का सौंफ व धनियां मिलाकर पीस लें और इसमें डेढ़ गुना घी और दो गुना मिश्री या खांड मिलाकर सुबह-शाम 25-30 ग्राम की मात्रा में सेवन करने से हर प्रकार की खुजली में आराम आता है।
  85. बांझ स्त्रियों को सौंफ का चूर्ण घी के साथ तीन माह तक सेवन करायें। इससे स्त्री गर्भ धारण करके माँ बनती है। और मोटापा भी समाप्त होता है। कमजोर स्त्री को सौंफ और शतावरी का चूर्ण बनाकर घी के साथ तीन माह तक सेवन करायें कमजोरी के साथ साथ बाँझपन भी दूर होता है।
  86. गर्भपात का अंदेशा होने वाली गर्भवती महिला को सौंफ और गुलाब का गुलकन्द को 2 :1 के अनुपात में मिलाकर पानी के साथ पीसकर हर रोज नियमित पिलाने से गर्भपात की सम्भावना समाप्त हो जाती है। गर्भधारण करने के बाद से ही बच्चे के जन्म तक सौंफ का रस नियमित पीने से भी गर्भ सुरक्षित रहता है।

सावधानी : सौफ की तासीर ठंडी होती है इसलिए इसका अधिक या लगातार सेवन से शरीर में जकडन हो सकती है। इसके लिए सौंफ को गर्म तव्वे पर हल्का हल्का भुन लेते है या सोंठ मिलकर सेवन करने सी इस समस्या का समाधान हो जाता है अच्छा होगा कि इस विषय पर किसी जानकर चिकित्सक से राय ले ।

R K Rao

 

 

 

 

 

 

धनिया (Coriander)
July 11th, 2011

धनिया(Coriander)

धनिये को ताजा पत्ते के रूप में व इसको पीस कर चटनी बना कर, इसके बीजों को सुखा कर पीस कर प्रयोग किया जाता है। हरे धनिए के साथ लहसुन और गुड़ मिलाकर गुजरात में इस चटनी का उपयोग करते हैं। कश्मीर में धनिया वाला कोरमा हरे धनिए के कारण ही मशहूर है। हरे धनिये को बारीक काटकर सब्जी में मिलाकर खाने से उसके विटामिन पर्याप्त रूप से मिलते हैं। खाने की सजावट करने के लिए भी इसका प्रयोग किया जाता है। हरे धनिए के ताजा को काटकर दही और इसके रायते में भी खूब उपयोग किया जाता है। धनिये की खुशबू खाने के ज़ायके को बढ़ा देती है। धनिया विशेषज्ञों की राय में चिकना, चरपरा, कसैला, हल्का, कड़वा, तीक्ष्ण, गर्म और जठराग्नि को प्रज्वलित करने वाला होता है। यह भोजन को लजीज व खुशबूदार बनाता है, भूख को खोलता है पाचन की क्रिया को तेज करता है। खाने का स्वाद बढ़ने के साथ साथ इसका उपयोग औषधि के रूप में भी खूब प्रयोग किया जाता है। धनिया खून को साफ़ करके रक्त दोष दूर करता है। इस का उपयोग दस्त, खूनी दस्त,ऑव दस्त, पेट दर्द, पेट में कीडे़, अफारा, आंव, उल्टी सिर दर्द व कब्जनाशक, मूत्ररोग, मूत्र में जलन, दमा-खांसी, चेचक की गर्मी, अनिंद्रा, वीर्य दोष, स्वप्नदोष, मुंह से दुर्गंध आना, गंजापन मस्तिष्क की कमजोरी, नकसीरी, गैस अरुचि ,भूख न लगना, अपच मलेरिया बुखार, खूनी बवासीर मोतियाबिन्द बच्चों की आंखों का दर्द ,आँखों की सुजन, रोशनीवर्द्धक, आंख आना, रतौंधी (रात में न दिखाई देना) मुंह के छाले, गर्मी दूर करना, शक्तिवर्द्धक सौन्दर्यवर्द्धक, चोट, अफारा, अजीर्ण (पुरानी कब्ज) घमौरियां छाले चेहरे पर झाईयां कील-मुंहासे, खुजली, सूजन, मोच, जिगर में गर्मी, जोड़ों का दर्द, थकान और अधिक पसीना आना, पथरी, दर्द, मूर्च्छा आना । यह मोटापे को रोकता है, धनियां शरीर के रंग को निखारता है जलना, कट जाना मसूढ़ों से खून आना, चक्कर आना, पीलिया, थायराइड, हिस्टीरिया, अम्लपित्त, वात-कफ ,ज्वर, दमा खांसी, जुकाम,हकलाना, तुतलाना, मासिक-धर्म सम्बंधी परेशानियां, हाजमे की खराबी  मन्दाग्नि श्वेत प्रदर प्यास अधिक लगना, गठिया रोग, हृदय रोग, फोड़ा नाखूनों का जख्म, सिर दर्द, होठों का फटना, मस्सा और तिल होना, यह याददास्त को तेज करता है, गले की सूजन, दर्द व जलन आदि रोगों को दूर करता है। दाल व सब्जी को स्वादिष्ट बनाता है। धनिया वृद्धावस्था को दूर करता है। धनिये का अधिक मात्रा में उपयोग हानिकारक नहीं होता। सूखे धनिए के बीजों का उपयोग माउथफ्रेशनर बनाने के लिए भी किया जाता रहा है।

उपयोगिता:

  1. खाना खाने के बाद 8-10 धनिये के दाने  मुंह में डालकर चबाइए और रस को गले के नीचे उतार लीजिए यह पाचन क्रिया को सही करके भोजन को ठीक प्रकार से हजम करता है और ऊर्जा को जाग्रत करके शरीर में स्फूर्ति लाता है।
  2. धनिया किसी न किसी रूप में भोजन के साथ अवश्य लेना चाहिए जो की  शरीर के भीतर धीरे-धीरे पनपने वाले कीटाणुओं को रोकता है। धनिये में रोगों से लड़ने की शक्ति होती है। चटनी खाते ही पेट की गैस निकलने लगती है। शरीर में चुस्ती-स्फूर्ति बढ़ती है। धनिया हैजा के कीटाणुओं को भी पनपने से रोकता है।
  3. हरी धनिया की पत्तीयों को पीसकर शरीर के दर्द, सुजन व सिरदर्द के लिए माथे पर लेप बनाकर लगाने से दर्द में आराम आता है।
  4. हरे धनिये को पीसकर मिश्री मिलाकार रोगी को पिलाने से सिर दर्द दूर होता है इस से पेट की गैस  भी समाप्त हो जाती है और नींद भी गहरी आती है।
  5. एक गिलास पानी में सूखा धनियां उबालकर छानकर उस पानी को 2-3 बार पीने से पेट में  गैस  की समस्या से राहत मिलती है। हरे धनिये की चटनी में काला नमक मिलाकर सेवन करने से पेट की गैस समाप्त हो जाती है।
  6. धनिया, छोटी इलायची और काली मिर्च बराबर मात्रा में पीसकर चौथाई चम्मच घी और चीनी में मिलाकर सेवन करने से भूख बढ़ जाती है। धनिये का रस रोजाना पीने से अच्छी भूख लगती है। और पाचन क्रिया भी मजबूत हो जाती है।
  7. धनिया चूर्ण, सोंठ, अजवाइन और चुटकी भर सेंधा नमक को मिलाकर बारीक चूर्ण बना कर दिन में 2- 3 बार लेने से मलेरिया बुखार ठीक हो जाता है। धनिया और सोंठ दोनों पिसे हुए आधा-आधा चम्मच मिलाकर रोजाना 3 बार खाने से ठण्ड देकर आने वाला बुखार मिट जाता है।
  8. हरे धनिया के रस से कुल्ला करने से गले के रोगों मुँह के छालों में आराम मिलता है।
  9. धनिया को कूटकर पानी में उबाल ले, उस पानी ठंडा करके कपड़े से छान ले आँखों में टपकाने से दर्द कम होता है और आँखों की सूजन व लाली में आराम आता है।
  10. सुखा धनिया, थोड़ी सी मिश्री और किशमिश को एक साथ पीसकर पीने से नकसीरी बंद हो जाती है। और नकासीरी आने पर धनिया पत्ती का रस नाक में टपकाने से भी नकासीरी बंद हो जाती है।
  11. धनिया का चूर्ण मिश्री के साथ लेने से गर्मी की वजह से पेट में होने वाले दर्द में फायदा होता है। हरा धनिया थकान मिटाता है। स्फूर्ति लाने में सहायक होता है।
  12. विटामिन “ए” से भरपूर धनिए की चटनी बनाकर या सब्जी में डालकर खाने से आंखों को फायदे और आंखों के काफी रोग दूर हो जाते हैं। सुखा धनिया कूट कर पानी में उबाल कर ठंडा कर के, साफ़ कपड़े से छान कर शीशी में भर लें। इसकी दो-दो बूँदे आँखों में डालने से आँखों की जलन व दर्द दूर होता हैं तथा आँखों से पानी गिरना बंध होता हैं।
  13. हरे धनिये को चावल के साथ पीसकर सेवन करने से आंखों की रोशनी तेज होती है और आंखों की कमजोरी दूर होती है। या हरे धनिये और त्रिफला की चटनी बनाकर सेवन से आंखों की रोशनी तेज होती है।
  14. धनिये को  बारीख पीसकर  पानी में उबालते हैं। और ठंडा करके बारीख साफ़ कपड़े से छानकर आंखों में डालने से मोतियाबिन्द से आराम मिलता है।
  15. धनिये को पीसकर चार गुना पानी में उबाल लें एक चौथाई रह जाने पर इसमें छानकर कुल मात्रा का आधा भाग मिश्री मिलाकर गाढ़ा होने तक फिर गर्म करें। इसका रोजाना सेवन करने से दिमाग की कमजोरी ,आंखों के सामने अंधेरा आना तथा जुकाम आदि रोग दूर हो  होते हैं।
  16. धनिये को हल्का दरदरा कूट कर पानी में उबालें और ठंडा होने पर मिश्री मिलाकर पीने से शरीर में अम्ल (एसिड) की मात्रा नियंत्रित रहती है। धनियां चूर्ण और मिश्री मिलाकर ठण्डे पानी से लेने से गर्मी के दिनों में पित्त रोगों और और धनियां और मिश्री के काढ़े से पित्त ज्वर से भी निजात मिल जाती है।इस से पेचिश के रोगी को भी लाभ मिलता है।
  17. दो चम्मच धनिया, एक चम्मच सोंठ, आधा चम्मच जीरा और तीन चार लौंग इन सब को पीसकर चूर्ण बनाकर रख लें,और इसमें मिश्री मिलाकर दिन में तीन  बार के सेवन से पेट में अम्लपित्त के सभी रोग ठीक होते हैं।
  18. 10 -10 ग्राम धनिया तथा सोंठ के  काढे़ में 1 ग्राम अरंड की जड़ का चूर्ण मिलाकर  रोगी को सुबह शाम पिलाने से आंव का बनना बंद हो जाता है।
  19. धनिये के दाने और हल्दी दोनों को बारीक पीस लेना चाहिए। इस चटनी को बाहरी चोट पर लगा कर पट्टी बांध ले। इससे चोट की सूजन, नीले रंग के धब्बे और दर्द तेजी से कम होकर आराम आ जाता है।
  20. धनिया को उबाल करके ठंडा करे इसमें स्वाद के लिए थोड़ा सा काला नमक भी डाल ले। दिन में 3-4 बार इसका सेवन करे। धनिये का यह शर्बत अफारा के लिए लाभकारी होता है। धनिये के पानी से हाथ-मुंह धो ले या नहा ले पसीने की दुर्गंध काफी समय के लिए दूर हो जाती है।
  21. प्याज, लहसुन आदि गंध वाली चीजें खाने के बाद हरा धनियां चबाने से मुंह से दुर्गंध आना बंद हो जाती है। और मुंह में महक बनी रहती है।
  22. रात को  धनिया और बराबर का चावल पानी में भिगों दें सुबह गर्म करके पीयें  या रात को धनिये को पानी में भिगों दें और सुबह उठने पर उसे छानकर उसमें मिश्री डालकर सेवन करने से अधिक प्यास, शरीर की गर्मी और पेट की जलन शांत होती है।
  23. हरे धनिए के पत्तों के दो चम्मच रस में शक्कर मिलाकर पीने से पेशाब की जलन ठीक हो जाती है।या 10 ग्राम धनिये को रात में पानी में मिलाकर, छानकर मिश्री, मिलाकर पीने से पेशाब की जलन दूर हो जाती है।
  24. धनिया और मिश्री को पीसकर चावल के पानी के साथ सेवन करने से दमा और खांसी के रोग में लाभ मिलता है।
  25. सूखा धनिया और सौंफ पीसकर और छान कर बराबर की खाण्ड या मिश्री मिला कर एक चम्मच दोनों समय भोजन के बाद लेने से दिल का दर्द ठीक हो जाता है। सूखा धनिया और मिश्री को समान मात्रा में मिलाकर सेवन करने से दिल की धड़कन सामान्य हो जाती है।
  26. धनिये को रात को भिगो कर सुबह पीसकर मिश्री डालकर सेवन करें तो इससे दिल की तेज धड़कन भी सामान्य हो जाती है।
  27. धनिया चूर्ण के दो चम्मच, तुलसी की 5 पत्तियां थोड़ी सी अदरक और कालीमिर्च के चार दाने कूट पीस कर चाय में डाल कर रोगी को दिन में तीन चार बार पिलाये। फ्लू, जुकाम, बदन दर्द, पिण्डलियो में थकान, अत्यधिक थकावट, बुखार आदि सब ठीक हो जायेगा।
  28. धनिये को ताजे पानी में 2-3 घंटे के लिए भिगो दे। धनिया के दाने निकालकर पानी से चेहरे को धोये ध्यान रहे यह पानी आँखों में नहीं जाये अन्यथा आंखों की पुतलियों को हानि पहुंच सकती है। ऐसा कम से कम एक माह लगातार करे। आप देखेंगे की आपके चेहरे का रंग निखर जायेगा त्वचा कोमल साफ और मुलायम हो जाएगी।
  29. सूखे धनिये का काढ़ा बनाकर इसमें मिश्री मिलाकर रोगी को सेवन कराने से मासिक-धर्म में खून का अधिक आना रुक जाता है।
  30. हरे धनिये की कच्ची पत्तियों को चबाने से मुंह के छाले ठीक  हो जाते हैं। या सूखे धनिये तथा शहतूत दोनों को पानी में उबालकर इससे कुल्ला करने से छाले ठीक होते हैं। धनिये के बीज और मिश्री को मुंह में रखकर चबाने से गले का दर्द गायब हो जाता है।
  31. धनिया और आंवला चूर्ण रात में भिगोकर सुबह के समय मसलकर पीने से मूत्र की जलन शांत होती है।
  32. धनिया और जीरा पानी में डालकर रात को मिट्टी के बर्तन में भिगो दें। सुबह मसल छानकर इसमें मिश्री  मिलाकर पियें इससे चेचक की गर्मी का नाश होता है। इससे पेटकी आंतें भी साफ़ हो जाती है।
  33. दरदरे कुटे धनिए को पानी में भिगोकर रखें। 2 घंटे के बाद इस पानी में शहद या मिश्री मिलाकर थोडी-थोडी देर बाद पिलाने से अधिक और बार बार प्यास की बीमारी से राहत मिलती है।हरे धनिये की चटनी में चुटकी भर कपूर मिला कर पीस लें और निचोड़ लें। इस रस की दो-दो  बूँदे दोनों नाकों में डालने से और इस रस को माथे पर मलने से नकासीरी फ़ौरन बंद हो जाती है।
  34. गर्भवती महिला को  में धनिया का काढ़ा बना कर मिश्री मिला कर पीलाने से जी घबराना और उल्टियाँ बंद होती है। हरा धनिया, काला नमक, काली मिर्च को मिलाकर चटनी बनाकर चाटने से लाभ मिलता है।
  35. धनिया चूर्ण को सेंक कर पानी से फंकी लेने से दस्त आना रुक जाता है। सूखा धनिया, हरा धनिया, कच्चा और भुना हुआ जीरा इन सब को मिलाकर पीसकर सेवन करने से दस्त का आना रुकता की शिकायत दूर होती है।
  36. धनिया और मिश्री को चावल के पानी के साथ पीसें, फिर उसी पानी को छानकर पिलाने से बालकों का खांसी और दमे का रोग नष्ट हो जाता है। दमे के रोगी को धनिये की पत्तियों के रस में सेंधानमक मिलाकर पिलाने से भी लाभ होता है।
  37. हरी पत्तियों के ताजा रस में ताजा मक्खन मिला कर पीने से दस्तो में फायदा होता है और धनिया और मिश्री को एक साथ पीसकर सेवन करने से दस्त में खून आना बंद हो जाता है।
  38. बेलगिरी, धनिया और मिश्री को एक साथ पीसकर एक चम्मच चूर्ण का सेवन करने से खूनी दस्त का रोग ठीक  हो जाता है।
  39. धनियें को पीसकर मस्सें और तिल पर  नियमित रूप से लगाये मस्सें और तिल धीरे धीरे समाप्त हो जाते है।
  40. दो चम्मच धनिये के दाने, पांच चम्मच सोंठ, दो चम्मच कालीमिर्च, दो चम्मच लोंग, दो चम्मच अजवाइन और एक चम्मच सेंधानमक इन सब  को एक साथ मिलाकर इसका एक चम्मच चूर्ण गुनगुने पानी से गठिया के रोगी को देने से गठिया का दर्द ठीक हो जाता है।
  41. घुटनों पर धनिये के तेल की मालिश करने से भी गठिया का दर्द तथा हडि्डयों की कमजोरी भी ठीक हो जाती है।
  42. धनिये को चार गुना  पानी में एक चौथाई रह जाने तक उबालें और छानकर इसमें लगभग एक तिहाई मिश्री मिलाकर गाढ़ा होने तक फिर गर्म करें। रोजाना 10 ग्राम लेकर हर रोज नियमित चाटने से दिमाग तेज और कुशाग्र होता है।और धनिये के रस को सिर में मालिश करने से भी याददाश्त तेज होती है।
  43. धनिये को जौ के आटे और पानी के साथ मिला कर पीस ले नाखुनों पर लेप करें और कपड़े से बांध दें। नाखून का घाव और जलन में आराम मिलता है। धनिये और जौ का सत्तू कण्ठमाला की गांठो पर रोज लगाने से कण्ठमाला की गांठे बैठ जाती हैं।
  44. धनिये और आंवले को बराबर बराबर लेकर शाम को भिगो दें और सुबह छानकर मिश्री मिलाकर पीने से सिर का दर्द ठीक हो जाता है।
  45. सूखा धनिया और मिश्री को बराबर मात्रा में लेकर पीस कर के दो चम्मच नियमित तीन चार  बार तजा पानी के साथ सेवन करने से हाथ और पैरों की जलन ठीक हो जाती है।धनिये का चूर्ण में ईसबगोल की भूसी और मिश्री मिलाकर गर्म दूध के साथ सेवन से स्वप्नदोष, कब्ज और शीघ्रपतन की शिकायत ठीक होती है।
  46. थोड़ा सा पुदीना और थोड़ा सा सूखा धनियां, बड़ी इलायची, अजवायन और कालानमक को पीसकर चूर्ण बना ले यह पाचक औषधि भी है। इसे गर्म पानी से ले थोड़ी देर में ही खट्टी डकारे बंद होने लगती है। इसके साथ – साथ धनिया और सौंफ के दाने मुंह में डालकर चबा-चबा कर खाए। कुछ ही देर में डकारें आना बंद हो जायेंगी।
  47. धनिये से बना चूर्ण (पांच चम्मच सुखा धनिया,एक चम्मच सोंठ,एक चुटकी कालानमक तथा एक से दो  हरड़ लेकर पीसकर छान ले) भोजन करने के बाद गुनगुने पानी से लेने से पुराने से पुराना कब्ज भी दूर हो जाता है और पेट का दर्द भी कम हो जाता है। इस चूर्ण को थोड़ी-सी मात्रा में लेते हैं। आंतों की खुश्की भी दूर हो जाती है। इससे कब्ज नष्ट होता है और मल भी खुलकर आने लगता है। भूख खुलकर आती है। पुराणी कब्ज के लिए इस चूर्ण को लगातार एक डेढ़ माह तक लेना चाहिए अथवा  धनिया और सनाय को रात में पानी में भिगो दें, सुबह छानकर मिश्री मिलाकर पीने से भी कब्ज दूर हो जाती है।
  48. पेट में कीड़े नष्ट करने के लिए हल्का भोजन करने के बाद शाम को गुनगुने पानी के साथ त्रिफला चूर्ण ले सुबह जब पेट साफ़ हो जाए तब पका हुआ केला ले कर उसे कुचल ले और उसमें धनिये का चूर्ण ,थोड़ा सेंधानमक और हींग को पीसकर अच्छी तरह से मिला ले और इसका तीन चार दिन तक सेवन करें। इससे पेट के कीड़े नष्ट हो जाएंगे, नींद गहरी आएगी आप तरो ताजा महसूस करेंगे। गरिष्ठ भोजन ना करे।
  49. तीन चम्मच धनिये के दाने,एक चम्मच हरड़,एक चम्मच सोंठ,एक ग्राम सेंधा नमक इन सभी को पीसकर चूर्ण बना ले। इसका 1\2 चम्मच चूर्ण सुबह-शाम गर्म पानी से लेने से अजीर्ण-कब्ज आदि पेट सम्बन्धी रोग दूर होते है। विशेष: इस चूर्ण के बाद रसदार फल या प्याज नहीं लेना चाहिए। इससे शरीर में तेजाब बन सकती है।
  50. धनिये के रस में प्याज का रस पानी में मिलाकर देने से उल्टी बंद हो जाती है। यदि पेट में जलन भी हो रही हो तो धनिया और सोंठ दोनों को उबालकर ठंडा करके रोगी को पिलायें।
  51. हरे धनिये का रस, चुटकी भर सेंधा या कला नमक और कागजी नींबू का रस तीनो को मिलाकर रोगी को पिलाने से उल्टी आना बंद होता है।
  52. हरे धनिये का रस निकालकर रोगी को पिलाने से साधारण उल्टियां और गर्भवती स्त्री की उल्टियां भी बंद हो जाती हैं। तथा धनिये उबालकर मिश्री मिलाकर रोगी को पीलाने से भी उल्टी बंद हो जाती है। और लू से बचाव  होता है।
  53. धनिया का पानी लेकर उसमें खीरे का थोड़ा सा रस और थोडे़ से अदरक का रस मिला ले इस लेप (पेस्ट) को चेहरे पर लगा ले। दो घंटे बाद साफ पानी से मुंह को धोले। इससे कील-मुंहासें तो साफ़ होंगे  ही और निकलना भी बंद हो जायेगे।
  54. धनिया और सौंफ को पीसकर इस में शक्कर डालकर पीने से उल्टी आना बंद हो जाती है। हरे धनिये और पुदीने को मिलाकर इसकी चटनी बनाकर खाने से  भी उल्टी आना बंद हो जाती है।
  55. धनिया और सोंठ का काढ़ा बना कर पीने से पेट दर्द आंव व बदहजमी दूर हो जाती  है। धनिया महिलाओं में माहवारी के समय अधिक रक्त स्राव हो तो पानी में धनिए के बीज डालकर उबाले और शक्कर डालकर पीलाएं लाभ होगा।
  56. दो चम्मच सूखा धनियां एक  चम्मच  सूखा आंवला  लेकर शाम को  मिट्टी के एक बर्तन में भिगो दें। सुबह मसल छानकर मिश्री मिलाकर सेवन करने से गर्मी के कारण हुआ सिर दर्द ठीक होता है।
  57. सूखा धनिया सोंठ, चाय की पत्ती, तुलसी के पत्तों को मिलाकर पीस ले और पानी मिलाकर लेप बना ले। इस लेप को गर्म कर ले। यह हल्का गुनगुना लेप माथे पर लगाने से सर्दी लगने से हुआ सिर दर्द दूर हो जाता है।
  58. धनिया चूर्ण में थोड़ी सौंठ डालकर उबाल ले इसे छान कर  पीने से  आंव ,पेट के दर्द और बदहजमी ठीक हो जाती है। धनिये का शर्बत बनाकर पीने से पेट दर्द में लाभदायक होता है।
  59. दो चम्मच सूखा धनिया लेकर एक-एक चम्मच  सोंठ, अजवायन, भूना जीरा डाल कर पीस ले और दो चुटकी काला नमक मिला ले इसका एक चम्मच चूर्ण गर्म पानी से दिन में तीन बार सेवन करे। गैस पीड़ित रोगी को स्थायी आराम मिलेगा। अदरक के रस में सूखे धनिये का चूर्ण भी पेट दर्द के लिए कारगर होता है।
  60. सूखा धनिया  का चूर्ण एक चम्मच , अजवायन का चूर्ण एक चम्मच  दो ग्राम कालानमक, एक ग्राम हींग,इन सब को मिल कर एक चूर्ण बना ले । इस चूर्ण को दिन में तीन चार  बार रोगी को दे। सीने में जलन, खट्टी डकारें , अम्लपित्त आदि के रोग ठीक  हो जाते  है। इसके साथ साथ  दूध को ठंडा करके थोड़ी थोड़ी देर बाद रोगी को पिलाये। हरा धनिया और हरा पुदीना इन दोनों की चटनी खाने से भी इसमें आराम आता है।
  61. धनिये के दाने पीसकर सरसों के तेल में पका ले तथा कपड़े में छानकर रूई से इस तेल को जीभ पर लगाये और मुंह खोलकर लार को बहार टपकने दे। यह क्रिया दिन में कई बार करने से मुह के छाले ठीक होते है।
  62. धनिये के पानी में खीरे का रस मिलाकर झाईयों को धोना चाहिए और सुबह-शाम धनिये के कुछ दाने चबाए। धनिये के रस को गले के नीचे उतारकर बाकी को थूक दे।  इसके साथ, ककड़ी, खीरा, सेब, नाशपाती के  रस का सेवन करे। रात को धनिये के पानी में अदरक का रस मिलाकर मुंह पर लगाए। सुबह साफ पानी से मुंह को धो ले । धीरे-धीरे त्वचा के सभी रोग नष्ट हो जाते हैं। यह औषधि झाईयों के लिए काफी गुणकारी है।
  63. एक चम्मच धनियां के दाने, तुलसी की चार पत्तियां और 2 कालीमिर्च,एक गिलास पानी में उबालकर उसमें  थोड़ी-सी शक्कर डालकर रोगी को दे । इससे दिल की  घबराहट दूर होती है और नर्वस ब्रेकडाउन मिटती है और रोगी सामान्य अवस्था में आ जाता है और  हल्का भोजन ले और आराम करे । तुलसी और धनिये का रस पानी की तरह नाक में टपकाना चाहिए।
  64. एक चम्मच धनिया, तीन चार कालीमिर्चे और तीन चार नीम की पत्तिया लेकर पीस कर चूर्ण बना ले इस चूर्ण को दिन में दो-तीन  बार पानी के साथ लेने से खून की खराबी धीरे-धीरे दूर हो जाती है। शरीर के फोड़े-फुंसी ठीक हो जाते हैं और सुस्ती भी दूर हो जाती है।
  65. त्वचा की खुजली के दाने बड़ा कष्ट देते है। इसके लिए धनिये को महीन पीसकर छानकर इसमें वैसलीन और गंधक मिला कर इस  मलहम को खुजली वाले स्थान पर दिन भर में 3-4 बार लगायें। और नीम के पत्तो को पानी में उबालकर उस पानी से नहायें। शरीर को साफ रखें। हल्का भोजन लें, अधिक गर्म या ठण्डी चीजें न खाएं। हो सके तो छाछ का सेवन करे।
  66. सूखा धनिया लेकर उसे भूनकर चूर्ण बना ले। इस चूर्ण को शहद के साथ सेवन करे । इससे जिगर की गर्मी दूर हो जाती है।
  67. धनिये को उबालकर ठंडा कर ले इसमें शहद और पिसी हुई सोंठ मिलाकर पीने से बलगम ढीला हो कर निकलने लगता है  शरीर की गर्मी और खांसी भी कम हो जाती है।
  68. धनिये के दाने पीस ले। इस चूर्ण को फंकी बनाकर ऊपर से पपीता सेब,या चीकू खाना चाहिए। इसमें नमक कतई  न डाले ,गर्म व ठण्डी वस्तुओं का सेवन न करें। इससे खून साफ होगा और पाचन क्रिया का सुधार होगा आंते भी मजबूत होगी शरीर की सूजन भी घटेगी।
  69. धनिये को दूध में उबालकर व छानकर पिसी हुई मिश्री मिलाकर सेवन से या मिश्री मिलाकर धनिये का रस पीने से खूनी बवासीर ठीक हो जाती है।
  70. धनिया और सोंठ का चूर्ण  शहद के साथ मिलाकर नियमित सुबह शाम  चाटने से पेट की गैस, बलगम और जोड़ो का दर्द ठीक होने लगता है ।
  71. सूखा धनिया और मिश्री को बराबर मात्रा में पीसकर चूर्ण बना ले और इस चूर्ण का एक चम्मच पानी के साथ सुबह-शाम कुछ दिनों तक लेने से वीर्यपात, स्वप्नदोष आदि रोगों से छुटकारा मिल जाता है। काम वासना नियंत्रित करने के लिए आधा चम्मच सूखा धनिया पीसकर पानी से  कुछ दिनों तक सेवन करें।
  72. धनिया को शहद के साथ चाटने से  हल्का पागलपन का दौरा ठीक होता है ।
  73. धनिये के काढ़े में मिश्री मिलाकर रोजाना 2-3 बार पीने से खूनी बवासीर ठीक हो जाती है। अथवा हरे धनिया का 1 चम्मच रस निकालकर उसमें थोड़ी-सी मिश्री मिलाकर सुबह नियमित सेवन से खूनी बवासीर ठीक होती है।
  74. धनिये को मिश्री के साथ मिलाकर चूर्ण बना लें। 1 चम्मच चूर्ण डालकर  सुबह-शाम गुनगुने पानी से सेवन से खूनी बवासीर तथा जलन  ठीक हो जाती है। सूखे धनिये को दूध और मिश्री के साथ मिलाकर सेवन करने से भी खूनी बवासीर ठीक होती है।अधिक छींके आने पर धनिये की पत्तियां सूंघनी चाहिए। हरे धनिये की पत्ती और सफेद चंदन को पीसकर सूंघने से बार-बार छींक आना रुकता है।
  75. हरे धनिये के रस को सूंघने से और पत्तियों को पीसकर सिर पर लगाने से गर्मी की वजह से नाक से खून बहना बंद हो जाती है।भोजन के बाद धनिये में काला नमक मिलाकर एक चम्मच चूर्ण का सेवन करने से खाना खाने के तुरंत बाद आने वाले दस्त ठीक जाते हैं।
  76. हरे धनिये के पत्ते का रस सिर पर मालिश करने से गंजे के सिर पर नये बाल आ जाते हैं।
  77. गठिया की समस्या हो या डायरिया हो तो धनिए का बीज का काढ़ा बनाकर पीएं बहुत लाभ मिलेगा।
  78. धनिए को उबाल कर ठंडा करके इस पानी से घावों को धोने से यह एंटी डायबिटीक का काम करता है।
  79. धनिया पाउडर को  हल्दी में मिलाकर त्वचा पर  उबटन के रुप मे भी इस्तेमाल करें त्वचा कोमल मुलायम और साफ़ होती है ।
  80. हरे धनिया के साथ हरा पुदीना मिलाकर चटनी बना कर सेवन करने से शरीरिक थकावट मिटती है और आराम मिलता है तथा व्यक्ति को गहरी नींद आती है।
  81. धनिये का सेवन मधुमेह रोगों  में  भी फायदेमंद होता है।
  82. बुखार आने पर सूखे धनिए को पीसकर रात भर भिगो दे । सुबह इसे मसल कर  कपडे से छानकर मिश्री मिलाकर रोगी को पिलाये। इससे शरीर की जलन भी कम होगी।इसके काढ़े का सेवन करते रहने से रक्त में इंसुलिन की मात्रा और कोलेस्ट्रोल की मात्रा नियंत्रित रहती है।
  83. पथरी की शिकायत होने पर चार पांच चम्मच धनिये को 1 लीटर पानी में उबाल  ले इसे छानकर मूली का रस और  सेंधानमक मिला ले।  इसे  छानकर बोतल  में भर कर बोतल को 8 दिन  धूप में रखे । तीन चार चम्मच सुबह-शाम पानी के साथ सेवन से पथरी गलकर पेशाब के रास्ते निकल जाती है।
  84. सूखा धनिया, सौंफ तथा मिश्री सब को 50 – 50 ग्राम  लेकर डेढ़ लीटर पानी में शाम को भिगो दें तथा  सुबह को छानकर पीस लें और उसी पानी में घोलकर छानकर पीयें। इसी तरह सुबह शाम रोजाना पीयें। पथरी गलकर बाहर निकल जाएगी और पेशाब भी खुलकर आएगा।धनिए के जूस में हल्दी पाउडर मिलाकर चेहरे पर लगाने से फोड़े फुंसियाँ दूर होती है और काले मस्से भी समाप्त हो जाते है।
  85. हरे धनिये के पत्तों का रस, शहद और रोगन गुल को आपस में मिला कर लेप करने से पित्त और इस की खुजली से रहत मिलती है।

घरेलु उपाय : यदि खाट में खटमल होतो पिसा धनिया, नौसादर और अजवायन तीनों को मिलाकर खाट पर बुरक दीजिए खटमल खाट को छोड़कर भाग जाएंगे। यहीं चूर्ण दीमकों को भी नष्ट करता है।  धनिये का  धुंआ वातावरण को शुद्ध करता है। धनिये को कंडे या लकड़ी की आग पर डालने से मच्छर  भी भाग जाते है।

हानिकारक : ध्यान रहे कि अधिक मात्रा में धनिये का सेवन करने से पुरुषों की कामशक्ति और स्त्री का मासिक-धर्म का आना रुक जाता है, जो दोनों अवस्था में हानिकारक होता है। यह याददाश्त को कमजोर करता है। धनिये के हानिकारक प्रभावों को नष्ट करने के लिए शहद और दालचीनी के उपयोग से इन दोषों को दूर किया जा सकता है।

R K Rao

देसी गाय का घी और औषधिये गुण
June 22nd, 2011

देसी गाय का घी और औषधिये गुण

देसी गाय के घी को रसायन कहा गया है। जो जवानी को कायम रखते हुए, बुढ़ापे को दूर रखता है। काली गाय का घी खाने से बूढ़ा व्यक्ति भी जवान जैसा हो जाता है।गाय के घी में स्वर्ण छार पाए जाते हैं जिसमे अदभुत औषधिय गुण होते है, जो की गाय के घी के इलावा अन्य घी में नहीं मिलते । गाय के घी से बेहतर कोई दूसरी चीज नहीं है। गाय के घी में वैक्सीन एसिड, ब्यूट्रिक एसिड, बीटा-कैरोटीन जैसे माइक्रोन्यूट्रींस मौजूद होते हैं। जिस के सेवन करने से कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से बचा जा सकता है। गाय के घी से उत्पन्न शरीर के माइक्रोन्यूट्रींस में  कैंसर युक्त तत्वों से लड़ने की क्षमता  होती है।

यदि आप गाय के 10 ग्राम घी से हवन अनुष्ठान (यज्ञ,) करते हैं तो इसके परिणाम स्वरूप वातावरण में लगभग 1 टन ताजा ऑक्सीजन का उत्पादन कर सकते हैं। यही कारण है कि मंदिरों में गाय के घी का दीपक जलाने कि तथा , धार्मिक समारोह  में यज्ञ करने कि प्रथा प्रचलित  है। इससे वातावरण में फैले परमाणु विकिरणों को हटाने की अदभुत क्षमता होती है।

गाय के घी के अन्य महत्वपूर्ण उपयोग :–

  1. गाय का घी नाक में डालने से पागलपन दूर होता है।
  2. गाय का घी नाक में डालने से एलर्जी  खत्म  हो जाती है।
  3. गाय का घी नाक में डालने से लकवा का रोग में भी उपचार होता है।
  4. 20-25 ग्राम घी व मिश्री खिलाने से शराब, भांग व गांझे का नशा कम हो जाता है।
  5. गाय का घी नाक में डालने से कान  का पर्दा  बिना ओपरेशन के ही ठीक हो जाता है।
  6. नाक में घी डालने से नाक की खुश्की दूर होती है और दिमाग तारो ताजा हो जाता है।
  7. गाय का घी नाक में डालने से कोमा से बहार निकल कर चेतना वापस लोट आती है।
  8. गाय का घी नाक में डालने से बाल झडना समाप्त होकर नए बाल भी आने लगते है।
  9. गाय के घी को नाक में डालने से मानसिक शांति मिलती है, याददाश्त तेज होती है।
  10. हाथ पाव मे जलन होने पर गाय के घी को तलवो में मालिश करें जलन ढीक होता है।
  11. हिचकी के न रुकने पर खाली गाय का आधा चम्मच घी खाए, हिचकी स्वयं रुक जाएगी।
  12. गाय के घी का नियमित सेवन करने से एसिडिटी व कब्ज की शिकायत कम हो जाती है।
  13. गाय के घी से बल और वीर्य बढ़ता है और शारीरिक व मानसिक ताकत में भी इजाफा होता है
  14. गाय के पुराने घी से बच्चों को छाती और पीठ पर मालिश करने से कफ की शिकायत दूर हो जाती है।
  15. अगर अधिक कमजोरी लगे, तो एक गिलास दूध में एक चम्मच गाय का घी और मिश्री डालकर पी लें।
  16. हथेली और पांव के तलवो में जलन होने पर गाय के घी की मालिश करने से जलन में आराम आयेगा।
  17. गाय का घी न सिर्फ कैंसर को पैदा होने से रोकता है और इस बीमारी के फैलने को भी आश्चर्यजनक ढंग से रोकता है।
  18. जिस व्यक्ति को हार्ट अटैक की तकलीफ है और चिकनाइ खाने की मनाही है तो गाय का घी खाएं, हर्दय मज़बूत होता है।
  19. देसी गाय के घी में कैंसर से लड़ने की अचूक क्षमता होती है। इसके सेवन से स्तन तथा आंत के खतरनाक कैंसर से बचा जा सकता है।
  20. संभोग के बाद कमजोरी आने पर एक गिलास गर्म दूध में एक चम्मच देसी गाय का घी मिलाकर पी लें। इससे थकान बिल्कुल कम हो जाएगी।
  21. फफोलो पर गाय का देसी घी लगाने से आराम मिलता है।गाय के घी की  झाती पर मालिस करने से बच्चो के बलगम को बहार निकालने मे सहायक होता है।
  22. सांप के काटने पर 100 -150 ग्राम घी पिलायें उपर से जितना गुनगुना पानी पिला सके पिलायें जिससे उलटी और दस्त तो लगेंगे ही लेकिन सांप का विष कम हो जायेगा।
  23. दो बूंद देसी गाय का घी नाक में सुबह शाम डालने से माइग्रेन दर्द ढीक होता है। सिर दर्द होने पर शरीर में गर्मी लगती हो, तो गाय के घी की पैरों के तलवे पर मालिश करे, सर दर्द ठीक हो जायेगा।
  24. यह स्मरण रहे कि गाय के घी के सेवन से कॉलेस्ट्रॉल नहीं बढ़ता है। वजन भी  नही बढ़ता, बल्कि वजन को संतुलित करता है । यानी के कमजोर व्यक्ति का वजन बढ़ता है, मोटे व्यक्ति का मोटापा (वजन) कम होता है।
  25. एक चम्मच गाय  का शुद्ध घी  में एक चम्मच  बूरा और 1/4  चम्मच पिसी काली मिर्च इन तीनों को मिलाकर सुबह खाली पेट और रात को सोते समय चाट कर ऊपर से गर्म मीठा दूध पीने से आँखों की ज्योति बढ़ती  है।
  26. गाय के घी को ठन्डे जल में फेंट ले और फिर घी को पानी से अलग कर ले यह प्रक्रिया लगभग सौ बार करे और इसमें थोड़ा सा कपूर डालकर मिला दें। इस विधि द्वारा प्राप्त घी एक असर कारक औषधि में परिवर्तित हो जाता है जिसे जिसे त्वचा सम्बन्धी हर चर्म रोगों में चमत्कारिक मलहम कि तरह से इस्तेमाल कर सकते है। यह सौराइशिस के लिए भी कारगर है।
  27. गाय का घी एक अच्छा(LDL)कोलेस्ट्रॉल है। उच्च कोलेस्ट्रॉल के रोगियों को गाय का घी ही खाना चाहिए। यह एक बहुत अच्छा टॉनिक भी है। अगर आप गाय के घी की कुछ बूँदें दिन में तीन बार,नाक में प्रयोग करेंगे तो यह त्रिदोष (वात पित्त और कफ) को संतुलित करता है।
  28. घी, छिलका सहित पिसा हुआ काला चना और पिसी शक्कर (बूरा) तीनों को समान मात्रा में मिलाकर लड्डू बाँध लें। प्रातः खाली पेट एक लड्डू खूब चबा-चबाकर खाते हुए एक गिलास मीठा कुनकुना दूध घूँट-घूँट करके पीने से स्त्रियों के प्रदर रोग में आराम होता है, पुरुषों का शरीर मोटा ताजा यानी सुडौल और बलवान बनता है।
  29. रात को सोते समय एक गिलास मीठे दूध में एक चम्मच घी डालकर पीने से शरीर की खुश्की और दुर्बलता दूर होती है, नींद गहरी आती है, हड्डी बलवान होती है और सुबह शौच साफ आता है। शीतकाल के दिनों में यह प्रयोग करने से शरीर में बलवीर्य बढ़ता है और दुबलापन दूर होता है।

विशेष :-स्वस्थ व्यक्ति भी हर रोज नियमित रूप से सोने से पहले दोनों नाशिकाओं में हल्का गर्म (गुनगुना ) देसी गाय का घी ही डालिए अन्य किसी  दूसरी  नस्ल की गाय का घी इतना बढ़िया नहीं होता है ।

  1. इससे गहरी नींद आएगी, खराटे बंद होंगे और अनेको अनेक बीमारियों से छुटकारा भी मिलेगा।
  2. इसके लिए बिस्तर पर लेट कर दो दो बूंद दोनों  नाकों में डाल कर पांच मिनट तक सीधे लेटे रहिये घी को जोर लगा कर न खीचें यह किर्या अधिक प्रभाव शाली होती है।
  3. सामान्य व्यक्ति रात को सोते वक्त तथा रोगी दिन में तीन बार देसी गाय का घी नाक में डाल सकते है ।
R.K.Rao
अर्जुन वृक्ष (Terminalia arjuna)
June 18th, 2011

अर्जुन वृक्ष

अर्जुन वृक्ष भारत में होने वाला एक औषधीय और सदाबहार वृक्ष है भारतीय पहाड़ी क्षेत्रों में नदी-नाले के किनारे, सड़क के किनारे ओर जंगलों में यह महा औषधिये वर्क्ष बहुतायत में पाया जाता है। इसका उपयोग रक्तपित्त (खून की उल्टी), प्रमेह, मूत्राघात, शुक्रमेह, खूनी प्रदर, श्वेतप्रदर, पेट दर्द, कान का दर्द, मुंह की झांइयां,कोढ  बुखार, क्षय और खांसी में भी लाभप्रद रहता है। हृदय रोग के लिए तो इसे रामबाण औषधि माना जाता है। यह नाडी की क्षीणता को सक्रिय करता है, पुराणी खांसी, श्वास दमा, मधुमेह, सूजन,जलने पर, मुंह के छाले पर और  हिस्टीरिया आदि रोगों में लाभदायक है। हृदय की रक्तवाही नलिकाओं में थक्का बनने से रोकता है। यह शक्तिवर्धक, चोट से निकलते खून को रोकने वाला (रक्त स्तम्भक) एवं प्रमेह नाशक भी है। इसे मोटापे को रोकने, हड्डियों को जोड़ने में, खूनी पेचिश में, बवासीर में, खून की कलाटिंग रोकने में मदद करता है और केलोस्ट्राल को भी घटाता है। यह ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करता है, पत्थरी को निकलता है, लीवर को मजबूत करता है, बवासीर को ठीक करता है। ताकत को बढ़ाने के लिए और यह एंटीसेप्टिक का भी काम करता है।

  1. अर्जुन की छाल शारीरिक कमजोरी में हृदयाघात में, हृदय शूल में खूनी बवासीर में पेशाब की जलन, श्वेत प्रदर, सूजन व दर्द  में तथा चर्म रोगों में एक चम्मच अर्जुन की छाल चूर्ण रूप में घी या गुड़ के साथ देते हैं। हृदय गति ढीली पड़ने पर अर्जुन की छाल व गुड़ को दूध में उबाल कर पिलाते हैं।
  2. एक चम्मच अर्जुन की छाल का चूर्ण एक कप (मलाई रहित) दूध के साथ सुबह-शाम नियमित सेवन करने से हृदय के सभी रोगों में लाभ मिलता है, दिल की धड़कन सामान्य होती है।
  3. अर्जुन की छाल के चूर्ण को चाय के साथ एक चम्मच इस चूर्ण को उबालकर ले सकते हैं। उच्च रक्तचाप भी सामान्य हो जाता है। चायपत्ती  की बजाये अर्जुन की छाल का चूर्ण डालकर ही चाय बनायें, यह और भी प्रभावी होगी। अर्जुन की छाल और गुड़ को दूध में उबाल कर रोगी को पिलाने से दिल मजबूत होता है और सूजन मिटता है।
  4. एक गिलास टमाटर के रस में एक चम्मच अर्जुन की छाल का चूर्ण मिलाकर नियमित सेवन करने से दिल की धड़कन सामान्य हो जाती है।
  5. अर्जुन की छाल और मिश्री मिला कर हलुवा बना ले, इसका नित्य सेवन करने से हृदय की पीड़ा, दिल की घबराहट, अनियमित धड़कन आदि से निजात मिलती हैं।
  6. अर्जुन की छाल का दूध के साथ काढ़ा बना ले यह काढ़ा हार्ट अटैक हो चुकने पर सुबह शाम सेवन करें। इस से हृदय की तेज धड़कन, हृदय शूल, घबराहट में निश्चित तोर से कमी आती हैं।
  7. अर्जुन की छाल को कपड़े से छान ले इस चूर्ण को जीभ पर रखकर चूसते ही  हृदय की अधिक अनियमित धड़कनें नियमित होने लगती है। यह दोष रहित है और इस का प्रभाव तुरंत स्थायी तोर पर होने लगता है।
  8. आधा किलो दूध में दो चम्मच (टेबल स्पून) अर्जुन की छाल का चूर्ण मिला कर उबालकर खोया बना लें और खोये के बराबर का मिश्री पाउडर मिलाकर, हर रोज इस मिठाई को खाकर दूध पीने से हृदय की अनियमित धड़कन सामान्य होती है।
  9. अर्जुन की छाल को छाया में सुखाकर, कूट-पीसकर और छान कर चूर्ण बनाकर प्रतिदिन एक चम्मच चूर्ण गाय के घी और मिश्री के साथ मिलाकर सेवन करने से दिल की कमजोरी दूर होती है। अर्जुन की छाल को गुड़ और मुलेठी तीनों को दूध में उबालकर भी सेवन कर सकते है।
  10. अर्जुन शक्तिदायक टानिक है जो अपने लवण-खनिजों से दिल की मांसपेशियों को मजबूत बनाता है। घी, दूध ,मिश्री या गुड़ के साथ अर्जुन की छाल का महीन चूर्ण नियमित सेवन करने से हृदय रोग, जीर्णज्वर, रक्त पित्त रोग दूर होते है तथा सेवन करने वाले की उम्र भी बढाती है।
  11. अर्जुन की छाल के चूर्ण की गुड़ के साथ फंकी लेने से जीर्ण ज्वर ठीक होता है। तथा रात को दूध और चावल की खीरबना कर इस  में सुबह 4 बजे अर्जुन की छाल के 2 चम्मच चूर्ण को मिलाकर सेवन करने से श्वांस रोग नष्ट हो जाते है।
  12. अर्जुन की छाल में जरा-सी भुनी हेई हींग और सेंधा नमक मिलाकर सुबह-शाम गुनगुने पानी के साथ फंकी लेने से  गुर्दे का दर्द, पेट के दर्द और पेट की जलन में लाभ होता है।
  13. अर्जुन हृदय के विराम काल को बढ़ाता है और ह्रदय को मजबूत करता है तथा यह शरीर में जमा नहीं होता। यह मल-मूत्र द्वारा स्वयं ही बाहर निकल जाता है।
  14. अर्जुन की 2 चम्मच छाल को रातभर पानी में भिगोकर सुबह उसको उबालकर उसका काढ़ा पीने से रक्तपित्त (खून की उल्टी) में लाभ होता है। खून की उल्टी में अर्जुन की छाल के 2 चम्मच बारीक चूर्ण को दूध में पकाकर खाने से आराम आता है। इससे रक्त का बहना रुकता है।
  15. रक्तदोष त्वचा रोग एवं कुष्ठ रोग में अर्जुन की छाल का 1 चम्मच चूर्ण पानी के साथ सेवन करने से व इसकी छाल को पानी में घिसकर त्वचा पर लेप करने एवं अर्जुन की छाल को पानी में उबालकर या गुनगुने पानी में मिलाकर नहाने से कुष्ठ और त्वचा रोगों में बहुत लाभ होता है।
  16. अर्जुन की छाल को रातभर पानी में भिगोकर रखें, सुबह इसे मसलकर-छानकर या काढ़ा बनाकर पीने से रक्तपित्त रोग ठीक होता है।
  17. पेशाब की रुकावट को खोलने के लिए अर्जुन की छाल को एक गिलास पानी में डालकर 1/4 भाग शेष रह जाने तक उबालें। और छान कर रोगी को हर रोज सुबह लाभ होने तक पिलाये, पेशाब के खुलने के साथ-साथ धातु का आना भी बंद हो जाता है।
  18. सूखी अर्जुन की छाल को कूट-पीसकर महीन चूर्ण कर लें और अडूसे के ताजे पत्तों का रस निकालकर इस चूर्ण में डाल कर चूर्ण को सुखा लें, फिर अडूसे के पत्ते का रस डाले और फिर सुखा ले ऐसा सात बार करे चूर्ण को सुखाकर शीशी में भर लें। इसके आधा चम्मच चूर्ण को शहद में मिलाकर रोगी को चटाने से रोगी की खांसी में राहत मिलती है।
  19. अर्जुन की छाल को शीशे या मिटटी के बर्तन में एक दिन के लिए भिगो दे दूसरे दिन इस छाल को पीसकर सुखा ले सूखने पर दोबारा पीस कर व छान कर किसी साफ़ बर्तन में भर कर रख लें। इस एक चम्मच चूर्ण को पानी में उबाल कर शहद मिला कर दिन में तिन बार सेवन से हर प्रकार की खांसी (क्षय रोग की खून मिश्रित खांसी) और पुरानी से पुराणी खांसी में भी आराम आता है ।
  20. अर्जुन की छाल को बकरी के दूध में पीसकर दूध और शहद मिलकर पिलाने से खूनी दस्तो में शीघ्र आराम आ जाता है।
  21. हड्डी टूट जाने और चोट लगने पर भी अर्जुन की छाल शीघ्र लाभ करती है। अर्जुन की छाल के चूर्ण की फंकी दूध के साथ लेने से टूटी हुई हड्डी जुड़ जाती है। और अर्जुन की छाल को पानी के साथ पीसकर लेप करने से दर्द में भी आराम मिलता है। टूटी हड्डी के स्थान पर अर्जुन की छाल को घी में पीसकर लेप करेंके पट्टी बांध ले हड्डी शीघ्र जुड़ जाती है।
  22. आग से जलने पर होने वाला घाव पर अर्जुन की छाल के चूर्ण को लगाने से घाव शीघ्र ही भर जाता है। अर्जुन छाल को कूट कर काढ़ा बनाकर घावों और जख्मों को धोने से लाभ होता है।
  23. बवासीर में अर्जुन की छाल, बकायन के फल और हारसिंगार के फूल तीनो को पीसकर बारीक चूर्ण बनाले इसे दिन में दो-तिन बार नियमित सेवन करने से खूनी बवासीर ठीक हो जाता है तथा बवासीर के मस्से ठीक हो जाते है।
  24. अर्जुन और जामुन के सूखे पत्तों का चूर्ण शारीर पर उबटन की तरह लगाकर कुछ देर बाद नहाने से अधिक पसीने से पैदा दुर्गंध दूर होती है ।
  25. नारियल के तेल में अर्जुन की छाल के चूर्ण को मिलाकर मुंह के छालों पर लगायें। मुंह के छाले ठीक हो जायेंगे।
  26. विशेष : सीने में दर्द की शिकायत की अनदेखा न करें और न ही खुद से दवा या उपचार लें, बल्कि हृदय का उपचार किसी विशेषज्ञ की देखरेख में ही होना चाहिए।
  27. R K Rao
जीरा (Cumin seed)
June 15th, 2011

जीरा (Cumin seed)

जीरा (Cumin seed)एक गुणकारी,स्वादिष्ट और सुगंधित मसाला और एक घरेलु औषधि है, जो की स्वास्थ के लिए भी गुणकारी होता है। भारतीय रशोई मे इसका प्रयोग लगभग हर तरकारी , सब्जी रायते में होता है। इसे गरम मसाले में भी उपयोग किया जाता है इसका उपयोग  सब्जियों मे,रायते में, पानी पूरी में और जलजीरे मे किया जाता है मसाले के रुप में ये खाने को लजी़ज बनाता है, भूख बढ़ता है, और पाचन किर्या को उत्तेजित करता है तथा दुरुस्त रखता है इसकी महक से ही  भूख उग्र हो जाती है जीरा अरुचि, पेटमें गैस अफरा, अपच आदि को दूर करने में जीरा विश्वसनीय औषधि है। इसे कूट या पीस कर , भूनकर, तल कर या साबुत भारत के हर रशोई घर में प्रयोग किया जाता है। जीरा में लौहा भरपूर मात्रा में पाया जाता है। भोजन में डाल कर सेवन करते रहने से शरीर मे लौहे की कमी नही रहती। जीरा कृमि और ज्वरनाशक भी।

  1. जीरा पाचन क्रिया को दुरुस्त रखता है। सौंफ और जीरे का साथ मे सेवन करने से पेट साफ रहता है। उल्टी होने पर नींबू के रस मे जीरा मिला कर रोगी को देने से लाभ मिलता है।
  2. जीरा में रक्त साफ करने की भी क्षमता होती है। इसके सेवन से शरीर में मौजूद टॉक्सिन बाहर निकाल आते है।
  3. जीरा, काली मिर्च, सोंठ और करी पावडर को बराबर मात्रा में लेंकर मिश्रण तैयार कर लें कब्जियत की शिकायत होने पर इसे इच्छानुसार काला या सेंधा नमक डालकर घी मिलाकर चावल के साथ खाएं। पेट साफ होगा सामान मात्रा में जीरा, काली मिर्च और अदरक लेकर पानी में डालकर काढ़ा तैयार कर लें। इसको तीन दिन तक सुबह शाम पीने से गैस बनने पर रोक लगेगी। पेट मे गैस होने पर जीरा, हींग और सेंधा नमक का चूर्ण बनाकर साथ में लेने से भी फायदा होता है।
  4. जुकाम होने पर भूने जीरे को लगातार सुघंने से लाभ मिलता है। जीरे को भुन कर तुरंत एक साफ सफेद कपडे में डाल कर पोटली बना कर जुखाम के रोगी को सुंघाए जिससे गले की खीच खीच और जुकाम में राहत मिलेगी।
  5. जीरे को पानी में उबाल लें और पानी को छानकर कुल्ला करें तो दातों में दर्द होने पर और मुंह के छालों में आराम मिलेगा।इसके चूर्ण से मसूड़ों की मालिश से सूजन और मुंह में बदबू दूर होती है।
  6. जीरे का सेवन से गर्मी शांत होती हैं और आंखों की रोशनी भी बढ जाती है। सफेद जीरा पेट, लीवर और आंतों को मजबूत करता है। यह गुर्दे और मूत्राशय के रोगों में सूजन और कफ में कारगर है, इसका काढ़ा रात का अंधेपन , आंखो के जख्म और पथरी को तोड़ता है।जीरा, आंवला और कपास के पत्तों को मिलाकर ठण्डे पानी में पीसकर इस लेप को सिर पर लगाकर पट्टी बांधने से रतौंधी (रात में दिखाई न देना) दूर होती है।
  7. जीरे और चीनी को बराबर मात्रा  लेकर पीसकर चूर्ण बना कर 1 चम्मच चूर्ण दिन में तीन बार ताजा पानी के साथ लेने से पथरी ठीक होती है।
  8. जीरे का तेल बहुत गुणकारी होता है। इस तेल का उपयोग औषधियों एवं भोजन में होता है। इस के तेल की मालिश से जोडों के दर्द में राहत मिलती है। और जकड़न एवं ऎठन को दूर करता है। त्वचा रोग में भी यह लाभप्रद होता है।
  9. ब्लड में शुगर की मात्रा को नियंत्रित करने के लिए आघा छोटा चम्मच पिसा जीरा दिन में दो बार पानी के साथ पीएं।एक ग्लास दूघ को उबालकर ठंडा करके उसमे 1/1 ग्राम जीरा और काली मिर्च पाउडर डालकर पीएं इससे पाचन क्रिया भी चुस्त दुरूस्त होगी।
  10. बच्चों के दस्त में बबूल की कोमल पत्ती, अनार की कली और जीरा मिला कर दें। जीरे का सेवन करने से हाजमा बेहतर होता है, और भूख भी लगती है। एक चम्मच जीरे का चूर्ण दही में मिलाकर खाने से दस्तों में राहत मिलती है।
  11. एक केले के साथ छोटा चम्मच भुने जीरे का चूर्ण मिला कर रात को खाने के बाद सेवन से रात को गहरी नींद आती है।ताजी छाछ में सेंधा या काला नमक और भुना जीरा डालकर भोजन के साथ सेवन करने से पेट की गड़बड़ी  दूर होगी और भोजन भी ठीक से पचेगा।
  12. जीरा और हींग चूर्ण एवं सेंधा नमक के साथ लेने से पेट की गैस से राहत मिलती  है।
  13. ताजी छाछ में हींग, जीरा और सेंधा नमक डालकर पीने से गैस और बवासीर में लाभ होता है। बवासीर में मिश्री के साथ सेवन करने से शांति मिलती है।
  14. जीरा ,सौंफ और सेंधा नमक को सेवन करने से पेट की जलन दूर होती है और पाचन क्रिया मजबूत होती है।
  15. आंवला को भुनकर गुद्दे को पीसकर घी में भून ले फिर जीरा, अजवायन, सेंधा नमक और हिंग को भुन कर मिला ले। इसकी गोलीयां बनाकर सेवन करने से पाचन क्रिया (अपच, दस्त और चक्कर) ठीक होगी और भूख भी बढ़ेगी।
  16. जीरा, काला नमक, अजवायन चूर्ण, चीनी, इन सब का मिश्रण बना कर इसमें नीबू का रस निचोड़ कर पानी के साथ दिन में तीन बार सेवन करे पेशाब खुल कर आता है।
  17. गुनगुने पानी में नीबू, सेंधा नमक, जीरा, भुनी हींग, पुदीना मिलाकर तीन माह तक सेवन से हिस्टीरिया के रोगी को रहत मिलती है।
  18. जीरा और दो छोटी इलायची पीसकर नीबू का रस, मिलाकर उलटी के रोगी को दिन मे कई बार पिलाएं। उल्टी पर निश्चित तोर से  रोक लगेगी।
  19. थायरॉइड के लिए एक कप पालक के रस के साथ एक चम्मच शहद और थोडा जीरे का चूर्ण मिलाकर सेवन करने से गले की गांठों में लाभ होता है।
  20. जीरे को पानी में उबाल कर उस पानी से स्नान करने से चरम रोग और खुजली मिटती है। जीरे को उबालकर उस पानी से मुंह धोएं इससे चेहरे की सुन्दरता बढ़ जाती है।
  21. जीरे व नमक को पीसकर घी व शहद में मिलाकर थोड़ा गर्म करके बिच्छू के डंक पर लगाने से विष उतर जाता है।
  22. प्रसूति के बाद जीरे और अजवायन का सेवन गर्भाशय की सफाई के लिए देसी उपाय माना जाता है।
  23. थोड़े से जीरे को दूध के साथ फांकने से कम सुनाई देने का रोग दूर हो जाता है।

विशेष : जीरे की प्रकृति गरम होती है इसके ज्यादा सेवन से बचे इससे उल्टी भी हो सकती है।

R K Rao

गिलोय बेल (Tinospora cordifolia)
June 14th, 2011

गिलोय अमृता

गिलोय पान के पत्ते कि तरह की एक त्रिदोष नाशक श्रेष्ट बहुवर्षिय औषधिये बेल होती है। अमृत के गुणों वाली गिलोय की बेल लगभाग भारत वर्ष के हर गाँव शहर बाग़ बगीचे में और वन उपवन में बहुतायत से पायी जाती है यह मैदानों, सड़कों के किनारे, जंगल, पार्क, बाग-बगीचों, पेड़ों-झाड़ियों और दीवारों पर लिपटी हुई दिखाई दे जाती है। नीम पर चढ़ी गिलोय में सब से अधिक औषधीय गुण पाए जाते हैं, नीम पर चढी हुई गिलोय नीम का गुण अवशोषित कर लेती है। इसकी पत्तियों में कैल्शियम, प्रोटीन, फासफोरस और तने में स्टार्च पाया जाता है। यह वात, कफ और पित्त का शमन करती है। गिलोय शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाती है। गिलोय एक श्रेष्ट एंटीबायटिक एंटी वायरल और एंटीएजिड भी होती है। यदि गिलोय को घी के साथ दिया जाए तो इसका विशेष लाभ होता है, शहद के साथ प्रयोग से कफ की समस्याओं से छुटकारा मिलता है। प्रमेह के रोगियों को भी यह स्वस्थ करने में सहायक है। ज्वर के बाद इसका उपयोग टॉनिक के रूप में किया जाता है। यह शरीर के त्रिदोषों (कफ ,वात और पित्) को संतुलित करती है और शरीर का कायाकल्प करने की क्षमता रखती है। गिलोय का उल्टी, बेहोशी, कफ, पीलिया, धातू विकार, सिफलिस, एलर्जी सहित अन्य त्वचा विकार, चर्म रोग, झाइयां, झुर्रियां, कमजोरी, गले के संक्रमण, खाँसी, छींक, विषम ज्वर नाशक, सुअर फ्लू, बर्ड फ्लू, टाइफायड, मलेरिया, कालाजार, डेंगू, पेट कृमि, पेट के रोग, सीने में जकड़न, शरीर का टूटना या दर्द, जोडों में दर्द, रक्त विकार, निम्न रक्तचाप, हृदय दौर्बल्य, क्षय (टीबी), लीवर, किडनी, मूत्र रोग, मधुमेह, रक्तशोधक, रोग पतिरोधक, गैस, बुढापा रोकने वाली, खांसी मिटाने वाली, भूख बढ़ाने वाली पाकृतिक औषधि के रूप में खूब प्रयोग होता है। गिलोय भूख बढ़ाती है, शरीर में इंसुलिन उत्पादन क्षमता बढ़ाती है। अमृता एक बहुत अच्छी उपयोगी मूत्रवर्धक एजेंट है जो कि गुर्दे की पथरी को दूर करने में मदद करता है और रक्त से रक्त यूरिया कम करता है। गिलोय रक्त शोधन करके शारीरिक दुर्बलता को भी दूर करती है। यह कफ को छांटता है। धातु को पुष्ट करता है। ह्रदय को मजबूत करती है। इसे चूर्ण, छाल, रस और काढ़े के रूप में इस्तेमाल किया जाता है और इसके तने को कच्चा भी चबाया जा सकता है।

  1. गिलोय एक रसायन है, यह रक्तशोधक, ओजवर्धक, ह्रुदयरोग नाशक ,शोधनाशक और लीवर टोनिक भी है। यह पीलिया और जीर्ण ज्वर का नाश करती है अग्नि को तीव्र करती है, वातरक्त और आमवात के लिये तो यह महा विनाशक है।
  2. गिलोय के 6″ तने को लेकर कुचल ले उसमे 4 -5 पत्तियां तुलसी की मिला ले इसको एक गिलास पानी में मिला कर उबालकर इसका काढा बनाकर पीजिये। और इसके साथ ही तीन चम्मच एलोवेरा का गुदा पानी में मिला कर नियमित रूप से सेवन करते रहने से जिन्दगी भर कोई भी बीमारी नहीं आती। और इसमें पपीता के 3-4 पत्तो का रस मिला कर लेने दिन में तीन चार लेने से रोगी को प्लेटलेट की मात्रा में तेजी से इजाफा होता है प्लेटलेट बढ़ाने का इस से बढ़िया कोई इलाज नहीं है यह चिकन गुनियां डेंगू स्वायन फ्लू और बर्ड फ्लू में रामबाण होता है।
  3. गैस, जोडों का दर्द ,शरीर का टूटना, असमय बुढापा वात असंतुलित होने का लक्षण हैं। गिलोय का एक चम्मच चूर्ण को घी के साथ लेने से वात संतुलित होता है ।
  4. गिलोय का चूर्ण शहद के साथ खाने से कफ और सोंठ के साथ आमवात से सम्बंधित बीमारीयां (गठिया) रोग ठीक होता है।
  5. गिलोय और अश्वगंधा को दूध में पकाकर नियमित खिलाने से बाँझपन से मुक्ति मिलती हैं।
  6. गिलोय का रस और गेहूं के जवारे का रस लेकर थोड़ा सा पानी मिलाकर इस की एक कप की मात्रा खाली पेट सेवन करने से रक्त कैंसर में फायदा होगा।
  7. गिलोय और गेहूं के ज्वारे का रस तुलसी और नीम के 5 – 7 पत्ते पीस कर सेवन करने से कैंसर में भी लाभ होता है।
  8. क्षय (टी .बी .) रोग में गिलोय सत्व, इलायची तथा वंशलोचन को शहद के साथ लेने से लाभ होता है।
  9. गिलोय और पुनर्नवा का काढ़ा बना कर सेवन करने से कुछ दिनों में मिर्गी रोग में फायदा दिखाई देगा।
  10. एक चम्मच गिलोय का चूर्ण खाण्ड या गुड के साथ खाने से पित्त की बिमारियों में सुधार आता है और कब्ज दूर होती है।
  11. गिलोय रस में खाण्ड डालकर पीने से पित्त का बुखार ठीक होता है। और गिलोय का रस शहद में मिलाकर सेवन करने से पित्त का बढ़ना रुकता  है।
  12. प्रतिदिन सुबह-शाम गिलोय का रस घी में मिलाकर या शहद गुड़ या मिश्री के साथ गिलोय का रस मिलकर सेवन करने से शरीर में खून की कमी दूर होती है।
  13. गिलोय ज्वर पीडि़तों के लिए अमृत है, गिलोय का सेवन ज्वर के बाद टॉनिक का काम करता है, शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है। शरीर में खून की कमी (एनीमिया) को दूर करता है।
  14. फटी त्वचा के लिए गिलोय का तेल दूध में मिलाकर गर्म करके ठंडा करें। इस तेल को फटी त्वचा पर लगाए वातरक्त दोष दूर होकर त्वचा कोमल और साफ होती है।
  15. सुबह शाम गिलोय का दो तीन टेबल स्पून शर्बत पानी में मिलाकर पीने से पसीने से आ रही बदबू का आना बंद हो जाता है।
  16. गिलोय के काढ़े को ब्राह्मी के साथ सेवन से दिल मजबूत होता है, उन्माद या पागलपन दूर हो जाता है, गिलोय याददाश्त को भी बढाती है।
  17. गिलोय का रस को नीम के पत्ते एवं आंवला के साथ मिलाकर काढ़ा बना लें। प्रतिदिन 2 से 3 बार सेवन करे इससे हाथ पैरों और शरीर की जलन दूर हो जाती है।
  18. मुंहासे, फोड़े-फुंसियां और झाइयो पर गिलोय के फलों को पीसकर लगाये मुंहासे, फोड़े-फुंसियां और झाइयां दूर हो जाती है।
  19. गिलोय, धनिया, नीम की छाल, पद्याख और लाल चंदन इन सब को समान मात्रा में मिलाकर काढ़ा बना लें। इस को सुबह शाम सेवन करने से सब प्रकार का ज्वर ठीक होता है।
  20. गिलोय, पीपल की जड़, नीम की छाल, सफेद चंदन, पीपल, बड़ी हरड़, लौंग, सौंफ, कुटकी और चिरायता को बराबर मात्रा में लेकर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण के एक चम्मच को रोगी को तथा आधा चम्मच छोटे बच्चे को पानी के साथ सेवन करने से ज्वर में लाभ मिलता है।
  21. गिलोय, सोंठ, धनियां, चिरायता और मिश्री को सम अनुपात में मिलाकर पीसकर चूर्ण बना कर रोजाना दिन में तीन बार एक चम्मच भर लेने से बुखार में आराम मिलता है।
  22. गिलोय, कटेरी, सोंठ और अरण्ड की जड़ को समान मात्रा में लेकर काढ़ा बनाकर पीने से वात के ज्वर (बुखार) में लाभ पहुंचाता है।
  23. गिलोय के रस में शहद मिलाकर चाटने से पुराना बुखार ठीक हो जाता है। और गिलोय के काढ़े में शहद मिलाकर सुबह और शाम सेवन करें इससे बारम्बार होने वाला बुखार ठीक होता है।गिलोय के रस में पीपल का चूर्ण और शहद को मिलाकर लेने से जीर्ण-ज्वर तथा खांसी ठीक हो जाती है।
  24. गिलोय, सोंठ, कटेरी, पोहकरमूल और चिरायता को बराबर मात्रा में लेकर काढ़ा बनाकर सुबह और शाम सेवन करने से वात का ज्वर ठीक हो जाता है।
  25. गिलोय और काली मिर्च का चूर्ण सम मात्रा में मिलाकर गुनगुने पानी से सेवन करने से हृदयशूल में लाभ मिलता है। गिलोय के रस का सेवन करने से दिल की कमजोरी दूर होती है और दिल के रोग ठीक होते हैं।
  26. गिलोय और त्रिफला चूर्ण को सुबह और शाम शहद के साथ चाटने से मोटापा कम होता है और गिलोय, हरड़, बहेड़ा, और आंवला मिला कर काढ़ा बनाइये और इसमें शिलाजीत मिलाकर और पकाइए इस का नियमित सेवन से मोटापा रुक जाता है।
  27. गिलोय और नागरमोथा, हरड को सम मात्रा में मिलाकर चूर्ण बना कर चूर्ण शहद के साथ दिन में 2 – 3 बार सेवन करने से मोटापा घटने लगता है।
  28. बराबर मात्रा में गिलोय, बड़ा गोखरू और आंवला लेकर कूट-पीसकर चूर्ण बना लें। इसका एक चम्मच चूर्ण प्रतिदिन मिश्री और घी के साथ सेवन करने से संभोग शक्ति मजबूत होती है।
  29. अलसी और वशंलोचन समान मात्रा में लेकर चूर्ण बना लें, और इसे गिलोय के रस तथा शहद के साथ हफ्ते – दस दिन तक सेवन करे इससे वीर्य गाढ़ा हो जाता है।
  30. लगभग 10 ग्राम गिलोय के रस में शहद और सेंधानमक (एक-एक ग्राम) मिलाकर, इसे खूब उबाले  फिर इसे ठण्डा करके आंखो में लगाएं इससे नेत्र विकार ठीक हो जाते हैं।
  31. गिलोय का रस आंवले के रस के साथ लेने से नेत्र रोगों में आराम मिलता है।
  32. गिलोय के रस में त्रिफला को मिलाकर काढ़ा बना लें। इसमें पीपल का चूर्ण और शहद मिलकर सुबह-शाम सेवन करने से आंखों के रोग दूर हो जाते हैं और आँखों की ज्योति बढ़ जाती हैं।
  33. गिलोय के पत्तों को हल्दी के साथ पीसकर खुजली वाले स्थान पर लगाइए और सुबह-शाम गिलोय का रस शहद के साथ मिलाकर पीने से रक्त विकार दूर होकर खुजली से छुटकारा मिलता है।
  34. गिलोय  के साथ अरण्डी के तेल का उपयोग करने से पेट की गैस ठीक होती है।
  35. श्वेत प्रदर के लिए गिलोय तथा शतावरी का काढ़ा बनाकर पीने से लाभ होता है।गिलोय के रस में शहद मिलाकर सुबह-शाम चाटने से प्रमेह के रोग में लाभ मिलता है।
  36. गिलोय के रस में मिश्री मिलाकर दिन में दो बार पीने से गर्मी के कारण से आ रही उल्टी रूक जाती है। गिलोय के रस में शहद मिलाकर दिन में दो तीन बार सेवन करने से उल्टी बंद हो जाती है।
  37. गिलोय के तने का काढ़ा बनाकर ठण्डा करके पीने से उल्टी बंद हो जाती है।
  38. 6 इंच गिलोय का तना लेकर कुट कर काढ़ा बनाकर इसमे काली मिर्च का चुर्ण डालकर गरम गरम पीने से साधारण जुकाम ठीक होगा।
  39. पित्त ज्वर के लिए गिलोय, धनियां, नीम की छाल, चंदन, कुटकी क्वाथ का सेवन लाभकारी है, यह कफ के लिए भी फायदेमंद है।
  40. नजला, जुकाम खांसी, बुखार के लिए गिलोय के पत्तों का रस शहद मे मिलाकर दो तीन बार सेवन करने से लाभ होगा।
  41. 1 लीटर उबलते हुये पानी मे एक कप गिलोय का रस और 2 चम्मच अनन्तमूल का चूर्ण मिलाकर ठंडा होने पर छान लें। इसका एक कप प्रतिदिन दिन में तीन बार सेवन करें इससे खून साफ होता हैं और कोढ़ ठीक होने लगता है।
  42. गिलोय का काढ़ा बनाकर दिन में दो बार प्रसूता स्त्री को पिलाने से स्तनों में दूध की कमी होने की शिकायत दूर होती है और बच्चे को स्वस्थ दूध मिलता है।
  43. एक टेबल स्पून गिलोय का काढ़ा प्रतिदिन पीने से घाव भी ठीक होते  है।गिलोय के काढ़े में अरण्डी का तेल मिलाकर पीने से चरम रोगों में लाभ मिलता है खून साफ होता है और गठिया रोग भी ठीक हो जाता है।
  44. गिलोय का चूर्ण, दूध के साथ दिन में 2-3 बार सेवन करने से गठिया ठीक हो जाता है।
  45. गिलोय और सोंठ सामान मात्रा में लेकर इसका काढ़ा बनाकर पीने से पुराने गठिया रोगों में लाभ मिलता है।
  46. या गिलोय का रस तथा त्रिफला आधा कप पानी में मिलाकर सुबह-शाम भोजन के बाद पीने से घुटने के दर्द में लाभ होता है।
  47. गिलोय का रास शहद के साथ मिलाकर सुबह और शाम सेवन करने से पेट का दर्द ठीक होता है।
  48. मट्ठे के साथ गिलोय का 1 चम्मच चूर्ण सुबह शाम लेने से बवासीर में लाभ होता है।गिलोय के रस को सफेद दाग पर दिन में 2-3 बार लगाइए एक-डेढ़ माह बाद असर दिखाई देने लगेगा ।
  49. गिलोय का एक चम्मच चूर्ण या काली मिर्च अथवा त्रिफला का एक चम्मच चूर्ण शहद में मिलाकर चाटने से पीलिया रोग में लाभ होता है।
  50. गिलोय की बेल गले में लपेटने से भी पीलिया में लाभ होता है। गिलोय के काढ़े में शहद मिलाकर दिन में 3-4 बार पीने से पीलिया रोग ठीक हो जाता है।
  51. गिलोय के पत्तों को पीसकर एक गिलास मट्ठा में मिलाकर सुबह सुबह पीने से पीलिया ठीक हो जाता है।
  52. गिलोय को पानी में घिसकर और गुनगुना करके दोनों कानो में दिन में 2 बार डालने से कान का मैल निकल जाता है। और गिलोय के पत्तों के रस को गुनगुना करके इस रस को कान में डालने से कान का दर्द ठीक होता है।
  53. गिलोय का रस पीने से या गिलोय का रस शहद में मिलाकर सेवन करने से प्रदर रोग खत्म हो जाता है। या गिलोय और शतावरी को साथ साथ कूट लें फिर एक गिलास पानी में डालकर इसे पकाएं जब काढ़ा आधा रह जाये  इसे सुबह-शाम पीयें प्रदर रोग ठीक हो जाता है।
  54. गिलोय के रस में रोगी बच्चे का कमीज रंगकर सुखा लें और यह कुर्त्ता सूखा रोग से पीड़ित बच्चे को पहनाकर रखें। इससे बच्चे का सूखिया रोग जल्द ठीक होगा।

मात्रा : गिलोय को चूर्ण के रूप में 5-6 ग्राम, सत् के रूप में 2 ग्राम तक क्वाथ के रूप में 50 से 100 मि. ली.की मात्रा लाभकारी व संतुलित होती है।

R K Rao 

अश्वगंधा (Withania)
June 2nd, 2011

अश्वगंधा

  • अश्वगंधा एक शक्तिवर्धक रसायन है। अश्वगंधा एक श्रेष्ठ प्रचलित औषधि है और यह आम लोगो का टॉनिक है इसके गुणों को देखते हुए इस जड़ी को संजीवनी बूटी कहा जाए तो भी गलत नहीं होगा। यह शरीर की बिगडी हूई अवस्था (प्रकृति) को सुधार कर सुसंगठित कर शरीर का बहुमुखी विकास करता है। इसका शरीर पर कोई बुरा प्रभाव नहीं पड़ता। यह रोग-प्रतिरोधक क्षमता को बढाती है और बुद्धि का विकास भी करती है। अश्वगंधा में एंटी एजिड, एंटी ट्यूमर, एंटी स्ट्रेस तथा एंटीआक्सीडेंट के गुण भी पाये जाते हैं।
  • घोडे जैसी महक वाला अश्वगंधा इसको खाने वाला घोडे की तरह ताकतवर हो जाता है। अश्वगंधा की जड़ ,पत्तियां ,बीज, छाल और फल अलग अलग बीमारियों के इलाज मे प्रयोग किया जाता है। यह हर उम्र के बच्चे जवान बूढ़े नर नारी का टोनिक है जिससे शक्ति, चुस्ती, सफूर्ति तथा त्वचा पर कान्ति (चमक) आ जाती है। अश्वगंधा का सेवन सूखे शरीर का दुबलापन ख़त्म करके शरीर के माँस की पूर्ति करता है। यह चर्म रोग, खाज खुजली गठिया, धातु, मूत्र, फेफड़ों की सूजन, पक्षाघात, अलसर, पेट के कीड़ों, तथा पेट के रोगों के लिए यह बहुत उपयोगी है, खांसी, साँस का फूलना अनिद्रा, मूर्छा, चक्कर, सिरदर्द, हृदय रोग, शोध, शूल, रक्त कोलेस्ट्रॉल कम करने में  स्त्रियों को गर्भधारण में और दूध बढ़ाने में मदद करता है, श्वेत प्रदर, कमर दर्द एवं शारीरिक कमजोरी दूर हो जाती हैं।
  • अश्वगंधा की जड़ के चूर्ण का सेवन 1 से 3 महीने तक करने से शरीर मे ओज, स्फूर्ति, बल, शक्ति तथा चेतना आती है। वीर्य रोगो को दूर कर के शुक्राणुओं की वृद्धि करता है, कामोतेजना को बढ़ाता है तथा पाचन शक्ति को सुधारता है। सूखिया और क्षय रोगों मे लाभकारी है। शक्ति दायक और हर तरह का बदन दर्द को दूर करता है। रूकी पेशाब भी खुल कर आती है। इसके पत्तो को पिस कर त्वचा रोग, जोड़ो के सूजन, घावों को भरने तथा अस्थि क्षय के लिए किया जाता है। गैस की बीमारी, एसिडिटी, जोडों का दर्द, ल्यूकोरिया तथा उच्च रक्तचाप में सहायक और कैंसर से लड़ने की क्षमता आ जाती है। अश्वगंधा एक आश्चर्यजनक औषधि है, कैंसर की दवाओं के साथ अश्वगंधा का सेवन करने से केवल कैंसर ग्रस्त कोशिकाएँ ही नष्ट होती है जब कि स्वस्थ (जीवन रक्षक) कोशिकाओं को कोई क्षति नही पहुँचती। अश्वगंधा मनुष्य को लंबी उम्र तक जवान रखता है और त्वचा पर लगाने से झुर्रियां मिटती है।
  1. अश्वगंधा की जड़ का चूर्ण सेवन तीन माह तक लगातार सेवन करने से कमजोर (बच्चा, बड़ा, बुजुर्ग, स्त्री ,पुरुष) सभी की कमजोरी दूर होती है, चुस्ती स्फूर्ति आती है चेहरे ,त्वचा पर कान्ति (चमक) आती है शरीर की कमियों को पूरा करते हुए धातुओं को पुष्ट करके मांशपेशियों को सुसंठित करके शरीर को गठीला बनाता है। लेकिन इससे मोटापा नहीं आता।
  2. समय से पहले बुढ़ापा नहीं आने देती और  इसके तने की सब्जी बनाकर खिलने से बच्चो का सूखा रोग बिलकुल ठीक हो जाता है।
  3. अश्वगंधा एक शक्तिवर्धक रसायन है। इसकी जड़ का चूर्ण दूध या घी के साथ लेने से निद्रा लाता है तथा शुक्राणुओं की वृद्धि करता है।यदि कोई वृद्ध व्यक्ति शरद ऋतु में इसका एक माह तक सेवन करता है तो उसकी मांस मज्जा की वृद्धि और विकास हो कर के वह युवा जैसा हल्का व् चुस्त महसूस करने लगता है।
  4. अश्वगंधा का चूर्ण 15 दिन तक दूध या पानी से लेने पर बच्चो का शरीर पुष्ट होता है
  5. मोटापा दूर करने के लिए अश्वगंधा, मूसली , काली मूसली की समान मात्रा लेकर कूट छानकर रख लें, इसका सुबह 1 चम्मच  की मात्रा दूध के साथ लेना चाहिए। डायबिटीज के लिए अश्वगंध और मेथी का चूर्ण पानी के साथ लेना चाहिए।
  6. इसके नियमित सेवन से हिमोग्लोबिन में वृद्धि होती है। कैंसर रोगाणुओं से लड़ने की क्षमता बढाती है।
  7. अश्वगंधा और बहेड़ा को पीसकर चूर्ण बना लें और  थोड़ा-सा गुड़ मिलाकर  इसका  एक चम्मच( टी स्पून)  गुनगुने  पानी के साथ सेवन करें। इससे दिल की  धड़कन नियमित और मजबूत होती है। दिल और दिमाग की कमजोरी को ठीक करने के लिए एक एक चम्मच अश्वगंधा चूर्ण  सुबह-शाम एक  कप गर्म दूध से लें।
  8. अश्वगंधा का चूर्ण को शहद एवं घी के साथ लेने से श्वांस रोगों में फायदा होता है और दर्द निवारक होने के कारण बदन दर्द में लाभ मिलता है।
  9. समान  मात्रा में अश्वगंधा, विधारा, सौंठ  और मिश्री को लेकर बारीक चूर्ण बना लें।  सुबह और शाम इस  एक एक चम्मच चूर्ण को दूध के साथ  सेवन करने से शरीर में शक्ति, ऊर्जा वीर्य बल बढ़ता है। या सुबह-शाम एक-एक चम्मच अश्वगंधा चूर्ण को  घी और मिश्री मिले हुए दूध के साथ लेने से शरीर में चुस्ती स्फूर्ति आ जाती है।
  10. अश्वगंधा के चूर्ण को शहद के साथ चाटने से शरीर बलवान होता है।हाई ब्लड प्रेशर के लिए 10 ग्राम गिलोय  चूर्ण, 20 ग्राम सूरजमुखी बीज का चूर्ण, 30 ग्राम अश्वगंधा जड़ का चूर्ण और 40  ग्राम मिश्री लेकर इन सब को एक साथ मिळाले और शीशे के जार में भर कर रख ले और एक एक टी स्पून  दिन में 2-3 बार पानी के साथ सेवन करें हाई ब्लड प्रेशर में लाभ होगा।
  11. एक गिलास पानी में अश्वगंधा के ताजा पत्ते उबाल कर छानकर चाय की तरह तीन-चार दिन तक पीयें, इससे कफ और खांसी ठीक होती है।अश्वगंधा की जड़ से तैयार तेल से जोड़ों पर मालिश करने से गठिया जकडन को कम करता है तथा अश्वगंधा के पत्तों को पिस कर लेप करने से थायराइड ग्रंथियों के बढ़ने की समस्या दूर होती है।
  12. अश्वगंधा पंचांग यानि जड़, पत्ती, तना, फल और फूल को कूट छानकर एक-डेढ़ चम्मच (टेबल स्पून) सुबह शाम सेवन करने से जोड़ों का दर्द ठीक होता है। आधा चम्मच अश्वगंधा के चूर्ण को सुबह-शाम गर्म दूध तथा पानी के साथ लेने से गठिया रोगों को शिकस्त मिलती है तथा समान मात्रा में अश्वगंधा चूर्ण और घी में थोडा शक्कर मिलाकर सुबह-शाम खाने से संधिवात दूर होता है।
  13. अश्वगंधा का चूर्ण में बराबर का घी मिलाकर या एक चम्मच अश्वगंधा चूर्ण में आधा चम्मच सोंठ चूर्ण और इच्छानुसार चीनी मिला कर सुबह-शाम नियमित सेवन से गठिया में आराम आता है।
  14. अश्वगंधा और मेथी की समान मात्रा और इच्छानुसार गुड़ मिलाकर रसगुल्ले के समान गोलियां बना लें। और सुबह-शाम एक एक गोली दूध के साथ खाने से वात रोग खत्म हो जाते हैं।
  15. अश्वगंधा और विधारा चूर्ण को सामान मात्रा में मिलाकर सुबह शाम एक-एक (टी स्पून)  दूध के साथ लेने से वीर्य में वृद्धि होती है और संभोग क्षमता बढ़ती है, स्नायुतंत्र ठीक होकर क्रोध नष्ट हो जाता है, बार-बार आने वाले सदमे खत्म हो जाते हैं और जोड़ो का दर्द खत्म हो जाता है।
  16. एक चम्मच अश्वगंधा के चूर्ण के साथ एक चुटकी गिलोय का चूर्ण मिलाकर शहद के साथ चाटने से सभी रोगो में लाभ मिलता हैं।
  17. गिलोय की छाल और अश्वगंधा  को मिलाकर  शाम को गर्म पानी से सेवन करने से जीर्णवात ज्वर ठीक हो जाता है।
  18. जीवाणु नाशक औषधियों के साथ अश्वगंधा चूर्ण को क्षय रोग (टी. बी.) के लिए देसी गाय के घी या मिश्री के साथ देते हैं।
  19. एक चम्मच अश्वगंधा चूर्ण के क्वाथ (काढा) में चार चम्मच घी मिलाकर पाक बनाकर तीन माह तक सेवन करने से गर्भवती महिलाओं की शारीरिक दुर्बलता दूर होती हैं।
  20. अश्वगंधा, शतावरी और नागौरी तीनो को बराबर मात्रा में लेकर पीसकर चूर्ण बनायें, फिर देशी घी में मिलाकर इस चूर्ण को मिट्टी के बर्तन में रखें, इसी एक चम्मच चूर्ण को मिश्री मिले दूध के साथ सेवन करने से स्तनों का आकार बढ़ता है।
  21. मासिक-धर्म शुरू होने से लगभग एक सप्ताह पहले समान मात्रा में अश्वगंधा चूर्ण और चीनी मिला कर रख ले इस चूर्ण की दो चम्मच सुबह  खाली पेट पानी से सेवन करे। मासिक-धर्म शुरू होते ही इसका सेवन बंद कर दे।इससे मासिक धर्म सम्बन्धी सभी रोग समाप्त होंगे।
  22. अश्वगंधा चूर्ण का लगातार एक वर्ष तक सेवन करने से शरीर के सारे दोष बाहर निकल जाते हैं पुरे शरीर की सम्पूर्ण शुद्धी होकर कमजोरी दूर होती है।
  23. दूध में अश्वगंधा को अच्छी तरह पका कर छानकर उसमें देशी घी मिलकर माहवारी समाप्त होने के बाद महिला को एक दिन के लिए सुबह और शाम पिलाने से गर्भाशय के रोग ठीक हो जाते हैं और बाँझपन दूर हो जाता है।
  24. अश्वगंधा का चूर्ण, गाय के घी में मिलाकर मासिक-धर्म स्नान के पश्चात् प्रतिदिन गाय के दूध  या ताजे पानी के साथ 1 चम्मच  महीने  भर तक नियमित सेवन करने से स्त्री निश्चित तोर पर गर्भधारण करती है।अथवा अश्वगंधा की जड़ के काढ़े और लुगदी में चौगुना घी मिलाकर पकाकर सेवन करने से भी स्त्री गर्भधारण करती है।
  25. गर्भपात का बार-बार  होने पर अश्वगंधा और सफेद कटेरी की जड़ का दो-दो चम्मच रस गर्भवती महिला  5 – 6 माह  तक सेवन करने से  गर्भपात नहीं होता।
  26. गर्भधारण न कर पाने पर अश्वगंधा के काढे़ में दूध और घी मिलाकर स्त्री को एक सप्ताह तक पिलाए या अश्वगंधा का एक चम्मच चूर्ण  मासिक-धर्म के शुरू होने के लगभग सप्ताह पहले से सेवन करना चाहिए।
  27. समानं मात्रा में अश्वगंधा और नागौरी को लेकर चूर्ण बना ले। मासिक-धर्म समाप्ति के बाद स्नान शुद्धी होने के उपरांत दो चम्मच इस चूर्ण का सेवन करें तो इससे बांझपन दूर होकर महिला गर्भवती हो जाएगी।
  28. यह औषधि काया कल्प योग की एक प्रमुख औषधि मानी जाती है एक वर्ष तक नियमित सेवन काया कल्प हो जाता है।
  29. रक्तशोधन के लिए अश्वगंधा और चोपचीनी का बारीक चूर्ण समान मात्रा में मिला कर हर रोज सुबह-शाम शहद के साथ चाटे।
  30. अश्वगंधा कमजोर, सूखा रोग पीड़ित बच्चों व रोगों के बाद की कमजोरी में, शारीरिक और मानसिक थकान बुढ़ापे की कमजोरी, मांसपेशियों की कमजोरी व थकान आदि में अश्वगंधा की जड़ का चूर्ण देसी गाय का घी और पाक निर्धारित मात्रा में सेवन कराते हैं । मूल चूर्ण को दूध के अनुपात के साथ देते हैं।
विशेष :-गर्म प्रकृति वालों के लिए अश्वगंधा का अधिक मात्रा में उपयोग हानिकारक होता है। गोंद कतीरा एवं घी इसके गुणों को सुरक्षित रखते हुए, दोषों को कम करता है।
  • साधारणत: सामान्य आदमी अश्वगंधा जड़ का आधा चम्मच चूर्ण सुबह खाली पेट पानी से ले ऊपर से एक कप गर्म दूध या चाय लें  सकते है।नाश्ता 15-20 मिनट बाद ही करें। किसी भी जडी -बूटी को सवेरे खाली पेट सेवन करने से अधिक लाभ होता है।
  • और कोई भी और्वेदिक औषधि तीन माह तक नियमित सेवन के बाद 10-15 दिन का अंतराल देकर दोबारा फिर से शुरू कर सकते है
  • आपको कोई बीमारी न हो तो भी अश्वगंधा का तीन माह तक नियमित सेवन किया जा सकता है। इससे शारीरिक क्षमता बढ़ने के साथ साथ सभी उक्त बिमारियों से निजात मिली रहती है।

R K Rao

क्या आप जानते है ?
May 26th, 2011

  • गुनगुना पानी  और स्वास्थ्य

  1. गुनगुने पानी को  मुंह में घुमा घुमा कर  घूंट घूंट करके पीने से मोटापा नियंत्रित होता है ।
  2. गुनगुना पानी जोड़ों के बीच चिकनाई का काम करता है, जिससे गठिया रोगों की आशंका काफी कम हो जाती है।
  3. गुनगुना पानी शरीर में मौजूद गंदगी को साफ करने की प्रक्रिया तेज करता है और गुर्दों के माध्यम से गंदगी बाहर निकल जाती हैं।
  4. पाचन किर्या मजबूत होती है कब्ज से रहत मिलती है ।
  5. थोड़ा अधिक गुनगुना गर्म पानी रक्तप्रवाह को सुचारू रखता है।
  6. गुनगुने पानीमें नींबू और शहद मिलाकर लेने से रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ जाती है।
  7. गुनगुना पानी सौंदर्य और स्वास्थ्य को और त्वचा संबंधी बीमारियों को ठीक रखता है
  8. पानी से प्यास बुझने के साथ साथ  पाचन-तंत्र से लेकर मस्तिष्क विकास  में महत्वपूर्ण योगदान  होता है।
  9. गुनगुना पानी घूंट घूंट करके पिने से शरीर ज्यादा हल्का चुस्त और दुरुस्त होता है
  10. बचपन से अगर शरीर को पर्याप्त पानी नहीं  मिलेगा, तो हड्डियां भी कमजोर  होंगी।
  11. मेहनत करने के पहले  थोड़ा गुनगुना पानी पी ले थकान कम महसूस होगी और आपका शरीर ज्यादा हल्का महसूस करेगा ।

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क्या आप जानते है ?
  1. पुरातन आर्युवेदिक वैद्यों यूनानी, हकीमों, होम्योपैथी के जन्मदाता डॉ. सेमुअल हैनीमेन जैसे चिन्तक मनीषियों ने तथा अमेरिका की प्रतिष्ठित फूड एण्ड ड्रग एडिमिनिस्ट्रेशन जैसी आधुनिकतम संस्थाओं ने एक स्वर से एक समय में एक से अधिक औषधि न दिए जाने का ही समर्थन किया है ।
  2. हमें एक समय में एक ही औषधि का प्रयोग करना चाहिए प्राचीन वैद्यों के अनुसार एक बार में यदि एक से अधिक औषधि मिला दी जाएँ तो उनके प्रभाव में अत्यधिक परिवर्तन आ जाता है
  3. प्रभाव की तीव्रता के कारण एक ही औषधि वह लाभ दिखा देती है जो अन्य सम्मिश्रणों से दब जाते हैं
  4. कहीं-कहीं ही  ये मिश्रण लाभकारी हो सकते हैं ।

 

R K Rao

ग्वारपाठा*घृतकुमारी( Aloe vera)
May 25th, 2011

एलोवेरा*ग्वारपाठा*घृतकुमारी

एक लोकप्रिय वनस्पति, औषधि और घर, बगीचे की शान एलोवेरा, ग्वार पाठा, घृतकुमारी और घीकुवांर कई नामों से जाना जाता है। अमृत जैसे गुणों वाली मानव कल्याण कारी इस औषधिय पोधे में सैकड़ो बीमारियों का उपचार करने की अद्भुत क्षमता है। यह एक साइलेंट हीलर, चमत्कारीक औषधि है। एलो वेरा जैसे गुण किसी अन्य जड़ी-बूटी में एक साथ मिलना मुश्किल है। एलोवेरा घर में एक तरह का फमेली डॉक्टर (वैध) है।
भारत वर्ष में एलोवेरा की लगभग 225 से अधिक प्रजातियां पाई जाती हैं और इस का इतिहास हजारों साल पुराना है। एलोवेरा का जूस बहुत पौष्टिक होता है। इस का नियमित सेवन काया कल्प कर देता है। यह रोग-प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है खून की कमी को दूर करता है। यह खून में हीमीग्लोबिन की मात्रा बढ़ाकर बुढापे को रोकने और शरीर का वजन नियंत्रित करता है। 25 -30 मी.ली. एलोवेरा का रस सुबह खाली पेट लेने से दिन-भर शरीर में शक्ति व चुस्ती-स्फूर्ति बनी रहती है। शरीर में लगभग 90 % बिमारियाँ लगातार ख़राब पाचन से आती है। और एलोवेरा में मौजूद सापोनिन और लिग्निन आँतों में जमे मैल को साफ़ करता है और इनको पौष्टिकता प्रदान करता है। एलोवेरा से करीब दो ढाई सौ बिमारियाँ ठीक हो जाती है एलोवेरा जैल 3 और 4 महिनों के नियमित सेवन से असाध्य कहे जाने वाली बिमारियाँ, गठिया, अस्थमा, डायेबिटीज, गैस की परेशानी, ह्रदयघात, ब्लड प्रशर, मोटापा, कब्ज, पेट की गैस, थायराइड, उर्जा का क्षय, शरीर में शक्ति की वृद्धि करने वाला मानसिक तनाव, बुखार, यकृत, प्लीहा की वृद्धि को कम करने वाला, त्वचा, खांसी, दमा, मासिक धर्म के दोष, अंडवृद्धि ,सूजन स्त्रियों की प्रसव सम्बन्धी समस्याए, कोलेस्ट्रोल, फोड़े फुंसियाँ, गुर्दे के रोग कमर दर्द, और बालों के रोग, तथा हाजमा को बढ़ाने वाला, पेट के कीड़ों को खत्म करने वाला, वीर्य की मात्रा को बढ़ाने वाला, खून को साफ करने वाला, सौन्दर्य निखारने वाला तथा आंखों के लिए गुणकारी, आमाशय को बल देने वाला, यादास्त बढ़ाने वाला, मूत्र और मासिक धर्म को नियमित करने वाला, बवासीर तथा हडि्डयों के जोड़ों के रोगों को ठीक करने वाला, आग से जले को ठीक करने वाला और कैंसर जैसी खतरनाक बीमारी में लाभदायक होता है। यह जहर को भी नष्ट करता है।
कब्ज ,दस्त (अतिसार) उलटी तथा पेट और आंतो के रोगों से बचाव करता है। आंतो की बिना किसी दोष के सफाई करता है, और पोषण देता है। एलोवेरा में मोजूद तत्व शरीर में प्रोटीन को ग्रहण करने की क्षमता को बढ़ाते है। हाजमे की खराबी से पैदा हुआ उच्च अम्लपित को नियंत्रित करके विषैलेपन को दूर करता है, हानिकारक बैक्टीरिया को नष्ट करता है। बदन दर्द मासपेशियो की जकड़न और गठिया रोगों में राम बाण है। एलोवेरा जूस की हर रोज नियमित 25 -30 मी.ली. की खुराक पीने से शरीर के प्रतिरोधक तन्त्र की (ईम्यूल सिस्टम) क्षमता को मजबूत करता है। एलोवेरा  शरीर की मरमत और पोषण सम्बन्धी जरुरतॊं को पूरा करने वाला एक कुदरती, प्रभावशाली फ़ूड सप्लीमेंट, औषधि और टोनिक है। यह आलस और थकान को दूर करके भरपूर तन्दुरुस्ती लाता है, उर्जा का स्तर बढ़ाता है, वजन को नियंत्रित करता है। त्वचा को पोषक तत्व प्रदान करता है यह घावॊं, खरोंचो, जले, खाज खुजली को और धूप की जलन को शांत करने मे भी मदद करता है। दांत मूंह और मसूढों के लिए बहुत फ़ायदेमंद है।
एलोवेरा मे अनेक प्रकार के घटक खनिज लवण विटामिन फ़ोलिक एसिड तथा नियासिन पाए जाते है। जिसका सर्जन और संग्रह शरीर द्वारा स्वयं नही किया जा सकता लेकिन शरीर को चुस्त दरुस्त और स्वस्थ रखने के लिए अत्यंत आवश्यक है एलोवेरा मे विटामिन ए. बी1, बी 6, बी 12, सी पाये जाते है। और एलोवेरा के रस या जैल में, अनेक कुदरती तत्व है जो जोडों और मांसपेशियों को गति मान बनाए रखने मे भी मदद कर सकता है। एलोवेरा में प्रभावी एंटी-ओक्सिडैनट, एंटी-एजिड, एंटी-सप्टिक, एंटी-बैक्टेरियल, एंटी-कोलस्ट्रोल, एंटी-इन्फ्लेमेट्री, एंटि-बाइटिक और एंटी-शुगर प्रापर्टीज (गुण) है। एलोवेरा में प्रचुर मात्रा में पाया जाने वाला सेपोनिन का गुण है की जो शरीर के रोगाणु को नष्ट करके अंदरूनी मरमत और सफाई करता है।

एलोवेरा के औषधिये गुण

  1. एलोवेरा का जैल जले हुए स्थान पर 2-3 बार लगाने से फफोले नहीं उठते, निशान नहीं रहते तथा जलन नहीं होती है जले हुए घाव भी जल्दी भर जाते हैं।
  2. एक चम्मच एलोवेरा जैल  में आधा चम्मच शहद मिलाकर जले हुए भाग पर लगाने से लाभ मिलता है।
  3. 25 मी. ली. अलोवेरा का रस दिन में 2 बार पीने से सिर दर्द ठीक हो जाता है।
  4. गेहूं के आटे में एलोवेरा का रस मिलाकर रोटी बना लें, और इन रोटियों को  देशी घी में डाल दें तथा इन्हें सुबह सवेरे 5 – 7 दिनों तक लगतार सेवन करने से हर तरह का सिर दर्द ठीक हो जाता है।
  5. एलोवेरा के गूदे पर सेंधा नमक डालें इसे कुत्ते के काटे हुए स्थान पर दिन में 4 बार लगाये इस प्रयोग से लाभ मिलता है।
  6. लाल पीले रंग के फूल  वाले एलोवेरा के गूदे को स्प्रिट में मिला कर रख दे जब गल जाए इसे सर पर लेप करे तो गंजे सिर पर बाल उग आत़े हैं और बाल काले होने लगते हैं।
  7. एक चुटकी भूनकर पीसा हुआ हींग और कुछ एलोवेरा की जड़ को कुचल कर उबालकर छान लें और इसे पीने से पेट का दर्द ठीक हो जाता है।
  8. 20 ग्राम एलोवेरा के ताजे रस, 10 ग्राम शहद और आधे नींबू का रस मिलाकर दिन में 2 बार सुबह और शाम पीने से पेट के हर प्रकार के रोग ठीक हो जाते है।
  9. एलोवेरा का रस और गाय का घी छ, छ ग्राम, और 1 ,1 ग्राम सेंधा नमक व हरीतकी का चूर्ण इन सब को एक साथ मिलाकर सुबह-शाम सेवन करें या एलोवेरा के गूदे को गर्म करके पिने से पेट में गैस की शिकायत दूर होती है।
  10. एलोवेरा के गूदे का रस पेट पर लेप करने से आंतों में जमा कठोर मल ढीला होकर निकल जाएगा, कब्ज की समस्या दूर होगी और पेट के अन्दर की गांठे भी पिघल जाएगी तथा पेट दर्द भी ठीक हो जाएगा।
  11. एक चम्मच एलोव्व्रा के  रस में  2 चुटकी सोंठ का चूर्ण मिलाकर पीने से हिचकी बंद हो जाती है।
  12. कमर का दर्द 5 ग्राम एलोवेरा का रस 25 -25 ग्राम नागौरी असगंध व सोंठ में 2 लौंग मिलकर इन सबको पीस लें। सुबह 5 ग्राम चटनी का सेवन करें।
  13. या शहद और सोंठ का चूर्ण एलोवेरा के 15 ग्राम गूदे में मिलाकर सुबह-शाम नियमित सेवन करने से दर्द ठीक हो जाता है।
  14. या 10 ग्राम एलोवेरा के गूदे में 1 ग्राम शहद और सोंठ का चूर्ण मिलाकर सेवन करने से ठण्ड से हुआ कमर दर्द ठीक होता है।
  15. अथवा एलोवेरा का गूदा  मिला कर गेंहू के आटे को गूंथ कर रोटी बना ले इसमें गुड और घी मिला दें और लड्डू बना लें। इन लड्डुओं को खाने से कमर का दर्द ठीक हो जाता है।
  16. 100 ग्राम एलोवेरा के पत्तों और 10 ग्राम सेंधा नमक के चूर्ण को एक मिट्टी के बर्तन में डालकर, जब तक पकाए कि ये सब जलकर राख बन जाएं इस राख का1 ग्राम चूर्ण में 5 – 10 मुनक्का के साथ खाने से श्वास रोग में अधिक लाभ मिलता है।
  17. या एलोवेरा का 1/2 किलो गूदा लेकर किसी साफ कपड़े से छान लें इसे कलईदार बर्तन में डालकर धीमी आंच पर पकाएं, जब यह अध पका हो जाए तब इसमें 15 ग्राम लाहौरी नमक का बारीक चूर्ण मिला दें तथा चम्मच से अच्छी तरह से घोट दें। जब सब पानी जलकर चूर्ण शेष रह जाये तो इसे ठंडा करें और इसका चूर्ण बना कर सीसे के बर्तन में भर ले। 1/4 ग्राम चूर्ण शहद के साथ मिलाकर सेवन करने से पुरानी से पुरानी खांसी, काली खांसी और दमा ठीक हो जाता है।
  18. रोजाना सुबह-शाम 15 ग्राम एलोवेरा के गूददे का सेवन करने से गठिया रोग दूर हो जाता है।
  19. बराबर मात्रा में एलोवेरा का गूदा और गेहूं का आटा लेकर घी और चीनी मिलाकर हलुआ बना लें लगभग एक सप्ताह तक खाने से नपुंसकता दूर होती है।
  20. 10 ग्राम  एलोवेराका गूदा, 4 तुलसी के पत्ते और थोड़ी-सी सनाय के पत्ते  मिलाकर पिस लें और खाना खाने के बाद इसका सेवन करें  कब्ज की शिकायत खत्म हो जाती है।
  21. छोटे बच्चों की नाभि पर साबुन के साथ एलोवेरा के गूदे का लेप करने से दस्त साफ होते हैं और कब्ज की शिकायत दूर हो जाती है।
  22. हरड़ के साथ 15 ग्राम एलोवेरा के रस का सेवन करने से या 25 ग्राम एलोवेरा में एक चुटकी काला नमक मिलाकर सुबह और शाम खाली पेट खाने से कब्ज दूर रहती है।और पाचन क्रिया  भी दुरुश्त  हो जाती  है।
  23. सुबह-शाम 3 ग्राम एलोवेरा के रस में सेंधा व समुंद्री नमक मिलाकर सेवन करने से यकृत की बीमारी ठीक होती है या आधा चम्मच एलोवेरा के रस में 1 -1 चुटकी सेंधा नमक और हल्दी का चूर्ण तीनों को मिलाकर पानी के साथ सेवन करने से यकृत स्वस्थ और बढ़ा हुआ जिगर भी  ठीक हो जाता है।
  24. एलोवेरा का रस गर्म करके फोड़े-फुंसियों पर बांधे इससे या तो वह बैठ जाएगी या फिर पककर फूट जाएगी। एलोवेरा के गूदे में हल्दी मिलाकर घाव पर लगाए घाव भी जल्दी ही ठीक हो जाएगा।
  25. 25-30 मिलीलीटर ग्वारपाठे के जैल  में एक चुटकी  भुनी हींग के साथ सुबह शाम  सेवन करने से स्त्रियों के रोगों में आराम मिलता है ।
  26. एलोवेरा के गूदे में हल्दी का चूर्ण मिलाकर गर्म करें और पैरों के तलुवों में लेप कर के पट्टी बांध दें या सोते समय एलोवेरा के गूदे का रस आंखों मे डालने से आंखों का दर्द दूर होता है।
  27. एलोवेरा का गूदा आंखों के ऊपर लगाने से आंखों की लाली और गर्मी दूर होती है। आँखों के वायरल में भी इसका उपयोग लाभप्रद है।
  28. एलोवेरा के गूदे पर हल्दी मिलाकर थोड़ा गर्म करके आंखों में लगाने से आंखों का दर्द चला जाता है।
  29. पीलिया के रोग में एलोवेरा का 15-20 मिलीलीटर रस दिन में 2 से 3 बार पीने से आंखों का पीलापन और कब्ज की शिकायत दूर हो जाती है। एलोवेरा का रस रोगी की नाक में डालने से नाक से निकलने वाले पीले रंग का स्राव होना बंद हो जाता है।
  30. 5 ग्राम एलोवेरा गूदे को मट्ठा के साथ सेवन करने से तिल्ली का बढ़ना, जिगर का बढ़ना, पेट में गैस बनने के कारण दर्द, तथा अन्य पाचन संस्थान के रोगों के कारण होने वाला पीलिया भी ठीक हो जाता हैं।
  31. गूदा या रस निकले एलोवेरा के छिलके व समान मात्रा में नमक मिला कर मटकी में भर कर ढक्कन से मुहं को बंध करके कंडो की आग पर रख कर अन्दर के द्रव्य को जलकर भस्म होने दे ,इसे ठंडा करके शीशे के बर्तन में डालकर रख ले इस भस्म को 1 से 2  ग्राम दिन में दो बार रोगी को दे इससे पीलिया का रोग ठीक हो जाता है।
  32. भोजन में एलोवेरा की सब्जी खाने से हाथ-पैर नहीं फटते हैं। 5 ग्राम एलोवेरा का गूदा लगभग १/४ ग्राम से १/२ ग्राम गूडूची के रस के साथ सेवन करने से मधुमेह रोग में लाभ मिलता है।

मात्रा :-

  1. एलोवेरा का रस या जैल 25 से 30 मिलीमीटर तथा एलोवेरा की भष्म (चूर्ण) लगभग 1/4 से 1/2 ग्राम की मात्रा में लिया जा सकता है।

सावधानीयां:-

  1. एलोवेरा तोड़ने के तीन घंटे बाद सेही इस का रस या जैल औषधिये व पौष्टिकता के गुण खोने लगता है, इसलिए इसका इस्तेमाल निर्धारित समय में ही करना चाहिए।
  2. इसका डब्बा बंध जैल या जूस खोलने के बाद इसे फ्रिज में ही रखें ठीक से हिला कर इसका इस्तेमाल महीने डेढ़ महीने तक करना ही बेहतर रहता है।
  3. एलोवेरा का इस्तेमाल सुबह खाली पेट ले इसके पहले और बाद एक घंटे तक कुछ न लें।

हानिकारक प्रभाव:-

  1. स्किन एलर्जी से पीड़ित रोगी त्वचा पर जैल का इस्तेमाल न करें ।
  2. निर्धारित मात्रा 25 से 30 मी. ग्राम से अधिक मात्रा में सेवन न करें।
  3. गर्भावस्था में एलोवेरा का इस्तेमाल बिल्कुल न करें।
  4. प्रसूता स्त्रियों को स्तनपान के दौरान एलोवेरा का सेवन न करे।
  5. माहवारी के दिनों में एलोवेरा का इस्तेमाल न करे।
  6. दस्तो में एलोवेरा का इस्तेमाल न करे।

R K Rao

लौंग (Clove)
May 15th, 2011

 

आयुर्वेदिक गुणों का खजाना है लौंग।

भारतीय रसोई घर और मसाले तथा इनमे लौंग और लौंग की उपयोगिता को कोन नहीं जानता। लौंग को दादी नानी के नुस्को में एक विशेष स्थान प्राप्त है। लौंग का काढ़ा, चूर्ण और तेल सभी रूप का प्रयोग किया जाता है।
शोधकर्ताओं का कहना है कि भारतीय मसालों में लौंग सबसे अच्‍छा एंटी ऑक्‍सीडेंट का काम करता है। भोजन में प्राकृतिक एंटी ऑक्‍सीडेंट का इस्‍तेमाल करना स्‍वास्‍थ के लिए बेहतर है। यह कृत्रिम एंटी ऑक्‍सीडेंट से ज्‍यादा बेहतर है।
लौंग एंजाइम को बढ़ा देती है भूख बढ़ाती है और पाचन क्रिया को तेज भी करती है। लौंग काले और नीले रंग की होती है अक्सर काले रंग का लौंग मसाले के तोर पर तथा नीला लौंग तेल निकलकर चिकित्साके रूप में होता है।
रसोईघर में लौंग का इस्तेमाल गरम मसाले के तौर पर, मिठाईयों को सजाने के लिए, पीसकर रसदार सब्जियों में, आइसक्रीम एवं चाकलेट बनाने में वेनीला एसेन्स के तोर पर किया जाता है। औषधि के रूप में लौंग साबुत ,पीसकर तथा तेल के रूप में करते है ।
एंटीसेप्टिक गुणों के कारण यह चोट, घाव, खुजली और संक्रमण में कीटों के काटने या डंक मारने पर भी किया जाता है ।
लौंग में खनिज पदार्थ, कैल्शियम, कार्बोहाइड्रेट,प्रोटीन, फास्फोरस, लोहा, सोडियम, पोटेशियम, थायामाइन, नमी, प्रोटीन, वसा गैर-वाष्पशील ईथर वाष्पशील तेल राइबोफ्लेविन, नियासिन, हाइड्रोक्लोरिक एसिड में न घुलने वाली राख, विटामिन ‘ए’ और ‘सी’ पाए जाते हैं इसके अलावा कई तरह के औषधीय तत्व होते हैं।

औषधिय उपयोग :-

  1. मतली, हिचकी,पेट फूलना, अस्थमा, ब्रोंकाइटिस, गठिया, दांत दर्द, डायरिया, संक्रमण, के रूप में उपयोगी यह एंटीसेप्टिक; कीट नाशक, उत्तेजक, पुनःशक्ति दायक, शारीरिक गर्मीदायक, कामोद्दीपक टॉनिक भी है।
  2. लौंग को पीसकर शहद या मिश्री के साथ लेना अधिक लाभदायक होता है।
  3. लौंग को या तो चूर्ण के रूप में लिया जाता है या फिर उसका काढ़ा बनाया जाता है। अगर उल्टियाँ लगी हो तो लौंग के चूर्ण को भुन ले शहद के साथ मिलाकर लेने से उल्टियाँ ठीक हो जाती है।यह गर्भ ठहरने के दौरान उल्टी या मतली में लौंग का तेल उपयोगी होता है। चार लीटर पानी में पांच ग्राम लौंग को आधा होने तक उबाले। इस पानी को पीने से हेजा तुरंत काबू में आ जाता हैं। हैजे में प्यास और उलटी में लौंग का पानी बनाकर देते है इस से प्यास और उलटी कम होती है तथा पेशाब खुलकर आता है।
  4. लौंग को भुनकर चबाने से या लौंग को नमक के साथ चबाकर खाने से खांसी कफ गले दर्द में तुरन्त आराम मिलता है। लौंग कफ-पित्त नाशक होती है।
  5. लौंग का तेल सांस की बीमारीयों में खांसी, जुकाम, दमा, अस्थमा, तपेदिक, फेफड़े में सूजन में बहुत उपयोगी होता है।
  6. दमा के रोगी को 4-5 लौंग की कलियों को पीसकर एक कप पानी में उबाल कर इसका काढ़ा बना ले और शहद के साथ दिन में तीन बार पीएं। इससे जमी हुई कफ निकल जाएगी और दमा से राहत मिलेगी।
  7. लहसुन की एक कली को पीसे इसे शहद में के साथ मिलाएँ और 4-5 लौंग के तेल की बूँदें डालें, सोने से पहले इसे एक बार ले दमा सांस टी बी की तकलीफ भरी खांसी में काफी आराम मिलेगा।
  8. आंखों के पास या चेहरे पर निकली छोटी-छोटी फुंसियों पर लौंग घिस कर लगाने से फुंसियाँ और सूजन भी ठीक हो जाती हैं।
  9. लौंग और तिल के तेल को साथ मिलाकर कान में डालने से कान दर्द में राहत मिलती है।
  10. लौंग का तेल खून को साफ करके ब्लड शुगर को नियंत्रित करता है।
  11. त्वचा के किसी भी प्रकार के रोग में इसका चंदन बूरा के साथ मिलाकर लेप लगाने से फायदा मिलता है।
  12. दूध में नमक और लौंग मिला कर लेप करने से सिरदर्द ठीक होता है। नारियल तेल में लौंग के तेल की 8-10 बूंदें डाले इसमें एक चुटकी नमक मिलकर सिर पर मालिश करे जिससे सिर में ठंडक आती है और दर्द भी जाता रहता है।
  13. लौंग पाचन क्रिया को दुरुस्त रखता है। लौंग का तेल रक्त संचार सामान्य और शरीर का तापमान नियंत्रित रखता हैं।
  14. मांस पेशियों में ऐंठन हो तो प्रभावित क्षेत्र पर लौंग के तेल की मालिस करने से आराम मिलता है।
  15. लौंग के तेल को त्वचा पर लगाने से सर्दी, फ्लू और पैरों में होने वाल फंगल इन्फेक्शन और त्वचा के कीड़े भी नष्ट होते हैं।
  16. लौंग के तेल की मालिस अथवा लौंग को पीस कर माथे पर लगाये सिर दर्द तुरन्त ठीक होता है। 4-5 लौंग पीस कर एक कप पानी में मिला कर आधा पानी रहने तक गर्म करें। छान कर चीनी या शहद मिला कर सुबह और शाम पिलाएँ इससे सर का दर्द ठीक हो जाता है।
  17. आंत्र ज्वर में दो किलो पानी में पाँच लौंग आधा रहने तक उबालकर छानकर इस पानी को दिन में कई बार पिलाएँ।
  18. एक लौंग पीस कर गर्म पानी से फंकी लें। दो तीन बार लेने से ही बुखार उतर जाएगा। चार लौंग पाउडर पानी में घोल कर पिलाने में तेज बुखार भी कम हो जाता है।
  19. लौंग का तेल दांत में दर्द, मसूड़ों में दर्द और मुंह में अल्सर और सांसों की बदबू को दूर करने में रामबाण दवा है।
  20. एक गिलास पानी में चार-पाँच लौंग उबाल कर इस पानी से कुल्ला करे या लौंग पीस कर उसमें नीबू का रस मिलाये इसे दांतों पर मलने से दांतों का दर्द ख़त्म हो जाता है।
  21. दांत में कीड़ा है तो लौंग को कीड़े लगे दांतों पर रखना चाहिए या लौंग का तेल लगाना चाहिए, इससे दांत दर्द भी मिट जाता है। कटी जीभ पर लौंग को पीसकर रखने से कटी जीभ भी ठीक हो जाती है।
  22. मिसरी एवं लौंग को पीसकर खाने से जल्दी प्यास नहीं लगती लौंग को चूसने से खांसी में फायदा मिलता है।
  23. गले में दर्द हो तो कुछ लौंग की कलियों को पानी में उबालकर गरारा करने से गले की खराबी और पायरिया में लाभ मिलता है। गले की खराश में लौंग का चूसना असरकारक होता है।
  24. लौंग मानसिक दबाव और थकान को कम करता है। यह अनिद्रा और मानसिक बीमारियों जैसे याददाश्त और तनाव में उपयोगी होता है।
  25. लौंग की कलियों को सरसों के तेल में पकाकर मालिश करने से चोट में आराम मिलता है।
  26.  लौंग के तेल में की 8-10 बूँदे और नारियल का तेल सर में लगाकर मालिश करने से सिरदर्द ठीक हो जाता है।

सावधानियां-

  1. लौंग उष्ण प्रकृति का मसाला है, इसकी तासीर गर्म होती है। लौंग को जरूरत से अधिक नही खाना चाहिए। अधिक लौंग खाने से गुर्दे और आंतों को नुकसान पहुंच सकता है। बबूल का गोंद, लौंग के दोषों को दूर करने में मददगार है।
  2. इसे संवेदनशील त्वचा पर नहीं लगाना चाहिए।
  3. खरीदते वक्त झुर्रिया पड़ी लौंग न ख़रीदे यह लौंग तेल निकाली हुई होती है। जोकि अधिक उपयोगी नहीं होती।अच्छी लौंग में झुर्रियाँ नहीं होतीं।

P K Rao

त्रिफला से कायाकल्प
May 10th, 2011


त्रिफला से कायाकल्प

त्रिफला तीन श्रेष्ठ औषधियों हरड, बहेडा व आंवला के पिसे मिश्रण से बने चूर्ण को कहते है।जो की मानव-जाति को हमारी प्रकृति का एक अनमोल उपहार हैत्रिफला सर्व रोगनाशक रोग प्रतिरोधक और आरोग्य प्रदान करने वाली औषधि है। त्रिफला से कायाकल्प होता है त्रिफला एक श्रेष्ठ रसायन, एन्टिबायोटिक वऐन्टिसेप्टिक है इसे आयुर्वेद का पेन्सिलिन भी कहा जाता है। त्रिफला का प्रयोग शरीर में वात पित्त और कफ़ का संतुलन बनाए रखता है। यह रोज़मर्रा की आम बीमारियों के लिए बहुत प्रभावकारी औषधि है सिर के रोग, चर्म रोग, रक्त दोष, मूत्र रोग तथा पाचन संस्थान में तो यह रामबाण है। नेत्र ज्योति वर्धक, मल-शोधक,जठराग्नि-प्रदीपक, बुद्धि को कुशाग्र करने वाला व शरीर का शोधन करने वाला एक उच्च कोटि का रसायन है। आयुर्वेद की प्रसिद्ध औषधि त्रिफला पर भाभा एटोमिक रिसर्च सेंटर, ट्राम्‍बे,गुरू नानक देव विश्‍वविद्यालय, अमृतसर और जवाहर लाल नेहरू विश्‍वविद्यालय में रिसर्च करनें के पश्‍चात यह निष्‍कर्ष निकाला गया कि त्रिफला कैंसर के सेलों को बढ़नें से रोकता है।

हरड *
हरड को बहेड़ा का पर्याय माना गया है। हरड में लवण के अलावा पाँच रसों का समावेश होता है। हरड बुद्धि को बढाने वाली और हृदय को मजबूती देने वाली,पीलिया ,शोध ,मूत्राघात,दस्त, उलटी, कब्ज, संग्रहणी, प्रमेह, कामला, सिर और पेट के रोग, कर्णरोग, खांसी, प्लीहा, अर्श, वर्ण, शूल आदि का नाश करने वाली सिद्ध होती है। यह पेट में जाकर माँ की तरह से देख भाल और रक्षा करती है। भूनी हुई हरड के सेवन से पाचन तन्त्र मजबूत होता है। हरड को चबाकर खाने से अग्नि बढाती है। पीसकर सेवन करने से मल को बाहर निकालती है। जल में पका कर उपयोग से दस्त, नमक के साथ कफ, शक्कर के साथ पित्त, घी के साथ सेवन करने से वायु रोग नष्ट हो जाता है। हरड को वर्षा के दिनों में सेंधा नमक के साथ, सर्दी में बूरा के साथ, हेमंत में सौंठ के साथ, शिशिर में पीपल, बसंत में शहद और ग्रीष्म में गुड के साथ हरड का प्रयोग करना हितकारी होता है। भूनी हुई हरड के सेवन से पाचन तन्त्र मजबूत होता है। 200 ग्राम हरड पाउडर में 10-15 ग्राम सेंधा नमक मिलाकर रखे। पेट की गड़बडी लगे तो शाम को 5-6 ग्राम फांक लें । गैस, कब्ज़, शरीर टूटना, वायु-आम के सम्बन्ध से बनी बीमारियों में आराम होगा ।
त्रिफला बनाने के लिए तीन मुख्य घटक हरड, बहेड़ा व आंवला है इसे बनाने में अनुपात को लेकर अलग अलग ओषधि विशेषज्ञों की अलग अलग राय पाई गयी है 

बहेडा **
बहेडा वात,और कफ को शांत करता है। इसकी छाल प्रयोग में लायी जाती है। यह खाने में गरम है,लगाने में ठण्डा व रूखा है, सर्दी,प्यास,वात , खांसी व कफ को शांत करता है यह रक्त, रस, मांस ,केश, नेत्र-ज्योति और धातु वर्धक है। बहेडा मन्दाग्नि ,प्यास, वमन कृमी रोग नेत्र दोष और स्वर दोष को दूर करता है बहेडा न मिले तो छोटी हरड का प्रयोग करते है

आंवला ***
आंवला मधुर शीतल तथा रूखा है वात पित्त और कफ रोग को दूर करता है। इसलिए इसे त्रिदोषक भी कहा जाता है आंवला के अनगिनत फायदे हैं। नियमित आंवला खाते रहने से वृद्धावस्था जल्दी से नहीं आती।आंवले में विटामिन सी प्रचुर मात्रा में पाया जाता है,इसका विटामिन किसी सी रूप (कच्चा उबला या सुखा) में नष्ट नहीं होता, बल्कि सूखे आंवले में ताजे आंवले से ज्यादा विटामिन सी होता है। अम्लता का गुण होने के कारण इसे आँवला कहा गया है। चर्बी, पसीना, कपफ, गीलापन और पित्तरोग आदि को नष्ट कर देता है। खट्टी चीजों के सेवन से पित्त बढता है लेकिन आँवला और अनार पित्तनाशक है। आँवला रसायन अग्निवर्धक, रेचक, बुद्धिवर्धक, हृदय को बल देने वाला नेत्र ज्योति को बढाने वाला होता है।
कुछ विशेषज्ञों कि राय है की ———
  1. तीनो घटक (यानी के हरड, बहेड़ा व आंवला) सामान अनुपात में होने चाहिए।
  2. कुछ विशेषज्ञों कि राय है की यह अनुपात एक, दो तीन का होना चाहिए ।
  3. कुछ विशेषज्ञों कि राय में यह अनुपात एक, दो चार का होना उत्तम है
  4. और कुछ विशेषज्ञों के अनुसार यह अनुपात बीमारी की गंभीरता के अनुसार अलग-अलग मात्रा में होना चाहिए ।एक आम स्वस्थ व्यक्ति के लिए यह अनुपात एक, दो और तीन (हरड, बहेडा व आंवला) संतुलित और ज्यादा सुरक्षित है। जिसे सालों साल सुबह या शाम एक एक चम्मच पानी या दूध के साथ लिया जा सकता है। सुबह के वक्त त्रिफला लेना पोषक होता है जबकि शाम को यह रेचक (पेट साफ़ करने वाला) होता है।
1.शिशिर ऋतू में ( 14 जनवरी से 13 मार्च) 5 ग्राम त्रिफला को आठवां भाग छोटी पीपल का चूर्ण मिलाकर सेवन करें।
2.बसंत ऋतू में (14 मार्च से 13 मई) 5 ग्राम त्रिफला को बराबर का शहद मिलाकर सेवन करें।
3.ग्रीष्म ऋतू में (14 मई से 13 जुलाई ) 5 ग्राम त्रिफला को चोथा भाग गुड़ मिलाकर सेवन करें।
4.वर्षा ऋतू में (14 जुलाई से 13 सितम्बर) 5 ग्राम त्रिफला को छठा भाग सैंधा नमक मिलाकर सेवन करें।
5.शरद ऋतू में(14 सितम्बर से 13 नवम्बर) 5 ग्राम त्रिफला को चोथा भाग देशी खांड/शक्कर मिलाकर सेवन करें।
6.हेमंत ऋतू में (14 नवम्बर से 13 जनवरी) 5 ग्राम त्रिफला को छठा भाग सौंठ का चूर्ण मिलाकर सेवन करें।

  • ओषधि के रूप में त्रिफला

 

  1. रात को सोते वक्त 5 ग्राम (एक चम्मच भर) त्रिफला चुर्ण हल्के गर्म दूध अथवा गर्म पानी के साथ लेने से कब्ज दूर होता है।
  2. अथवा त्रिफला व ईसबगोल की भूसी दो चम्मच मिलाकर शाम को गुनगुने पानी से लें इससे कब्ज दूर होता है।
  3. इसके सेवन से नेत्रज्योति में आश्चर्यजनक वृद्धि होती है।
  4. सुबह पानी में 5 ग्राम त्रिफला चूर्ण साफ़ मिट्टी के बर्तन में भिगो कर रख दें, शाम को छानकर पी ले। शाम को उसी त्रिफला चूर्ण में पानी मिलाकर रखें, इसे सुबह पी लें। इस पानी से आँखें भी धो ले। मुँह के छाले व आँखों की जलन कुछ ही समय में ठीक हो जायेंगे।
  5. शाम को एक गिलास पानी में एक चम्मच त्रिफला भिगो दे सुबह मसल कर नितार कर इस जल से आँखों को धोने से नेत्रों की ज्योति बढती है।
  6. एक चम्मच बारीख त्रिफला चूर्ण, गाय का घी10 ग्राम व शहद 5 ग्राम एक साथ मिलाकर नियमित सेवन करने से आँखों का मोतियाबिंद, काँचबिंदु, द्रष्टि दोष आदि नेत्ररोग दूर होते है। और बुढ़ापे तक आँखों की रोशनी अचल रहती है।
  7. त्रिफला के चूर्ण को गौमूत्र के साथ लेने से अफारा, उदर शूल, प्लीहा वृद्धि आदि अनेकों तरह के पेट के रोग दूर हो जाते है।
  8. त्रिफला शरीर के आंतरिक अंगों की देखभाल कर सकता है, त्रिफला की तीनों जड़ीबूटियां आंतरिक सफाई को बढ़ावा देती हैं।
  9. चर्मरोगों में (दाद, खाज, खुजली, फोड़े-फुंसी आदि) सुबह-शाम 6 से 8 ग्राम त्रिफला चूर्ण लेना चाहिए।
  10. एक चम्मच त्रिफला को एक गिलास ताजा पानी मे दो- तीन घंटे के लिए भिगो दे, इस पानी को घूंट भर मुंह में थोड़ी देर के लिए डाल कर अच्छे से कई बार घुमाये और इसे निकाल दे। कभी कभार त्रिफला चूर्ण से मंजन भी करें इससे मुँह आने की बीमारी, मुहं के छाले ठीक होंगे, अरूचि मिटेगी और मुख की दुर्गन्ध भी दूर होगी ।
  11. त्रिफला, हल्दी, चिरायता, नीम के भीतर की छाल और गिलोय इन सबको मिला कर मिश्रण को आधा किलो पानी में जब तक पकाएँ कि पानी आधा रह जाए और इसे छानकर कुछ दिन तक सुबह शाम गुड या शक्कर के साथ सेवन करने से सिर दर्द कि समस्या दूर हो जाती है।
  12. त्रिफला एंटिसेप्टिक की तरह से भी काम करता है। इस का काढा बनाकर घाव धोने से घाव जल्दी भर जाते है।
  13. त्रिफला पाचन और भूख को बढ़ाने वाला और लाल रक्त कोशिकाओं की संख्या में वृद्धि करने वाला है।
  14. मोटापा कम करने के लिए त्रिफला के गुनगुने काढ़े में शहद मिलाकर ले।त्रिफला चूर्ण पानी में उबालकर, शहद मिलाकर पीने से चरबी कम होती है।
  15. त्रिफला का सेवन मूत्र-संबंधी सभी विकारों व मधुमेह में बहुत लाभकारी है। प्रमेह आदि में शहद के साथ त्रिफला लेने से अत्यंत लाभ होता है।
  16. त्रिफला की राख शहद में मिलाकर गरमी से हुए त्वचा के चकतों पर लगाने से राहत मिलती है।
  17. 5 ग्राम त्रिफला पानी के साथ लेने से जीर्ण ज्वर के रोग ठीक होते है।
  18. 5 ग्राम त्रिफला चूर्ण गोमूत्र या शहद के साथ एक माह तक लेने से कामला रोग मिट जाता है।
  19. टॉन्सिल्स के रोगी त्रिफला के पानी से बार-बार गरारे करवायें।
  20. त्रिफला दुर्बलता का नास करता है और स्मृति को बढाता है। दुर्बलता का नास करने के लिए हरड़, बहेडा, आँवला, घी और शक्कर मिला कर खाना चाहिए।
  21. त्रिफला, तिल का तेल और शहद समान मात्रा में मिलाकर इस मिश्रण कि 10 ग्राम मात्रा हर रोज गुनगुने पानी के साथ लेने से पेट, मासिक धर्म और दमे की तकलीफे दूर होती है इसे महीने भर लेने से शरीर का सुद्धिकरन हो जाता है और यदि 3 महीने तक नियमित सेवन करने से चेहरे पर कांती आ जाती है।
  22. त्रिफला, शहद और घृतकुमारी तीनो को मिला कर जो रसायन बनता है वह सप्त धातु पोषक होता है। त्रिफला रसायन कल्प त्रिदोषनाशक, इंद्रिय बलवर्धक विशेषकर नेत्रों के लिए हितकर, वृद्धावस्था को रोकने वाला व मेधाशक्ति बढ़ाने वाला है। दृष्टि दोष, रतौंधी (रात को दिखाई न देना), मोतियाबिंद, काँचबिंदु आदि नेत्ररोगों से रक्षा होती है और बाल काले, घने व मजबूत हो जाते हैं।
  23. डेढ़ माह तक इस रसायन का सेवन करने से स्मृति, बुद्धि, बल व वीर्य में वृद्धि होती है।
  24. दो माह तक सेवन करने से चश्मा भी उतर जाता है।
  25. विधिः 500 ग्राम त्रिफला चूर्ण, 500 ग्राम देसी गाय का घी व 250 ग्राम शुद्ध शहद मिलाकर शरदपूर्णिमा की रात को चाँदी के पात्र में पतले सफेद वस्त्र से ढँक कर रात भर चाँदनी में रखें। दूसरे दिन सुबह इस मिश्रण को काँच अथवा चीनी के पात्र में भर लें।
  26. सेवन-विधिः बड़े व्यक्ति10 ग्राम छोटे बच्चे 5 ग्राम मिश्रण सुबह-शाम गुनगुने पानी के साथ लें दिन में केवल एक बार सात्त्विक, सुपाच्य भोजन करें। इन दिनों में भोजन में सेंधा नमक का ही उपयोग करे। सुबह शाम गाय का दूध ले सकते हैं।सुपाच्य भोजन दूध दलिया लेना उत्तम है कल्प के दिनों में खट्टे, तले हुए, मिर्च-मसालेयुक्त व पचने में भारी पदार्थों का सेवन निषिद्ध है। 40 दिन तक मामरा बादाम का उपयोग विशेष लाभदायी होगा। कल्प के दिनों में नेत्रबिन्दु का प्रयोग अवश्य करें।
  27. मात्राः 4 से 5 ग्राम तक त्रिफला चूर्ण सुबह के वक्त लेना पोषक होता है जबकि शाम को यह रेचक (पेट साफ़ करने वाला) होता है। सुबह खाली पेट गुनगुने पानी के साथ इसका सेवन करें तथा एक घंटे बाद तक पानी के अलावा कुछ ना खाएं और इस नियम का पालन कठोरता से करें ।
  28. सावधानीः दूध व त्रिफला के सेवन के बीच में दो ढाई घंटे का अंतर हो और कमजोर व्यक्ति तथा गर्भवती स्त्री को बुखार में त्रिफला नहीं खाना चाहिए।
  29. घी और शहद कभी भी सामान मात्रा में नहीं लेना चाहिए यह खतरनाख जहर होता है ।
  30. त्रिफला चूर्णके सेवन के एक घंटे बाद तक चाय-दूध कोफ़ी आदि कुछ भी नहीं लेना चाहिये।
  31. त्रिफला चूर्ण हमेशा ताजा खरीद कर घर पर ही सीमित मात्रा में (जो लगभग तीन चार माह में समाप्त हो जाये ) पीसकर तैयार करें व सीलन से बचा कर रखे और इसका सेवन कर पुनः नया चूर्ण बना लें।
  • त्रिफला से कायाकल्प ***********

  1. कायाकल्प हेतु निम्बू लहसुन ,भिलावा,अदरक आदि भी है। लेकिन त्रिफला चूर्ण जितना निरापद और बढ़िया दूसरा कुछ नहीं है।
  2. आयुर्वेद के अनुसार त्रिफला के नियमित सेवन करने से कायाकल्प हो जाता है। मनुष्य अपने शरीर का कायाकल्प कर सालों साल तक निरोग रह सकता है, देखे कैसे ?
  3. एक वर्ष तक नियमित सेवन करने से शरीर चुस्त होता है।
  4. दो वर्ष तक नियमित सेवन करने से शरीर निरोगी हो जाता हैं।
  5. तीन वर्ष तक नियमित सेवन करने से नेत्र-ज्योति बढ जाती है।
  6. चार वर्ष तक नियमित सेवन करने से त्वचा कोमल व सुंदर हो जाती है ।
  7. पांच वर्ष तक नियमित सेवन करने से बुद्धि का विकास होकर कुशाग्र हो जाती है।
  8. छः वर्ष तक नियमित सेवन करने से शरीर शक्ति में पर्याप्त वृद्धि होती है।
  9. सात वर्ष तक नियमित सेवन करने से बाल फिर से सफ़ेद से काले हो जाते हैं।
  10. आठ वर्ष तक नियमित सेवन करने से वर्ध्दाव्स्था से पुन: योवन लोट आता है।
  11. नौ वर्ष तक नियमित सेवन करने से नेत्र-ज्योति कुशाग्र हो जाती है और शुक्ष्म से शुक्ष्म वस्तु भी आसानी से दिखाई देने लगती हैं।
  12. दस वर्ष तक नियमित सेवन करने से वाणी मधुर हो जाती है यानी गले में सरस्वती का वास हो जाता है।
  13. ग्यारह वर्ष तक नियमित सेवन करने से वचन सिद्धि प्राप्त हो जाती है अर्थात व्यक्ति जो भी बोले सत्य हो जाती है।
R K Rao
लहसुन(Garlic) और हमारा स्वास्थ
May 4th, 2011

  • लहसुन और स्वास्थ
  • लहसुन, प्याज के परिवार का एक कंद है लहसुन का प्रयोग भारतीय रसोईघर में सदियों से होता आया है लहसुन भारतीय रसोई में प्रयोग किया जाने वाला एक प्रमुख मसाला है।यह भोजन को रुचिकर और स्वास्थवर्धक बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसे तेल, अवलेह, भस्म, खोया बनाकर, लहसुन कल्प कर, खीर बनाकर, छोंक लगाकर, हरी या सूखी अवस्था में चटनी, अचार बनाकर काम में लिया जाता है। तथा दादी नानी के नुस्को में भी इसे विशेष दर्जा हासिल है। आधुनिक युग में भी इसकी महत्वता को नकारा नहीं जा सकता। प्रतिदिन लहसुन की एक कली के सेवन से शरीर को विटामिन ए, बी और सी के साथ आयोडीन, आयरन, पोटेशियम, कैल्शियम और मैग्नीशियम जैसे कई पोषक तत्व एक साथ मिल जाते हैं।
  • एक पायलट स्टडी से यह साबित हो गया है कि लहसुन में कैंसर से लड़ने की ताकत होती है, क्योंकि यह भोजन या प्रदूषण से शरीर में बनने वाले नाइट्रोसेमाइन के असर को कम करता है। एनालिटिकल बायोकेमिस्ट्री जर्नल में छपी रिपोर्ट के मुताबिक नाइट्रोसेमाइन का संबंध कैंसर से होता है। सब्जियों, पैकेज्ड फूड और इंडस्ट्री से निकलने वाले कचरे में नाइट्रेट की मात्रा होती है। करीब 20 पर्सेंट नाइट्रेट शरीर में जाकर नाइट्रोसेमाइन में बदल जाता है। विदेशों में भी इस बात की पुष्टि हो गई है कि लहसुन रक्तचाप को भी काबू में कर सकता है। म्यूनिख रिसर्च इंस्टीट्यूट के डॉ. स्ट्रीफोर्ड ने अपने गहन शोध निष्कर्ष में इसे खुदा की खास नियामत ठहराते हुए दिल, दिमाग और पूरे शरीर के लिए एक शक्तिशाली टॉनिक बताया है।
  • दो कलियां लहसुन की पीसकर एक गिलास दूध में उबल ले व ठंडा करके सुबह शाम कुछ दिन पिए हृदय के रोगों में आराम मिलता है।
  • लहसुन के नियमित सेवन पेट और भोजन की नली का कैंसर और स्तन कैंसर की सम्भावना को कम कर देताहै।
  • सेंट्रल फूड टेक्नोलॉजिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट द्वारा किए गए शोधों में यह पता चला है कि लहसुन और प्याज में मौजूद कुछ यौगिकों से अनाज से आयरन और जिंक ग्रहण करने की क्षमता सात गुना अधिक बढ़ जाती है।
  • लहसुन और प्याज सल्फर यौगिकों के मुख्य स्रोत हैं, जो कि भोजन से जिंक और आयरन को अधिक ग्रहण करने में सहायक हैं।यह वर्ध्दी 50 से 70 प्रतिशत होती है। यदि आप करी में लहसुन-प्याज का छोंक लगाते हैं तो वह स्वादिष्ट होने के साथ आपके लिए सेहतमंद भी होगी।
  • आम तोर पर लहसुन के बारे मेंलहसुन की लाभदायक जानकारी होने के बाद भी लोग लहसुन के गंध के कारण इसे खाने से परहेज करते हैं। लेकिन प्रकृति की इस अनमोल  देन को अच्छे स्वास्थ  और बिमारियों  से लड़ने की प्रतिरोधी क्षमता के लिए भोजन में शामिल करना, अंग्रेजी  दवाइयों से ज्यादा अच्छा होगा। चमत्कारिक गुणों वाली कई औषधियों का रोजाना इस्तेमाल हमारी रसोई  से ही  होता है।
  • कच्चे लहसुन में अल्लीसिन नमक तत्व होता है,यह वायरस को नष्ट कर देता है इस अल्लीसिन ( Allicin ) तत्व से  23 प्रकार के बैक्टीरिया को समाप्त करने में सफलता मिली है लहसुन भी छोटी चेचक, खसरा, कण्ठमाला का रोग, स्कार्लेट ज्वर और अन्य वायरल संक्रमण को नष्ट कर देता है।
  • हर रोज के लिये आप लहसुन को पीसकर दही में मिलाकर खाये तो आपके मुंह से बदबू नहीं आयेगी। या जरा सा गुड़ और सूखा धनिया मिलाकर मुंह में डालकर चूसें कुछ देर में ही मुंहू से दुर्गन्ध नहीं आयेगी। अपने स्वास्थ को ध्यान में रखते हुऐ लहसुन जरूर खायें। साग सब्जी में लहसुन का तड़का लगाने से भी इसके गुण नष्ट नहीं होते।
  • नियमित लहसुन खाने से ब्लडप्रेशर नियमित होता है। एसिडिटी और गैस्टिक ट्रबल में इसका प्रयोग फायदेमंद होता है। दिल की बीमारियों के साथ यह तनाव को भी नियंत्रित करती है।
  • हर रोज नियमित रूप से लहसुन की पाँच कलियाँ खाई जाएँ तो हृदय संबंधी रोगों की संभावना में कमी आती है। कोलेस्ट्रॉल के स्तर में भी  कमी आती है। खून भी साफ होता है और शरीर के अंदरूनी सिस्टम की सफाई भी होती है।
  • वैज्ञानिकों ने बताया कि लहसुन शरीर में नाइट्रिक ऑक्साइड और हाइड्रोजन सल्फाइड बनने की प्रक्रिया को तेज करता है। ये रसायन रक्त संचार को नियमित करता है जिससे ब्लड प्रेशर नियंत्रित रहता है।
  • विषैले कीड़ों के काटने से होने वाली जलन को कम करने के लिए लहसुन को पीसकर त्वचा पर लेप करे।
  • बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए लहसुन को पीसकर  दूध में उबालकर पिलाये। लहसुन की कलियों को तव्वे पर  भून कर बच्चों  को खिलाने से बच्चो की साँस की तकलीफ को दूर किया जा सकता है।
  • गठिया और अन्य जोड़ों के रोग में भी लहसुन का सेवन बहुत ही उपयोगी होता है।
  • फ्लू  से लेकर कैंसर जैसी बड़ी बीमारी के इलाज में भी लहसुन सहायक होता है।लहसुन के सेवन से पेट का कैंसर नहीं होता
  • लहसुन में एंटीऑक्सिडेंट के भरपूर गुण होते हैं कैंसर के इलाज में लहसुन का बड़ा महत्व है। चिकित्सीय शोध बताते हैं कि लहसुन का नियमित सेवन करने वाले लोगों को कैंसर होने की संभावनाएं काफी कम हो जाती है।
  • लहसुन कीटाणुनाशक है। लहसुन का नियमित सेवन करने वालों को तपेदिक यानी टीबी रोग नहीं होता।
  • एंटीबायोटिक गुणों के कारण लहसुन से टी बी के कीटाणु भी नष्ट हो जाते हैं। इसके लिए भोजन करने  के आधा घंटे बाद एक मनुक्का और एक लहसुन की  कली को मुँह में रख कर धीरे-धीरे अच्छी तरह से चबाएँ और ऊपर से पानी पी लें।
  • मुँहासे के लिए लहसुन की दो कलियों  को  और एक छोटा चम्मच हल्दी पाउडर मिला कर क्रीम बना ले इसे  मुहासों पर और चेहरे पर लगाये।
  • वायरस और बैक्टीरिया से बचने के लिए ताजा लहसुन खाना अधिक फायदेमंद होता है। इसके एंटीबैक्टीरियल गुण इन्फेक्शन से लड़ने में मदद करते हैं। इन्फ्लूएंजा में एक-एक लहसुन का रस पानी में मिलाकर दिन में दो तीन बार रोगी को  दें।
  • मलेरिया के रोगी को भोजन से पहले तिल के तेल में भुना लहसुन खिलाना चाहिए।
  • लहसुन का इस्तेमाल एंटीसेप्टिक के रूप में भी किया जा सकता है।
  • हृदय संबंधी विकारों को कम करने के लिए लहसुन को भोजन में शामिल करना जरूरी माना जाता है।
  • यदि रोगी कच्चे लहसुन की कलियां खा सके तो पानी के साथ इसका सेवन करना चाहिए। इस प्रयोग से रक्त में कोलेस्ट्रॉल का स्तर नियंत्रित होता है। हृदय संबंधी विकारों को कम करने के लिए लहसुन को भोजन में शामिल करना जरूरी माना जाता है।
  • वैज्ञानिकों ने भी इस तथ्य की पुष्टि की है कि लगातार चार हफ्ते तक लहसुन खाने से कॉलेस्ट्रोल का स्तर 12 प्रतिशत तक या उससे भी कम हो सकता है।
  • लहसुन में पाया जाने वाला सल्फाइड्स रक्तचाप को कम करने में मदद करता है। वे सल्फाइड्स लहसुन को पकाने के दौरान भी नष्ट नहीं होते हैं। यानी सब्जी, दाल में जब आप लहसुन का छौंक लगाती हैं, तब भी उसका ये गुण नष्ट नहीं होता।
  • दाँत का दर्द होने पर या मसूढ़े फूलने पर लहसुन को पीसकर उसकी धीरे-धीरे मालिश करनी चाहिए इससे दांत दर्द से रहत मिलेगी ।
  • ठंड के मौसम में होने वाले सर्दी, जुकाम और कफ बनने की समस्या से राहत पाने के लिए नियमित रूप से लहसुन का सेवन करना जरूरी है। ठंड के शुरुआत में लहसुन की दो कलियों  को कुचल कर एक लौंग मिला कर खाने से ठंड से बचाव होता है।
  • खांसी के इलाज के लिए लहसुन अचूक औषधि है,कुक्कर खांसी के होने पर 20 – 25 बूंदें लहसुन का रस अनार के जूस में मिलाकर पिएं। इससे शीघ्र लाभ होता है। लहसुन का तेल सवेरे निराहार पानी के साथ पीने से पुरानी से पुरानी खाँसी में  फायदा होता है।
  • अदरक, नींबू, नमक, जीरा, सौंफ, अनारदाना, लहसुन की चटनी पीसकर खाँसी, दमा, कफजन्य रोगों से ग्रस्त को चटाना चाहिए। इससे बलगम  भी निकल जाता है।
  • अल्सर में भी लहसुन के उपयोग से फायदा होता है। लहसुन खाने से भूख भी अच्छी लगती है।
  • लहसुन डायबिटीज के लिए भी गुणकारी साबित हुआ है, रक्त में शक्कर के स्तर को नियमित करता है। मधुमेह के रोगियों को प्रातः निराहार ही त्रिफला और 20 -25 ग्राम लहसुन का रस कुछ दिन तक लगातार लेना चाहिए।
  • दस्तो  में 10 ग्राम लहसुन का रस मट्ठे में मिलाकर सुबह, दोपहर, शाम कुछ दिनों तक लें। रस हर बार ताजा निकालें। निश्चित रूप से लाभ होगा।
  • जी मचलने पर लहसुन की एक दो कलीयाँ चबाये रोगी को आराम मिलेगा।
  • पक्षाघात यानि के लकवा में माँसपेशियों के पुनः सक्रिय करने में लहसुन के ताजा रस की मालिश करने से प्रभावित माँसपेशियों पुनः सक्रिय होने लगती है। इसके साथ साथ लहसुन को पीस कर चटनी बना ले और इसमें बराबर मात्रा में मख्खन मिला कर पक्षाघात के रोगी को सुबह शाम खाने को देने से पक्षाघात के रोगी को निश्चित तोर पर धीरे-धीरे लाभ होगा।
  • सरसों या तिल के तेल में लहसुन का रस मिलाकर थोड़ा गरम करके इसे प्रभावित हिस्से पर लगा कर हल्के हलके मालिश करें, इससे पक्षाघात में काफी फायदा होता है और रक्त संचार नियमित होता है।
  • “डेलीमेल डॉट को डॉट यूके” पर प्रकाशित जानकारी के अनुसार लहसुन परिवार (लहसुन और प्याज ) की सब्जियों का अधिक सेवन करने वाली महिलाओं में कमर में ऑस्टियोआर्थराइटिस की आशंका कम होती है और गठिया का खतरा कम हो सकता है।
  • सावधानी :- गठिया के रोगी लाल सब्जियां न खाएं।
  • मधुमेह के स्तर को काबू में रखने के लिए और शरीर को दरुस्त व छरहरा रखने के लिए भोजन में शतावरी, वज्रांगी और लहसुन को शामिल करना चाहिए।
  • शोधकर्ताओं ने पाया है कि लहसुन, शतावरी और वज्रांगी में प्रचुर मात्रा में काबरेहाइड्रेट होता है जिसका सेवन करने से भूख नियमित हो जाती है और इसके प्रयोग से मानव शरीर में मधुमेह के स्तर को नियंत्रित करने में  मदद मिलती है।
  • साँप तथा बिच्छू के जहर को उतारने के लिए काटे जाने वाले स्थान पर लहसुन को  पीसकर इसका  लेप जहर से पूरे प्रभावित हिस्से पर लगाएँ और पट्टी बाँध दे जहर उतर जाएगा। बिच्छू के काटने वाले  स्थान पर लहसुन और अमचूर पीसकर लगाए जहर उतर जाएगा।
  • पेशाब रुकने पर पेट के निचले भाग में लहसुन की पुल्टिस बाँधने से मूत्राशय की निषक्रियता दूर होती है।
  • लहसुन से गैस्टिक एवं अपच की शिकायत दूर होती है. पाचन शक्ति अच्छी रहती है. यह अंतड़ियों में रुकी हवा निकाल देता है।
  • शरीर में कैलि्शयम की कमी की भरपाई भी लहसुन के नियमित सेवन से होता है। कृमि नष्ट होते हैं। शरीर में गर्मी, चेहरे पर चमक रहती हैं।
  • लहसुन का लेप दमा, गठिया, सियाटिका चर्म रोगों तथा कुष्ठ में करते हैं। लहसुन उत्तेजक और चर्मदाहक होता है। चर्मरोग व  दाद, खुजली में लहसुन के तेल का लेप आराम देता है।
  • सावधानी :-एलर्जी महसूस करने वाले इसे ना खाएं और न ही त्वचा पर लगाएं।
  • लहसुन खाने से नपुंसकता रोग में लाभ मिलता है। यह रक्त, ताक़त और वीर्य बढ़ाने वाला है।
  • लगभग 50 ग्राम सरसों के तेल में लहसुन की चार कलियाँ डाल दें। उसमें 3 ग्राम अजवाइन डालकर धीमी-धीमी आँच पर पकाएँ। लहसुन और अजवाइन काली हो जाने पर  तेल उतारकर छान लें। इस गुनगुने तेल की मालिश बदन पर करें , हर प्रकार का बदन  दर्द और  जोड़ों के दर्द में भी इस तेल की मालिश से लाफ होगा।
  • बाह्य प्रयोगों में यह कड़ी गाँठ को भी गला देता है लहसुन की पुल्टिस को किसी भी सूजे भाग पर बाँधने या ताजा रस रगड़ने से सूजन मिटती है।
  • प्रतिदिन लहसुन की एक कली के सेवन से शरीर को विटामिन ए, बी और सी के साथ आयोडीन, आयरन, पोटेशियम, कैल्शियम और मैग्नीशियम जैसे कई पोषक तत्व एक साथ मिल जाते हैं। इसके प्रतिदिन नियमित प्रयोग से आंखों की रोशनी के लिए भी कारगर माना जाता है।
  • पैरों में  गांठे (कोर्नस) होने पर जैतून के तेल और लहसुन के रस को समान मात्रा में मिला कर कोर्नस (काल्लुसेस) पर मालिश करने से कोर्नस में आराम मिलेगा।
  • लहसुन बादी कम करने वाला होता है, इसीलिए बैंगन गोभी और उड़द की दाल में डालने की सलाह दी जाती है।
  • गला बैठ रहा हो तो गुनगुने  पानी में लहसुन का रस मिलाकर गरारे करें, गला ठीक होगा।
  • कान दर्द  में लहसुन और अदरक बराबर मात्रा में लेकर इसे अच्छी तरह से पीस ले और कपड़े से छान लें।इसे गुनगुना गर्म करके  कान में डालें,कान दर्द में आराम आएगा।
  • लहसुन को तिल्ली के तेल में पका कर ठंडा होने पर कान के दर्द में इस्तेमाल करें, तुरंत असर होगा।
  • लहसुन दमा के इलाज में काफी कारगर साबित होता है। लहसुन के रस को गर्म पानी के साथ लेने से श्वास, दमा में आराम मिलता है। 30 मिली दूध में लहसुन की पाँच कलियाँ उबालें और इस मिश्रण का हर रोज सेवन करने से दमे के शुरुआती दोर में काफी फायदा मिलता है। अदरक की गरम चाय में लहसुन की दो पिसी कलियाँ मिलाकर पीने से भी अस्थमा नियंत्रित रहता है। सुबह शाम इस चाय का सेवन करने से रोग में फायदा होता है।
  • किसानो के लिए :-अगर दूध देने वाली गाय-भैंसों के चारे में लहसुन मिला दिया जाए तो वे ज्यादा दूध देती हैं ।
  • सावधानियां:-
  • बेशक लहसुन कुदरती खूबियों से भरपूर है। लेकिन इसे उचित मात्रा में ही लेना चाहिए। इसके इस्तेमाल में कुछ सावधानियाँ भी रखें।
  • लहसुन की तासीर काफी गर्म और खुश्क होती है कुछ लोगों को यह रास नहीं आता। खासकर गर्मी के मौसम में पित्त प्रधान प्रकृति वाले इसका इस्तेमाल संतुलित ही करें।
  • अगर लहसुन का कुछ दुष्प्रभाव महसूस हो तो मरीज को गोंद कतीरा, धनिया, बादाम-रोगन, नींबू, पुदीना देते रहने से उसका दुष्प्रभाव कम  हो जाता है।
  • घी में भून लेने से भी यह दोष रहित होती है। बीमारी की हालत में किसी विशेषग्य की सलाह ले इसकी मात्रा एवं परहेज पर विशेष ध्यान रखें।
  • लहसुन का प्रयोग सर्दियों में अधिक किया जाता है. गर्मी के मौसम में अधिक लहसुन खाने हाजमा खराब हो सकता है, गर्मी के मौसम में लहसुन का सेवन सीमित मात्रा में करना ही लाभदायक होता है।
  • जंगली लहसुन आंतों को हानि पहुंचा सकती है। इसमें मौजूद सल्फर से एलर्जी महसूस करने वाले इसे न ही खाएं और न ही त्वचा पर लगाएं।
  • एलर्जी महसूस करने वाले इसे ना खाएं और न ही त्वचा पर लगाएं।
  • गठिया के रोगी लाल सब्जियां न खाएं।

R K Rao  

चूना पत्थर ( Limestone)
May 2nd, 2011
  • चूना पत्थर ( Limestone)
  • चूना(कैल्शियम कार्बोनेट) एक भौतिक तत्व है कैल्शियम स्वास्थ पोषण के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण तत्व है यह शरीर के लिए अत्यंत आवश्यक घटक होता है। भोजन में यह पर्याप्त मात्रा में होना चाहिए। कैल्शियम हृदय, नसों, मांसपेशियों में भी मदद करता है, यह शरीर के विकास मजबूत हड्डियों और दांतों, के रखरखाव के लिए आवश्यक है.यह शरीर के अन्य प्रणालियों के ठीक से काम करने  के लिए आवश्यक हैं. इसे अच्छा ऑस्टियोपोरोसिस ( हड्डी का एक रोग है जिससे फ़्रैक्चर का ख़तरा बढ़ जाता है) के खतरे  को रोकने के लिए जाना जाता है यह मांसपेशियों के सामान्य संकुचन के लिए हृदय की गति को नियमित करता है। कैल्शियम जीवन-शक्ति और सहनशीलता बढाता है कोलेस्ट्रांल को नियमित करता है यह रक्त की क्लॉटिंग करता है,जिससे यह घावों को शीघ्र भरता है। 45 साल से अधिक उम्र की स्त्रियों, गर्भवती महिलाओं, 50 साल से अधिक उम्र के पुरुषों, धूम्रपान करने वालों और अधिक शराब पीने वालों को कैल्शियम की कमी का खतरा रहता है। बच्चों में सूखा रोग कैल्शियम की कमी के मुख्य  लक्षण है। 15 साल से कम उम्र के बच्चो के लिए कैल्शियम की कमी शरीर के लिए काफी खतरनाख साबित हो सकती है। कैल्शियम की कमी से बच्चो के शारीरिक मानसिक  विकास ठीक से नहीं हो पाता और वो कुपोसण का शिकार हो सकते है। विटामिन डी विटामिन सी कैल्शियम का उचित अवशोषण के लिए अत्यंत आवश्यक घटक है 45-50 साल से अधिक उम्र के व्यक्तियों, गर्भवती महिलाओं,10 से 20 साल के बच्चो को अतिरिक्त कैल्शियम लेना चाहिए। कैल्शियम चूना पत्थर में काफी अधिक मात्रा में पाया जाता है। दूध, दाले, फ़लियां, हरी व पत्तीदार सब्जियां,नीबू, मूंगफ़ली, सिंघाडा, सूरजमुखी के बीजों में भी पर्याप्त मात्रा में कैल्शियम पाया जाता है। चूना या चूने का पानी (लाइम वाटर) या कल्शियम की गोलियों की अपेक्षा प्राकृतिक कल्शियम ( फल साग सब्जियों दूध आदि से मिलने वाला ) ज्यादा सुरक्षित है कियोंकि चूना या  लाइम वाटर यानि चूने के पानी या कल्शियम की गोलियों से गुर्दे की पथरी होने का डर 80-85 % अधिक पाई गयी है।
  1. चूना पत्थर( कैल्शियम कार्बोनेट) एक ओषधि भी है। चूना या चूने का पानी लगभग 60 से 70 बीमारियों को ठीक करने के काम में आता है।
  2. चूना (गेंहू के दाने के सामान) या चूने का पानी (20 से 25 मिली ग्राम) हर रोज दाल में ,दही में गन्ने के रस में,मौसमी के रस में, संतरे के रस में,अनार के रस में मिलाकर खाया जा सकता है।
  3. चूने का पानी बनाने का तरीका
  4. एक  लिटर  पानी में  50 ग्राम चूने के पत्थर को किसी मिटटी के बर्तन में रात को भिगोकर रख दें। दो दिन रखने के बाद इस  बीच  दो तिन बार  इसे साफ लकड़ी की चम्मच से हिलाते रहे सुबह इस पानी को निथार कर शीशे के बर्तन में डाल ले निथारते वक्त ध्यान रहे की पहले इस के ऊपर बनी परत को सावधानी से बिना हिले निकल दे व नीचे जमा चूना भी न घुले और इसे साफ़ कपडे से छान ले चूने का पानी तैयार है।
  5. उम्र के अनुसार इस पानी को 4 गुना ताजा पानी मिलाकर सुबह शाम  पीने से 6-7 दिनों में ही बच्चो की दूध सम्बन्धी परेशानिया ( दूध उलटना, उबकाई आदि ) दूर होती हैं और उल्टी, दस्त, खट्टी डकारें,भी ठीक हो जाती है।
  6. जिन बच्चों को अपनी लम्बाई बढ़ानी हो तो दही, जूस  या दाल आदि  में हर रोज सुबह गेंहू के दाने के सामान चूना मिलाकर  ले इससे लम्बाई बढ़ती है , शरीर की  ताकत बढ़ती है , खून की कमी दूर होती है  , बुद्धि कुशाग्र होती है, याददास्त मजबूत होती है, कमजोर आँखों की द्रष्टि बढती है  और बच्चा सुन्दर  और मेघावी होता है। और शरीर की  हर तरह की गांठे पिंघल जाती है तथा बदन  का दर्द दूर हो जाता है ।
  7. गर्मी के कारण होने वाला सिर का दर्द शुद्ध घी में खाने का चूना मिलाकर सिर पर लेप करने से  ठीक हो जाता है।
  8. अथवा चूना और नौसादर को बारीक करके शीशी में भरकर डॉट लगाकर रख दें। सिर में दर्द होने पर इस शीशी की डॉट को खोलकर मिश्रण रोगी को एक बार ही सुंघाए, ऐसा करने से सिर दर्द खत्म हो जाता है।
  9. सावधानी :- एक बार सुंघाने के तुरन्त बाद ही रोगी की नाक के पास से शीशी को दूर हटा लें।
  10. वायु रोग के लिए 3 ग्राम चूना  गुड़ में मिला कर खाने से गैस को निकल बहार करता है और वायु का बनना ही खत्म हो जाता है।
  11. बवासीर के रोग में बराबर मात्रा में चूना, शंखिया और तूतिया को एक साथ पीसकर मस्सों पर लगाने से मस्से सूख जाते हैं और  आराम आता है।
  12. चूना और शहद को एक साथ मिलाकर टयूमर पर बांधने से फोड़े  में आराम मिलता है।
  13. या चूना और अण्डे की सफेदी मिलाकर टयूमर पर बांधने से लाभ मिलता है।लगभग आधा कप चूने के पानी में आधा मिली ग्राम कपूर का रस मिलाकर सिफलिस की फुंसियों पर लगाने से फुंसिया ठीक होती है।
  14. रोगी की उम्र के हिसाब से 10 से 25 मिली लीटर पानी को रोजाना 2- 3 बार पीने से शारीरिक कमजोरी दूर होती है। हड्डियाँ मजबूत होती है और अम्लपित्त व बदहजमी भी दूर होती है।
  15. पीलिया होने पर रोगी को गन्ने के रस के साथ लगभग गेंहू के दाने के बराबर चूना मिला कर या चूने के पानी के साथ मिला कर पिलाने से रोगी बहुत जल्दी ठीक होता है।
  16. चूना नपुसंगता की बहुत अच्छी दवा है जिस स्त्री या पुरुष को अंडा व शुक्राणु नहीं बनते उसे  हर रोज गन्ने के रस के साथ चूना खिलाइए साल डेढ़ साल में भरपूर मात्रा में स्त्री को अंडे व पुरुष को शुक्राणु बनने लगेंगे  जोड़ों के  दर्द में  हल्दी, चूना और गुड़ का पेस्ट  बनाकर  मालिश करने से कलाई और जोड़ों का दर्द मिट जाता है।
  17. जिस माता को गर्भाशय या स्तन पर अथवा शरीर पर कही पर भी गांठे हो गयी हो तो वो माताए चूना अवश्य खाए चूना खाने से सभी प्रकार की गांठे ठीक हो जाती है।
  18. दूध में  चूने का पानी मिलाकर पीने से गर्भवती स्त्री की बुखार के समय की उल्टी बंद हो जाती है।कान से मवाद बहता है तो सम मात्रा में दुध और चूने का पानी मिलाकर कान में डाले मवाद बहना बंद हो जाता है।
  19. स्त्रिओं की माहवारी सम्बन्धी सभी शिकायते चूना खाने से ठीक होती है 45-50 वर्ष की उम्र के बाद चूना अवश्य खाए
  20. गर्भावस्था में माताएं चूना अवश्य खाएं गर्भावस्था में चूना खाने से होने वाली संतान ह्रष्ट पुष्ट होगी बुद्धिमान होगी सुंदर सुडोल और मेघावी होगी
  21. गर्भवती स्त्री को चूना अनार के रस में खिलाना अधिक उपयोगी होता है
  22. चूने में कैल्शियम का भण्डार  होता है जो की जच्चा और बच्चा दोनों  के लिए  ही अत्यंत आवश्यक होता है।
  23. चूने का पानी और नारियल का तेल समान मात्रा में  मिलाकर खूब फेंटे। जब यह अच्छे से आपस में मिल जाये  इसे जले स्थान पर लगाइए
  24. या चूने का  पानी और  बराबर  अलसी का तेल मिलाकर अच्छी तरह साफ कपड़े पर लगा लें। कपड़े को जले हुए भाग पर रखकर बांध दें जलन और दर्द मिट कर घाव भी जल्द ही भर जाते हैं।
  25. या चूने के पानी और तिल्ली के तेल को कांसे की थाली में रगड़ कर साफ़ रूई से शरीर के जले हुए भाग पर दिन में कम से कम तिन बार लगाइए अधिक जला हुआ व्यक्ति भी ठीक हो जाता है और शरीर पर जलने के दाग भी नहीं रहते।
  26. पुराने चूने को तेल या घी में मिलाकर लेप करने से या फोड़ों पर चूने के पानी में भिगा हुआ कपड़ा रखने से फोड़े-फुंसी की सूजन खत्म होती है और फोड़े-फुंसियां ठीक हो जाते हैं।
  27. पान के डण्ठल पर चूना लगाकर मस्से या तिल की जड़ पर लगाने से 5-7 दिन में ही मस्सा या तिल बिल्कुल साफ हो जाता है।
  28. सफेद दाग होने पर सम मात्रा में चूना और हरताल को एक साथ पीसकर नींबू के रस में मिलाकर सफेद दागों पर लगाने से 2 से 3 महीनो में ही लाभ होता है।
  29. सामान मात्रा में  चूना और हल्दी को मिला ले गुमचोट पर लगाने से सूजन उतर कर  व चोट भी ठीक हो जाती है और टीका लगी हुई जगह पर लेप करने से टीके का दर्द ठीक हो कर  सुजन भी उतर जाती  है।
  30. दाद के लिए  पुराना चूना और तिल्ली के तेल को मिलाकर दाद पर लगाने से दाद ठीक हो जाता है।20 से 25 मिली लीटर चूने का पानी रोगी को पिलाने से नाक की नकसीरी (नाक से खून बहना) बन्द हो जाती  है।
  31. राष्ट्रीय पोषक डाटाबेस (USDA) की सिफारिश के अनुसार कैल्शियम की मात्रा कितनी होनी चाहिए जिसे उम्र के अनुसार इस तालिका से जाना जा सकता है ।
  32. कैल्शियम की मात्रा भोजन या किसी दुसरे स्त्रोत के जरिये मनुष्य द्वारा ली जाने वाली मात्रा उम्र के अनुसार (मिलीग्राम प्रति दिन)——
  33. जन्म से 6 महीने तक की उम्र में 210 मिलीग्राम / दिन 7 महीने से 12 महीनों तक की उम्र में 270 मिलीग्राम / दिन 1 साल 3 साल तक की उम्र में 500 मिलीग्राम / दिन 4 साल 8 साल तक की उम्र में 800 मिलीग्राम / दिन9 साल 18 साल तक की उम्र  में 1300 मिलीग्राम / दिन 19 साल से 50 साल तक 1000 मिलीग्राम / दिन और 51 साल और इसके उपर 1200 मिलीग्राम प्रति दिन  होनी चाहिए ।
  • कैल्शियम और सावधानी :-
  • चूना या चूने का पानी (लाइम वाटर) या कल्शियम की गोलियों की अपेक्षा प्राकृतिक कल्शियम ( फल साग सब्जियों दूध आदि से मिलने वाला ) ज्यादा    सुरक्षित है कियोंकि चूना या  लाइम वाटर यानि चूने के पानी या कल्शियम की गोलियों से गुर्दे की पथरी होने का डर 80-85 % अधिक पाई गयी है।

R K Rao 

मेथी दाना(Fenugreek)
April 24th, 2011

औषधि के रूप में बहुत उपयोगी है मेथी

  • मेथी के गुण :
  • मेथी की सब्जी  खाने से खून शुद्ध होता है क्योंकि इसमें सभी जरूरी पोषक तत्व उपस्थित होते हैं जो की एनीमिया को रोकने में सहायक होता है। मेथी के छोटे और पीले दाने सख्त और स्वाद में कसैले जरूर होते हैं लेकिन स्वास्थ्य के लिए अमृत से कम नहीं हैं।
  • मेथी में प्रोटीन ,वसा,कार्बोहाईड्रेट ,कैल्शियम,फास्फोरस तथा लोहा प्रचुर मात्रा  में पाया जाता है.यह भूख जाग्रत करने वाली है.इसके लगातार सेवन से पित्त,वात,कफ और बुखार की शिकायत भी दूर होती है. मेथी के बीजों में मुख्य तौर से वाष्पशील व स्थिर तेल, प्रोटीन, सेल्यूलोज, स्टार्च, शर्करा, म्यूसिलेज, खनिज पदार्थ, एल्कोलायड व विटामिन पाये जाते हैं। मेथी  में पानी , रेशे , वसा , लोहा तथा अल्प मात्रा में कैल्शियम, मैग्नीशियम, पोटाशियम, सोडियम, जस्ता सहित तत्वों ,फास्फोरस खनिज लोहा,तांबा, मैंगनीज, फोलिक एसिड,  राइबोफ्लेविन, नियासिन, और फाइबर, कफ के रूप में और विटामिन ए, बी, सी भी पाए जाते हैं। मेथी में फास्फोरिक एसिड, कोलाइन और ट्राइगोनेलिन एल्केलाइड्स, गोंद, लेसीथिन, स्थिर तेल, एलब्युमिन प्रोटीन, पीले रंग के रंजक तत्व पाए जाते हैं।
  • मेथी के सेवन से वायु (गैस), कफ (बलगम) और ज्वर (बुखार) दूर होता है।  वात रोग (जोड़ों के दर्द), में मेथी का पाउडर मट्ठा के साथ पीने से लाभ मिलता है
  • सवेरे मैथी दाना के बारीक चुर्ण की एक चम्मच की मात्रा से पानी के साथ फंक्की लगाने से घुटनों का दर्द समाप्त होता है। विशेषकर बुढ़ापे में घुटने नहीं दुखते।
  • मेथी का रस निकाल कर सुबह शाम  पियें मधुमेह  ठीक हो जाती है।
  • काले अंगूर के साथ मेथी के रस में  समान मात्रा में लेने से बवासीर ग्रस्त रोगी रोगी ठीक हो जाता है।
  • मेथी में लौह तत्व अधिक होता है। यह पीलिया से ग्रस्त रोगी के लिए फायदेमंद है। मेथी की सब्जी में अदरक,गर्म मसाला डालकर खाने से निम्न रक्तचाप में फायदा होता है।
  • मेथी की सब्जी को खाने से खून में शुद्धता आती है, मेथी में दिल के रोगों के लिए पाचनशक्ति और कामवासना बढ़ाने की शक्ति होती है।
  • मेथी में ऐसे पाचक एंजाइम होते हैं जो की  भूख को बढ़ाती है। गैस, कफ और ज्वर  का नाश करती है,मेथी गैस, कफ और ज्वर  का नाश करती है,
  • पेट में वायु,पेट के कीड़े, पेट का दर्द, कमर का दर्द और शारीरिक पीड़ा को दूर करती है इससे स्त्रियों की कमजोरी दूर होती है, शक्ति आती है ।
  • बच्चे के जन्म (प्रसूति) होने के बाद गर्भाशय में कोई कमी रह गई हो, गर्भाशय ठीक से संकुचित न हुआ हो और स्तन एवं प्रसव पीड़ा  को नष्ट होती है।
  • बंद हुए मासिक-धर्म को फिर से  सुचारू करती है स्तन में दूध की मात्रा बढ़ती है।
  • सन्धिवात (जोड़ों का दर्द) में भी मेथी के ( गुड, आटा और मेथी ) लड्डूओं का सेवन किया जाता है।
  • मेथी में कैंसर रोधक तत्व भी पाए जाते हैं। इसका उपयोग डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और पेट संबंधी समस्या में फायदेमंद होता है। मेथी हृदय के लिए लाभकारी तथा बलवर्द्धक है।
  • मेथी रक्त की कमी में  लाभकारी है मेथी के चूर्ण तथा काढ़े से स्नायु रोग,बहु-मूत्र ,पथरी,टांसिल्स,रक्त-चाप तथा मानसिक तनाव और गर्भ-निरोधक के रूप में लाभ होता है।
  • मैथी ( दाना ) का साग बनाकर रोजाना खावें अथवा मैथी दाना का चूर्ण तीन ग्राम दही में मिलाकर सेवन करें। आंव की बिमारी में लाभ के अतिरिक्त इससे पेशाब का अधिक आना भी बन्द होता है। प्रतिदिन मैथी का साग खाने से आंव की बिमारी अच्छी होती है।
  • उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को कम करने और महिलाओं के सौंदर्य को निखारने में मदद करता है आँखों के नीचे का कालापन मिटने  के लिये मेथी  को पीस कर पेस्ट की तरह लगाते है।
  • मेथी के दानों को रात भर पानी में भिंगोकर सुबह उसे पीसकर सिर पर  बालों को झड़ने से रोकने  और बालों को  लम्बा करने के लिये लगायें।
  • मेथी के दानो को पीसकर उसका लेप चेहरे पर लगाने से चेहर के दाग-धब्बे दूर होते हैं त्वचा कांतिमय हो जाती है,ताजा मेथी के पत्तों को पीसकर चेहरे पर लगाने से मुहांसों, चेहरे का रूखापन और झुर्रियां दूर होती हैं।
  • उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को कम करने और महिलाओं के सौंदर्य को निखारने में मदद करता है बालों में रूसी होने पर मेथी पेस्ट बालों में लगाएं और आधा घंटे बाद धो लें।
  • यह एसीडिटी , अपच, अरुचि ,गैस, दस्त, पेट दर्द, बदहजमी ,कब्ज ,पाचन-तंत्र की गड़बड़ी, खांसी, सूजन, बादी, बवासीर, पेट के कीड़े ख़त्म करती है, और पेशाब को सुचारू करती है।
  • मेथी के कड़वेपन से पेट के कीड़े खत्म होते हैं।मेथी बवासीर ग्रस्त रोगी के लिए फायदेमंद है।
  • पेट के छाले, आँतों की सफाई के लिये-दो चम्मच मेथी एक कप पानी में उबाल कर मेथी का काढ़ा बना कर पीने से लाभ होता है।
  • मुंह के छाले ठीक  करने के लिए मेथी के  पत्तो के  अर्क से  और मुंह की दुर्गन्ध दूर करने के लिए मेथी को पानी में उबाल कर ठंडा करके  कुल्ला करते है।
  • कान बहने पर मेथी  को दूध में पीस कर छानने के बाद हल्का गर्म करके कान में डालें ।
  • पित्त दोष में हरी मेथी की उबली हुयी पत्तियों को देसी घी में तल कर खाने से लाभ होता है।
  • मेथी पाउडर का सेवन दूध के साथ करने से मधुमेह ठीक होता है।
  • मेथी का काढ़ा कान के दर्द, सर्दी, मिर्गी, लकवा और फालिज इत्यादि में लाभदायक है।
  • इसमें खून और पेशाब में ग्लूकोज की मात्रा कम करने का विशेष गुण होने के कारण डायबिटीज में ये बहुत गुणकारी होते है।
  • नपुंसकता, कमजोरी, गठिया (जोड़ों का दर्द), मधुमेह, बाल रोग, कब्ज, अनिद्रा (नींद का कम आना), मोटापा, रक्तातिसार तथा जलन आदि रोगों के लिए यह काफी हितकारी होती है।
  • विशेष सावधानी: मेथी का स्वभाव  गर्म होता है।अधिक मात्रा में खाने से पित्त को बढ़ती है पित्तजन्य रोगों में तथा उष्ण प्रकृतिवालों को नहीं करना चाहिए। जिनके  नाक से नकसीरी आना  खूनी बवासीर, पेशाब में खून आना,मासिक धर्म में कई दिनों तक अधिक खून आना उनको गर्मी के मौसम में मेथी का प्रयोग कम करना चाहिए। सर्दी के मौसम में मेथी का सेवन करना अधिक सुरक्षित है। मेथी के दानों का चूर्ण 3 से 6 ग्राम तक ले सकते हैं।
  • कैसे स्टोर करें: साबुत दानामेथी को आवश्यकतानुसार पाउडर या दरदरा पीसकर इस्तेमाल किया जा सकता है। इसे ताजा-ताजा ही पीसकर काम में लें क्योंकि ज्यादा दिनों तक पाउडर रखने पर खुशबू और ताजगी ज्यादा दिनों तक कायम नहीं रह पाती। ताजगी बनाए रखने के लिए एअरटाइट जार में ठंडी जगह स्टोर करें। डोसा के लिए उड़द की दाल व चावल भिगोते समय थोड़ी सी दानामेथी साथ में भिगोने से डोसे कुरकुरे, स्वादिष्ट और सुगंधित बनेंगे।
  • R K Rao
दालचीनी(Cannella-Cinnamon)
April 23rd, 2011

  • रसोई घर की शान  *दालचीनी*
  • दालचीनी एक मसाला ही नहीं, बल्कि एक औषधि भी है। दालचीनी का तेल भी बनता है। दालचीनी कैल्शियम और फाइबर की एक बहुत अच्छा स्रोत है, दालचीनी, साबुन, दन्त मंजन, पेस्ट, चाकलेट, चाय मिठाइयों में सुगंध व उत्तेजक के रूप में काम में आती है। दालचीनी वाकई सेहत के लिए लाभकारी है। दालचीनी का स्वाद तीखा, मीठा और सुगंधित होता है। दालचीनी मोटी तथा पतली दो प्रकार की होती है।यह एक पेड़ की छाल होती है। यह सुगंधित, उत्तेजक, पाचक, और अरुचिनाशक है। इसमें एंटीसेप्टिक, एंटीफंगल ,एंटी ऑक्सीडेंट, एंटी वायरल और एंटीएजिंग तत्व शामिल होते हैं। दालचीनी रक्त शर्करा को( मधुमेह को) सन्तुलित करने के लिए एक प्रभावी ओषधि है, इसे तो गरीब आदमी का इंसुलिन भी कहते हैं यह बलगम, गैस, खुजली, अपक्व रस, इनफ्लूएंजा, मलेरिया, गले के पेट के रोग, टाइफाइड, टीबी और कैंसर जैसे रोगों में गुणकारी है एवं दिल , मूत्राशय , बवासीर, पेट के कीड़े मारने वाली तथा वीर्य वर्धक होती है। यह दांतों की समस्याओं को दूर करने में गठिया, दमा, पथरी, दाँत का दर्द, सर्दी-खाँसी, पुराना जुकाम, थकान, और गंजेपन का भी इलाज करने में भी उपयोगी है।
  • दालचीनी के घरेलू उपयोग

 

  1. दालचीनी जी मिचलाना और उल्टी रोकने वाली, पेट की गैस दूर करने वाली है। चाय, कॉफी में दालचीनी डालकर पीने से स्वादिष्ट हो जाती है तथा जुकाम भी ठीक हो जाता है।
  2. तीन ग्राम दालचीनी पाउडर सुबह-शाम पानी के साथ लेने पर दस्त रुक जाते हैं।
  3. बालों के टूटने, झड़ने की समस्या हो तो सुबह-शाम दालचीनी और शहद के मिश्रण का प्रयोग पानी के साथ करें।
  4. दालचीनी रक्त संचालन को बेहतर बनाती है रक्त के परिसंचरण में यह एड्स और खून के थक्कों को बनने से रोकने में मदद करती है ।
  5. सुबह सुबह खाली पेट एक कप गरम पानी में शहद और दालचीनी पाउडर मिलाकर पीने से फैट कम होता है। यदि इसका सेवन रोजाना किया जाए तो मोटे से मोटे व्यक्ति का वजन भी घट जाता है।
  6. दालचीनी अपने वार्मिंग गुणों की वजह से विशेष रूप से उपयोगी हैं जिस व्यक्ति के पैर ठन्डे हो जाते हैं उनको ताजा अदरक व दालचीनी के साथ बनी चाय पीनी चाहिए जिससे यह और अधिक उर्जा व जीवन शक्ति देती है और रक्त परिसंचरण में सुधार करती है।
  7. सुबह नाश्ते से पहले एक बड़े चमच के शहद के साथ दालचीनी मिला कर लेने से गठिया के दर्द में राहत मिलती है
  8. शहद को कौन नहीं जानता शहद ग्लूकोज, फ्रुक्टोज और सुक्रोज का भंडार है। इसमें तरह-तरह के अमीनो अम्ल और लिपिड भी मिलते हैं। शहद शीतल, स्वादिष्ट तथा कृमिनाशक है। श्वास रोग, क्षयरोग हिचकी और अतिसार को नष्ट करता है।
  9. दालचीनी और शहद का प्रयोग हमारे यहाँ सदियों से होता रहा है। दालचीनी गरम मसाले का घटक है और शहद रामबाण रसायन है।
  10. पेट यदि गड़बड़ है तो शहद पर दालचीनी पावडर ड़ाल कर चाटने से एसिडिटी और पेट के छाले भी खत्म हो जाते हैं। खाना ठीक से हजम होता है
  11. दालचीनी और शहद का मिश्रण को हर रोग की दवा कहा जाता है गठिया, दमा, पथरी, दाँत का दर्द, सर्दी-खाँसी, पेट रोग, थकान, यहाँ तक कि गंजेपन का भी इलाज इस मिश्रण के द्वारा किया जा सकता है। आयुर्वेद और यूनानी पद्धति में तो शहद एक शक्तिवर्धक औषधि है।
  12. दालचीनी और शहद से त्वचा व शरीर को भी चमकदार और हेल्दी बनाने के लिए इन दोनों का इस्तेमाल करना चाहिए।
  13. दालचीनी पाउडर दो चम्मच, दो बड़े चम्मच जैतून का तेल, एक निम्बू का रस इस मिश्रण में एक कप चीनी और आधा कप दूध मिलाकर दस मिनट के लिए शरीर पर लगाएं इसके बाद में नहाइए इससे त्वचा मुलायम होगी और चमकने लगेगी
  14. दालचीनी पाउडर में नीबू का रस मिलाकर लगाने से मुंहासे व काले मस्से भी मिटते हैं।
  15. एक चुटकी दालचीनी पाउडर रात को सोते समय नियमित रूप से शहद के साथ मिलाकर लेने से स्मरण शक्ति बढ़ती है और मानसिक तनाव से राहत मिलती है। यह पागलपन को दूर करने में मदद करती है।
  16. जैतून के गरम तेल में शहद और दालचीनी पाउडर समान मात्रा में लेकर पेस्ट बनाएं। नहाने से पहले इस पेस्ट को 15 मिनट के लिए बालों पर लगाइए और सर को गुनगुने गरम पानी से धो लें।गंजेपन या बालों के गिरने की समस्या से छुटकारा मिलेगा
  17. दालचीनी और पानी घोल के प्रयोग से रक्त में शर्करा के स्तर में कमी आ जाती है।
  18. दालचीनी चाय, काफी में डालकर पीने से जुकाम ठीक होता है तथा स्वादिष्ट हो जाती है।
  19. दालचीनी के नियमित प्रयोग से बदलते मोसम से होने वाली बीमारियों से निजात मिलती है।
  20. दालचीनी पाचक है यह पाचक रसों के स्त्राव उत्तेजित करती है। भूख बढ़ाने वाली, दस्त, डायरिया, उल्टी, मिचली रोकने वाली, पेट के कीड़ों को नष्ट करने वाली, मल को नियमित करने वाली,, बदबू दार गैस नाशक होती है। जननेंद्रियों में उत्तेजना देने वाली, वीर्य तथा शुक्रवर्द्धक होती है। यह एंटीसेप्टिक, एंटीफंगल और एंटी वायरल होती है। दांतों की समस्याओं को दूर करने में भी यह उपयोगी है।
  21. दालचीनी में सांस की गंध से लड़ने की क्षमता है दालचीनी पाउडर और शहद का मिश्रण से दातों को हलके हलके मले दांत के दर्द से राहत मिलेगी सांसे दिन भर ताजा रहेगी मुँह के जीवाणुओ में कमी आएगी।
  22. दालचीनी महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए उपयोगी है यह भी पाया गया है की यह मासिक धर्म को और मां के दूध के स्राव को नियमित करता है। यह मौसमी बीमारियों को भी दूर रखता है।
  23. एक चम्मच शहद में चुटकी भर दालचीनी पाउडर मिलाकर मसूढ़ों पर ऐसी महिलाएं जो गर्भधारण नहीं कर पाती हैं लगाने से कुछ दिनों में ही गर्भधारण की सम्भावना बढ जाती है।
  24. दालचीनी के पाउडर को एक गिलास पानी में उबालें और चुटकीभर कालीमिर्च व शहद के साथ लें कई बीमारियों में फायदेमंद होगा।
  25. अच्छे स्वाद और फ्लेवर के लिए केक चाय कोफ़ी आदि पर कुछ दालचीनी अवश्य छिड़के, भूलें नहीं।
  26. दालचीनी में बैक्टीरियल रक्षा प्रतिरोधक छमता है इसके लिए ठंड के मौसम के दौरान गुनगुने पानी में दालचीनी पाउडर और शहद का मिश्रण मिला कर लेना चाहिए।
  27. हर रोज नियमित रूप से खाली पेट शहद और दालचीनी पाउडर मिलाक रगरम पानी के साथ पीने से मोटे व्यक्ति का वजन निश्चित रूप से घटना शुरू हो जाता है।
  28. इसके फूलों का इत्र परफ्यूम भी बनाया जाता है।
  29. दालचीनी में 2 प्रतिशत तेल होता है जो उड़नशील होता है। दालचीनी का तेल दर्द, घावों और सूजन को नष्ट करता है।
  30. दालचीनी का तेल दर्द, सूजन को नष्ट करता है। घावों को भरता है दालचीनी को पानी, शहद और तिल के तेल, में मिलाकर दर्द,घाव और सूजन पर मालिस करनी चाहिए ।
  31. दालचीनी हल्की सी कड़वी व मीठी, सुगन्धित, वीर्यवर्द्धक (वीर्य बढ़ाने वाली) त्वचा के रंग में सुन्दरता बढ़ाने वाली, वात-पित्त नाशक, मुंह का सूखना और प्यास को कम करने वाली होती है।
  32. दस्त की समस्या होने पर एक चम्मच दालचीनी पाउडर सुबह-शाम पानी के साथ लें।
  33. दालचीनी माउथ फ्रेशनर भी है।बदबू दार सांसे होने पर दालचीनी का एक टुकड़ा मुहं में ले कर चूसें।
  34. दालचीनी के सेवन करने पर आप को कुछ सावधानियों की जरूरत है।
  35. दालचीनी का अधिक मात्रा में सेवन हानिकारक होता है।
  36. गंभीर बीमारी के उपचार के लिए दालचीनी लेने से पहले आपको अपने चिकित्सक से परामर्श अवश्य करना चाहिए
  37. गर्भवती महिलाओं को दालचीनी की अत्यधिक मात्रा के सेवन से बचना चाहिए।
  38. दालचीनी में स्वाभाविक रूप से एक फ्लेवर होता है ज्यादा मात्रा में सेवन करने पर यह फ्लेवर जिगर को नुकसान पहुंचा सकता है।
  39. जिन लोगो को चोट आदि से खून बह रहा हो तो दालचीनी नहीं लिया जाना चाहिए कियोंकि यह खून को पतला करती है।
  40. दालचीनी गर्म होती है। अत: इसे थोड़ी सी मात्रा में लेते हुए धीरे-धीरे बढ़ाना चाहिए। परन्तु यदि किसी प्रकार का दुष्प्रभाव या हानि हो तो सेवन को कुछ दिन में ही बंद कर देते हैं और दुबारा थोड़ी सी मात्रा में लेना शुरू करें।

 

  • निष्कर्ष :-अपने नियमित आहार में दालचीनी को शामिल करके कॉफी, अनाज, और चाय के ऊपर छिड़क कर कोलेस्ट्रॉल, मधुमेह, ट्राइग्लिसराइड का स्तर मानसिक तनाव पेट की समस्याए पाचन तंत्र दस्त कब्ज पेट के कीड़े और पेट का फूलना,बदबू दार गैस सांसो में सडन गठिया, दमा, पथरी, दाँत का दर्द, सर्दी-खाँसी ,जुकाम, दस्त, डायरिया, उल्टी, मिचली थकान, मासिक धर्म कैंसर के जोखिम आदि से बचा जा सकता है और थोडा थोडा मिश्रण व उपयोग में बदलाव करके कई तरह की समस्याओं से बचा जा सकता है इसलिए हम कह सकते है की दालचीनी अनमोल है अद्भुत है रामबाण है और रसोई घर की शान है।

R K Rao

अजवायन (Thymus)
April 21st, 2011

अजवायन

  • अजवायन एक रसोई घर का बे मिसाल मसाला और एक असरकारक औसधि है।मसाले ही नहीं, बल्कि अजवायन का उपयोग एक औषघि के रूप में भी किया जाता है। यह पकवान का स्वाद बढ़ने के साथ साथ पेट सम्बंधी अनेक रोगों जैसे वायु विकार, कृमि, अपच, कब्ज आदि को ठीक करने में मदद करता है । अजवायन स्वास्थ्य और सौंदर्य, के लिए बहूत ही उपयोगी है । घाव, दाद, खुजली, फुंसियाँ आदि चर्मरोग भी नष्ट होते हैं। पाचन दरुस्त करता है, पाचन क्रिया के शिथिल पड़ने पर अजवायन का सेवन काफी फायदेमंद है यह मसाला बीज, फूल, पत्ते, तेल और अर्क के रूप में पर्योग किया जाता है। इसको चूर्ण, काढ़ा, क्वाथ और अर्क के रूप में भी काम में लाया जाता है। अजवायन की पत्ती का दिलकश स्वाद होता है । सबसे अधिक इतालवी व्यंजनों,में पिज्जा पास्ता आदि में अजवायन की पत्ती का प्रयोग किया जाता है । अजवायन की पत्ती में बैक्टीरियल विरोधी गुण है जो कि संक्रमण से लड़ने में मदद करता है। अजवायन की ताजा पत्ती में प्रचुर मात्रा में पोषक तत्व और विटामिन है. विटामिन सी, विटामिन ए, लोहा, मैंगनीज और कैल्शियम और साथ ही युक्त ओमेगा -3 फैटी एसिड का एक अच्छा स्रोत है। अजवायन से कैलशियम, फासफोरस, लोहा सोडियम व पोटेशियम जैसे तत्व मिलते हैं। यह एक उत्कृष्ट एंटीऑक्सिडेंट है, अजवायन मोटापे को कम करने में भी मदद करती है। सर्दियों के मौसम में सर्द से बचने के लिए अजवायन एक सफल औषधि है। जंगली अजवायन की पत्ती का तेल श्रेष्ट माना गया है प्रतिरक्षा प्रणाली को दृढ़ करता है,श्वसन किर्या को दरुस्त करता है जोड़ों और मांसपेशियों का लचीलापन बढाता है और त्वचा को संक्रमण से बचाता है ।

अजवायन एक और गुण अनेक

  1. अजावयन अदरक पाउडर और काला नमक 2-2 और 1 के अनुपात में मिलाएं भोजन करने के बाद एक चम्मच चूर्ण गुनगुने पानी के साथ लें तो पेट दर्द व गैस की समस्या में आराम मिलेगा। अशुद्ध वायु का बनना व सर में चढ़ना ख़त्म होगा।
  2. अजवायन पाउडर का एक चम्मच (टी स्पून) ले उसमे एक चुटकी काला नमक मिला कर दिन में दो या तीन बार गुनगुने पानी के साथ सेवन से पेट में दर्द, दस्त , अपच, अजीर्ण, अफारा तथा मन्दाग्नि में लाभकारी होती है।
  3. अजवायन, सौंफ, सोंठ और काला नमक को बराबर मात्रा में मिलाकर देसी घी के साथ दिन में तीन बार खाएं। भूख लगने लगेगी ।
  4. शाम को अजवायन को एक गिलास पानी में भिगोएं सुबह छानकर उस पानी में शहद डालकर पीने से मोटापे को कम करने में मदद होती है।
  5. अजवायन के तेल की कुछ बूंदें गुनगुने पानी में मिलाकर कुल्ला करने से मसूड़ों की सूजन कम होती है।
  6. खांसी जुाकाम में चुटकी भर काला नमक, आधा चम्मच अजवायन,और दो लांग इन सब को पिस कर गुनगुने पानी के साथ दिन में कई बार पीने से अदभुत लाभ मिलता है ।यह रामबाण दवा है।
  7. आधा कप पानी में आधा चम्मच अजवायन और थोड़ी सी हल्दी पाउडर डालकर उबाले और ठंडा करें और इसमें एक चम्मच शहद डालकर पीएं। और गर्म पानी में अजवायन डालकर इसका भाप लें। इस से छाती में जमा कफ निकल जाता है ।
  8. पित्ती की बीमारी के लिए अजवायन के फूल को गुड के साथ मिला कर पानी से लेने से पित्ती ठीक होती है।
  9. बेर के पत्तों और अजवायन को पानी में उबालकर, छानकर उस पानी से गरारे करने पर लाभ होता है।
  10. अजवायन को पानी में डालकर उबालें। छानकर बार बार थोड़ा-थोड़ा लेते रहने से आधे सिर दर्द में लाभ होता है। रात को कई बार पेशाब आने पर भी इसके सेवन से फायदा होता है।
  11. जोड़ों के दर्द में सरसों के तेल में अजवायन डालकर अच्छे से गर्म करें व छान ले और इससे जोड़ों की मालिश करे इससे आराम होगा।
  12. अजवायन प्रबल कीटनाशक है। आँतों में कीड़े होने पर अजवायन के साथ काले नमक का सेवन करने पर पेट के कीड़े बाहर निकल जाते हैं।
  13. अजवायन का चूर्ण और गुड समान मात्रा में मिलकर गोली बनाकर दिन में दो तीन बार खिलाने से पेट के सभी प्रकार के कीडे नष्ट हो जाते है।
  14. एक से दो ग्राम ग्राम अजवायन का चूर्ण छाछ के साथ देने से पेट के कीडे नष्ट होकर मल के साथ बाहर निकल जाते है।
  15. सुबह दस-पन्द्रह ग्राम गुड खाकर दस-पन्द्रह मिनट बाद एक से दो ग्राम अजवायन का चुर्ण बासी पानी के साथ ले। इससे आंतों में मौजूद सब प्रकार के कीडे मर कर मल के साथ बहार निकल जायेंगे।
  16. अजवायन को रात में चबाकर गरम पानी पीने से सवेरे पेट साफ हो जाता है।
  17. अजवायन के फूल को शहद में मिलाकर लेने से खॉसी और कफ में फायदेमंद होता है इससे कफ की दुर्गन्ध भी खत्म होती है।
  18. खीरे के रस में अजवायन पीसकर चेहरे की झाइयों पर लगाने से लाभ होता है।
  19. चोट लगने पर अजवायन एवं हल्दी की पुल्टिस बाँधने से चोट की सूजन व दर्द कम होती है।
  20. अजवायन का अर्क या तेल 10-15 बूँद बराबर लेते रहने से दस्त बंद होते हैं।
  21. अजवायन का चूर्ण दो-दो ग्राम की मात्रा में दिन में तीन बार लेने से ठंड का बुखार शान्त होता है।
  22. ब्लडप्रेशर बाय दर्द, रक्तचाप और चर्म रोगों में ऊँगलियों के काम न करने पर अजवायन के फूल,एवं गिलोय का अर्क 1-1 ग्राम साथ मिलाकर लेना लाभ दायक होता है।
  23. अजवायन के फूल का चूर्ण पानी में मिलाकर उस घोल से घाव, दाद, खुजली, फुंसियाँ आदि धोने पर ये चर्मरोग नष्ट होते हैं।
  24. अजवायन का प्रयोग प्रसव के बाद अग्नि की प्रदिप्त करने और भोजन को पचाने, वायु एवं गर्भाशय को शुद्ध करने के लिए पर्योग किया
  25. जाता है।
  26. अजवायन 10 ग्राम, छोटी हरड़ का चूर्ण 6 ग्राम, सेंधा नमक 3 ग्राम, हींग 3 ग्राम का चूर्ण बनाकर रखें और 3-3 ग्राम की मात्रा में जल
  27. के साथ लें तो पेट दर्द, जलन, अफारा , और मलमूत्र की रूकावट दूर होती है।
  28. एक लीटर पानी में अजवायन के फूल का चूर्ण मिलाकर उस घोल से घाव, दाद, खुजली, फुंसियाँ आदि धोने पर ये सब चर्मरोग नष्ट होते हैं।
  29. अजवायन चूर्ण गरम पानी के साथ लेने से या अर्क को गुनगुना करके पीने से या इसके तेल की मालिश करने से बदन दर्द ठीक होता है।
  30. अजवायन की पत्ती माहवारी के विकारों के उपचार, फेफड़ों की समस्याओं और अजीर्ण में और प्रयोग किया जाता है यह शक्तिशाली एंटीबायोटिक और एंटीऑक्सिडेंट भी होता है। अजवायन की पत्ती में प्राकृतिक एंटीसेप्टिक तत्व हैं यह संक्रमण को दूर रखने के महत्वपूर्ण होता है।
  31. किडनी या गुर्दे संबंधी परेशानी में एक बड़ा चम्मच जीरा और दो चम्मच अजावयन को पीस कर पाउडर बना लें। इसमें थोड़ा सा काला नमक और एक चम्मच भूरे रंग का सिरका डाले। हर घंटे बाद एक एक चम्मच इस मिश्रण का लें। दर्द से जल्द ही आराम मिल जाएगा।
  32. अजवायन का चूर्ण गेरु में मिलाकर शरीर पर मलने से पित्ती में तुरन्त लाभ होता है। इसके अलावा, उल्टी, पेरासेलसस पीलिया आंतरिक, जुकाम, बुखार, फ्लू, पेट, बदन दर्द और ऐंठन के इलाज में भी लाभ होता है।
  33. औषधियों में उत्तम है। प्रसूति स्त्रियों को अजवायन व गुड मिलाकर देने से भूख बढ़ती है।
  34. प्रसव के बाद अजवायन के प्रयोग से गर्भाशय शुद्ध होता है। गर्भाशय पूर्वास्थिती में आ जाता है। दूध ज्यादा बनता है। बुखार व कमर का दर्द ठीक करता है।
  35. अजवायन को सरसों के तेल में डाल कर पकायें उससे बच्चों को मालिश करें सर्दीजुकाम में तथा प्रसव उपरांत लाभ होगा।
  36. दोपहर को भोजन के बाद पिसी 2 – 3 ग्राम अजवायन लेने से खाना आसानी से हजम होता है।
  37. पान में अजवायन को डाल कर खाने से पुरानी खांसी ठीक होती है।
  38. अजवायन में गुड मिलाकर बांधने से पैर का कांटा निकल जाता है।


R K Rao


हल्दी(Turmeric) एक गुण अनेक
April 18th, 2011

हल्दी

हल्दी एक अदरक  की प्रजाति का पोधा है जिस की जड़ कंद मूल के रूप में प्रयोग की जाती है।  यह भारतीय रशोई घर की शान है। भारत में इसका उपयोग तरकारी में, ओषधि के रूप में और सोंदर्ये प्रसाधन के रूप में किया जाता है। गाँवो में आज भी साड़ी को रंगने में हल्दी का प्रयोग किया जाता है। हल्दी दो प्रकार की होती है, लम्बी व गोल ताजा व सूखी हल्दी का पर्योग सब्जी, मसाले तथा ओषधि के रूप में होता है। हल्दी हजार रोग की एक दवा है।  लम्बी व गोल  ताज़ा हल्दी को छाया में सुखा लिया जाता है। जिसका चूर्ण बना कर मसाले व उपचार के रूप में प्रयोग किया जाता है। सूखने के बाद यह पीला रंग ग्रहण कर लेती है हल्दी जितनी कम पीली हो उतनी ही अच्छी है हल्दी से सोंदर्य को निखारने में मदद मिलती है। हल्दी में जल प्रोटीन वसा खनिज पदार्थ रेशा, आहार फाइबर,  मैंगनीज, पोटेशियम, कारबोहा‍‍इड्रेट, कैल्शियम,फासफोरस, लोहा, ओमेगा 3 और ओमेगा 6 फैटी एसिड विटामिन ए, विटामिन बी, विटामिन सी के स्रोत,तथा कैलोरी भी पाई जाती है ।
हल्दी में पाया जाने वाला कर्कुमिन कैंसर विरोधी है। हल्दी से गठिया की रक्षा होती है कच्ची हल्दी लीवर के रोगों में उत्तम मानी जाती है लीवर ख़राब होने पर कच्ची हल्दी का सेवन करना चाहिए। हल्दी में प्रभावशाली उपचारक शक्ति होती है। हल्‍दी पूर्ण रूप से सुरक्षित औषधि है। इस से कोई साइड इफेक्‍ट नहीं होता। हल्दी से खांसी, जुकाम नजला मुहासों , सफेद  या काले दाग , रूखी त्‍वचा , तवचा के काले रंग के धब्बों का उपचार होता है, तथा खुजली , खारिश में हल्दी का चूर्ण छिड़कनें से घाव शीघ्र भरते हैं। चेहरे का सौंदर्य निखारनें के लिये हल्‍दी और चन्दन पाउडर का उबटन प्रयोग करना चाहिये हल्दी  का उपयोग  बहुमूत्र , गंदा पेशाब, पेशाब में जलन, पेशाब में रक्‍त , पीप मधुमेह   प्रमेह प्‍लीहा और यकृत की बीमारियों आदि आदि रोगों में किया जाता है
हल्दी से उपचार
  1. चोट के घाव  का उपचार हल्दी पाउडर से करें। जला हुआ एलर्जी या कट जाने पर हल्दी छिड़किये घाव ठीक हो जायेगा। फोडे फुंसी पर चोट के घाव पर हल्दी पाउडर को सरसों के तेल में मिला कर तव्वे आदि पर सेक कर लुगदी बनाइये और लगाइए घाव भर जायेंगे।
  2. बुखार,खांसी, जुखाम सर्दी कफ पुराना जुकाम, नाक का मांस बढ़ जानें पर इस के लिए दो तिन ग्राम हल्दी पाउडर को गुनगुने पानी के साथ सुबह शाम लेने से रोग में आराम आता है। इस से होनें वाले सिर दर्द , बुखार , बदन दर्द आदि भी ठीक हो जाते हैं  कफ दोष के निवारण या जाड़े की ठंड भगाने में कुनकुने दूध के साथ हल्दी पाउडर का प्रयोग तुरंत लाभ देता है।
  3. एलर्जी , शीतपित्‍ती दमा और अस्थमा  में हल्‍दी का चूर्ण 2 से 3 ग्राम तक अदरख के  दो चम्‍मच रस और  शहद के साथ मिलाकर दिन में तीन बार चाटने से दमा और अस्थमा में फायदा मिलता है।
  4. मधुमेह के रोगी  2 ग्राम हल्दी, 2 ग्राम  जामुन की गुठली का चूर्ण, 500 मिलीग्राम कुटकी मिलाकर दिन में चार बार सादे पानीं से खायें मधुमेह के साथ साथ जिनको यकृत प्‍लीहा, गुर्दे तथा आंतों के रोग भी दूर होते है।
  5. मात्रा : -व्यस्क व्यक्तियों  के लिये कच्ची हल्दी का रस 1 से 3 चाय चम्‍मच सूखी हल्‍दी का चूर्ण 1 ग्राम से 4 ग्राम तक  निश्चित की गयी मात्रा है किशोंरों के लिये 500 मिलीग्राम से 1 ग्राम तक बच्‍चों के लिये 50 मिलीग्राम से 100 मिली ग्राम तक की मात्रा ले सकते है तथा इसे आवश्‍यकतानुसार गुनगुनें पानीं , गरम चाय अथवा दूध के साथ दिन मे , 2 से 3 बार ले सकते है।
  • पुरातन समय से ही दादी नानी  के नुस्खों में बतौर दवा  की जगह पा चुकी हल्दी के बारे में क्या  आप जानते है की ?

  1. हल्दी में  एंटीसेप्टिक  गुण मौजूद होता हैं।जो इंफेक्शन होने से बचाता है यह एक जीवाणुरोधी भी है।
  2. हल्दी में दर्द से छुटकारा दिलाने  का गुण है। यह एक प्राकृतिक रूप से दर्द का शमन कराने वाला है।
  3. हल्दी पाचन तंत्र की समस्याओं, गठिया, रक्त प्रवाह की समस्याओं, कैंसर, बैक्टिरिया संक्रमण, हाई ब्लडप्रेशर और एलडीएस कोलेस्ट्रोल की समस्याओं के साथ-साथ शरीर की कोशिकाओं की टूट-फूट की मरम्मत में लाभकारी है।
  4. आयुर्वेद में हल्दी को एक महत्वपूर्ण औषधि कहा गया है। भारतीय रसोई में इसका महत्वपूर्ण स्थान है।हल्दी एक बहुत ही बेहतरीन एंटीऑक्सिडेंट है,जो कैंसर को भी कंट्रोल करता है।
  5. हल्दी के नियमित सेवन से कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी को भी दूर रखा जा सकता है।यह पेट की बीमारियों की अचूक दवा मानी जाती है।
  6. हल्दी दोबारा से पैदा होने वाली बीमारी में भी कारगर है इससे रक्त कोशिकाओं में खून का प्रवाह सही बना रहता है।
  7. यह त्वचा की समस्याओं व आर्थराइटिस (गठिया) को भी कम करता है क्योंकि यह एक शक्तिशाली एंटीऑक्सिडेंट  है।
  8. आप रोजाना दूध के साथ थोड़ी  सी हल्दी लेते हैं तो इससे आपकी हड्डियां मजबूत होती हैं दांतों के फ्लोराइ में हल्दी के एंटीबायोटिक के रूप में भी पुराना प्रयोग  है।
  9. हल्दी रक्त शोधक भी है। जो कॉलेस्ट्रोल को कम करता है।
  10. हल्दी अदरक परिवार का एक सदस्य है, हल्दी पाचन तन्त्र की समस्याओं, गठिया, रक्त-प्रवाह की समस्याओं, केन्सर, जीवाणुओं (बेक्टीरिया) के संक्रमण, उच्च रक्तचाप और एलडीएल कोलेस्ट्रॉल की समस्या और शरीर की कोशिकाओं की टूट-फूट की मरम्मत में लाभकारी है।
  11. यह इम्यून सिस्टम को मजबूत  बनाता है। इससे  अंदरूनी चोटों में भी फायदेमंद पहुचता है , जिसमें लिवर व किडनी खास है।यह आपके मेटाबॉलिज्म को मजबूत बनाता है हल्दी में पेट  दर्द, गैस और आंत्र समस्याओं का इलाज करने की क्षमता भी है।
  12. दूल्हा और दुल्हन हल्दी चन्दन का उबटन शारीर पर मलते है जिससे  उनके शारीर का  सौंदर्य निखरता है व त्वचा कोमल होती है  कच्ची हल्दी का रस त्वचा की चमक बढ़ाता है। यह शरीर के बालों के विकास को रोकता है और त्वचा को कोमल, चिकनी बना देता है।
  13. यह एक प्राकृतिक सन स्क्रीन के रूप में कार्य करता है रोगों के निदान के साथ ही सुंदरता बढ़ाने में भी योगदान करता है।हल्दी का प्राकृतिक रंग चेहरे के रंग को चमकाने और त्वचा संबंधी रोगों में रामबाण है।इससे सुंदरता में निखार आता है। सदियों से ही हल्दी और चंदन के लेप को चेहरा चमकाने और सुंदरता में चार चाँद लगाने के लिए प्रयोग किया जाता रहा है।
  14. हल्दी की जड़ों में पाया जाने वाला करक्यूमिन सब्जी को स्वादिष्ट बनाता है। हल्दी में करक्यूमिन कैंसर को दोबारा लौटने से भी रक्षा करती है।
  15. हल्दी का कोई साइड इफेक्ट नहीं होता और हेल्थ सप्लीमेंट के रूप में भी हल्दी का उपयोग होता है।
  16. शोधो के अनुसार देखने में आया की लीवर में हल्दी का मेटाबोलिज्म भी ठीक रहा। बुजुर्गो में भूलने की लाइलाज बीमारी अलजाइमर में भी प्रभावी नतीजे देखने को मिले है।कैंसर की कोशिकाओं का खात्मा करने में मददगार साबित होता है। हल्दी कैंसर के दोबारा लौटने से भी रक्षा करती है।करक्यूमिन ऐसी कैंसर कोशिकाएं जो कीमोथेरेपी से भी ठीक नहीं होतीं, हल्दी से पूर्णतया नष्ट हो जाती हैं।
  17. हल्दी कीमोथेरेपी से बेअसर रहीं कोशिकाओं को खत्म करता  है।
  18. हल्दी अल्जाइमर्स,आर्थराइटिस (जोड़ों में दर्द) और दूसरे डिसऑर्डर को दूर करने में भी कारगर है।यह चींटियों रोकने  में मदद करती है चींटिया इस की  गंध से ही दूर रहती है । यह कीड़े और सांप आदि को दूर रखती है।
  19. रात को सोते समय हल्दी चूर्ण को मसूड़ों और दाँतो मे लगा लें। फिर कुछ समय बाद कुल्ला कर लें। याद रखे दाँतो पर इसे घिसना नही है। रात के समय ही ऐसा करें। सुबह आप अपना मनचाहा मंजन या पेस्ट करे।
  • विशेष : हालांकि, हल्दी की अधिक मात्रा अपच, दस्त और कब्ज का कारण बनता है। पित्त की खराबी और पेप्टिक अल्सर में भी हल्दी का इस्तेमाल हानिकारक माना जाता है।

R K Rao 

आंवला (Amla*Gooseberry)
April 17th, 2011

आंवला

आंवला एक कसैला स्वाद वाला अत्यन्त गुणकारी पोसक शीतल विटामिन सी से भरपूर वृद्धावस्था को रोकने में समर्थ धातृ फल है आयुर्वेद में आँवले का भरपूर प्रयोग किया जाता है आकर में बड़ा , बेदाग और हलकी-सी लाली लिए हुए हो, वह आँवला सबसे उत्तम होता है  | एक आँवला एक अंण्डे से अधिक बल देता है। एक आँवले में विटामिन- सी की मात्रा चार नारंगी और आठ टमाटर या चार केले के बराबर मिलता है | इसलिए यह शरीर की रोगों से लड़ने की शक्ति में महत्वपूर्ण है | |यह फल पितनाश्क होने के कारण पित-प्रधान रोगों की प्रधान औषधि है | यह रक्तवाहिनियों के विकारों को नष्ट करने में सक्षम है | यह फल मधुरता और शीतलता के कारण पित को शान्त करता है  आँवले में कई तरह के विटामिन होते है आँवले में कैलोरी, प्रोटीन,  कैल्सियम,  लोहा, विटामिन , थायोमिन, रिबोफ्लोविन, नियासिन, विटामिन-सी जल, कार्बोहाईड्रेट खनिज लवण रेशा वसा और फास्फोरस भरपूर मात्र में होता है |

आंवला ताजा व सुखा दोनों रूप में मिलता है हो सके तो ताजा आंवला इस्तेमाल करे वरना धुल रहित शुष्क स्थान पर  छाया में सुखा कर प्रयोग करे जिससे विटामिन सी कम से कम नष्ट होता है आंवलों की सुरक्षित अवधि एक साल मानी गयी है उसके बाद इसके गुणों में कमी आने लगती है  आंवला तीनो दोषों (वाट पित काफ )को संतुलित करता है यह पाचक ,अरुचि नाशक वमन में लाभकारी है यह नाड़ी तंत्र व इन्द्रियों को ताकत देने वाला पोष्टिक रसायन है

  1. अमल्पित रक्तपित अजीर्ण और अरुचि की सफल ओषधि है गर्भवती स्त्रियों के वमन मितली के लिए आंवला अच्छी व निरापद ओषधि है पेट की गैस पेट की शुल कब्ज चक्कर आना और मन्दाग्नि के लिए अच्छी दवा है I
  2. तीन ग्राम आंवला दिन में दो या तीन बार लेने से अत्यधिक अम्लपित से हुई बिमारियों को 15 दीन में आराम होता हैविटामिन सी की कमी से उत्पन  स्क्रीवी  नामक  रोग होता है जिससे कमजोरी चिडचिडापन मसूडो का फूलना  व पाचन तंत्र का ख़राब होना हड्डियों का स्वयं से टूटना शुरू हो जाता  है इस सित्थी में रोगी को  100 मिलीग्राम विटामिन सी देना जरुरी होता है जो आंवले में पर्याप्त मात्र में होता है 10 ग्राम आंवले में 92  मिलीग्राम विटामिन सी  होता है
  3. आंवला चूर्ण तीन से दस ग्राम और आंवला का रस 25 ग्राम तक दिन में दो बार लिया जाना चाहिए  यकृत की कमजोरी आना या पीलिया  होने पर आंवले की चटनी को शहद के साथ  सुबह शाम देने से रोग ठीक होता है
  4. आंवले का  रस व मिश्री या शहद  सामान मात्रा में दिन में दो बार लेने से अम्लपित का रोग ठीक होता है शाम को 5 ग्राम आंवला पानी में भिगो कर रख दे सुबह 100 ग्राम दूध के साथ 1 माह तक लेने से पांचन सम्बन्धी  सभी रोग ठीक होते है
  5. आंवला गुड या दही के साथ लेने से रक्तपित  भी ठीक होता है
  6. आँवले के नियमित सेवन से नेत्रज्योति और स्मरणशक्ति बढती है आंवले में  सकसीनिक नामक अम्ल होता है जो बुढ़ापे को रोकता है  पुनः यौवन शक्ति प्रदान करता है इसका  नियमित सेवन वृद्धावस्था को भगाता है
  7. आंवला काफ को बहार निकलता है यह तवचा, स्नायु तंत्र सम्बन्धी रोग ठीक करता है
  8. सोंदर्ये को बढाता है तवचा के दाग धब्बे मिटाता है। समरण शक्ति को बढाता है मनुष्य के दिमाग को शीतलता प्रदान करता है और मन को शान्त रखता है
  9. इसके नियमित सेवन से खून साफ होता है ख़राब तत्वों को बहार धकेल कर नया खून बनता है और आँवला रक्‍त की कमी को दूर करता है।यह गर्भवती महिला के लिए तथा जन्म लेने वाले बच्चे के लिए अमृत सामान है।
  10. उच्च रक्तचाप में मधुमेह के रोगीओं के लिए , ह्रदय रोग से बचाव के लिए कोलेस्ट्रोल तथा मस्तिस्क की निर्बलता के लिए नेत्र ज्योति बढाने के लिए बहुत गुणकारी है
  11. ह्रदय की बेचैनी में , दिल की धड़कन, मेदा, रक्तचाप,दाद आदि में लाभदायक है
  12. आँवला पाउडर १ चम्मच दो बार पानी या दूध के साथ लेने से मधुमेह में लाभ होता है।
  13. आयुर्वेद में पेट सम्बन्धित रोगों के लिए आँवले को रामबाण माना गया है।
  14. आँवले के चूर्ण को शहद के साथ मिला कर चाटने से पेट व गले की जलन, खाना न पचना, खट्टी डकार, गैस व कब्‍ज आदि रोग दूर होते हैं। अपच,भूख न लगना, गैस, एसिडिटी और सबसे मुख्य रोग कब्ज़ और कब्ज़ ही सभी बीमारीयों की जड़ होती है जिसमे बवासीर, वात प्रकोप, एसिडिटी, गैस और जोड़ों का दर्द आदि  बीमारीयां  होती है |
  15. कब्ज़ में आँवला रात को एक चम्मच पिसा हुआ पानी या दूध के साथ लेने से सुबह शौच साफ़ आता है , कब्ज़ नहीं रहती | इससे आंते और पेट हलकी और साफ़ रहता है |
  16. विशेष आंवला अनेक रोगों को नष्ट करने वाला पोषक, धातुवर्द्धक और रसायन है

विशेष : इसे पोषण के लिए सुबह ढूध या पानी के साथ व रेचक के लिए(पेट साफ़ करने के लिए)  शाम को गुनगुने ढूध या पानी  के साथ हर रोगी और स्वस्थ व्यक्ति ले सकता है और पूरी जिन्दगी ले सकता है किंयोकी आंवला निरापद है

 

R K Rao 

 

नमक (Salt)
April 9th, 2011

नमक हमारे जीवन के लिए उपयोगी हैं।शुद्ध नमक रंगहीन होता है यह ठंडे पानी में घुलनशीलहै जिसमें चूना, आयोडीन, गंधक , कैल्शियम, फॉसफोरस, क्लोरीन आदि  मुख्य रूप में पाए जाते हैं जो हमारे शरीर के लिये अत्यंत आवश्यक है। प्राकृतिक नमक लगभग बीस-पच्चीस प्रकार के होते हैं  ये सभी हमें हर तरह की हरी साग सब्जियों सेप्राप्तहोता है । अप्राकृतिक बाहरी नमक कम से कम खायें।नमक के कुछ प्रकार हैं जैसे सेंधा नमक, सफेद नमक या साधारण नमक, लाल नमक,काला नमक,विड नमक,समुद्री नमक,सांभर नमक आदि- आदि

प्राकृतिक नमक हमारे जीवन के लिए उपयोगी हैं। अनाज, सब्जियों, फलों के जरिये से यह  हमारे शरीर में जाता है, तो शरीर इसका पूरा-पूरा लाभ उठाता है। अधिक देर तक पकाने से इनका प्राकृतिक नमक नष्ट हो जाता है। यदि प्राकृतिक नमक हमारे शरीर में खाद्य पदार्थों द्वारा नहीं पहुंचेगा, तो शरीर की विकास क्रिया, शोधन, शरीर की रचना रुक जाती है।  यदि शरीर में  नमक न हो तो पसीना कम आता है, मलमूत्र निकलने में बाधा आती है। प्राकृतिक नमक हमें  दूध, दही, अण्डा, मछली आदि से मिलता है। अगर शरीर में इस प्राकृतिक नमक की कमी हो तो शरीर को काफी परेशानियां झेलनी पड़ सकती है। रोज के खाद्य पदार्थों से ही हमें शरीर की आवश्यकता के अनुसार नमक  प्राप्त हो जाता है। परंतु यह मात्रा कम होने की वजह से बाहरी नमक की जरूरत पड़ती है।

शरीर में नमक की कमी होने से थकान, जी मिचलाने, चक्कर आने और बेहोशी जैसी समस्यायें आ सकती हैं और गंभीर अवस्था में व्यक्ति कोमा में भी जा सकता है। यहीं नहीं, ज्यादा नमक खाने से कैंसर और किडनी में पथरी जैसी बीमारियां भी हो सकती हैं। नमक की दैनिक आहार मात्रा प्रति दिन 3 से 5 ग्राम ही होनी चाहिए ।

वनस्पतियों द्वारा पाया गया नमक यदि शरीर में कम हो जाये, तो उसकी पूर्ति बाहरी नमक नहीं कर पाता । हमारा शरीर बाहरी नमक को सविकार ही नहीं करता, बल्कि इसे बाहर फेंकने का प्रयास भी करता है । जिसके कारण बीमारियां होनी  शुरू हो जाती है। जब भोजन को प्राकृतिक रूप से पकाया गया हो, तो बाहरी  नमक की जरूरत नहीं पड़ती

अधिक नमक के सेवन से होने वाली परेशानियां-

याद रखें नमक को ज्यादा मात्रा में इस्तेमाल करने से ब्लड प्रैशर हृदय संबंधी रोग और लकवे का खतरा  बढ़ जाता है। साधारण नमक के बजाय आयोडीन युक्त नमक इस्तेमाल करें बाहर तैयार होने वाले फास्ट फूड, पिज्जा, बर्गर, सैण्डविच आदि में भी अधिक मात्रा में नमक का उपयोग किया जाता है, जो सेहत के लिए नुकसानदायक है। चिप्स,जंक फूड, अचार, पापड़ और भुजिया के बढ़ते सेवन के कारण लोग हर रोज 15 – 20 ग्राम से अधिक नमक पर्योग कर रहे हैं जबकि हमें  केवल तीन से पांच ग्राम अथवा एक चम्मच नमक की जरुरत होती है।अधिक नमक शरीर के लिए घातक है।  इसे कम मात्रा  में ही लें। गर्भावस्था में कम नमक का सेवन करें अधिक नमक खाने से अधिक प्यास लगती है, व शरीर नमकीन पसीना बाहर फेंकता है जिससे  शरीर की क्षमता कम हो जाती है व बीमारियां  जैसे जुकाम,रक्तचाप , गंजापन ,अनिद्रा ,वात रोग ,मोटापा आदि घेर लेती हैं।

ज्यादा नमक के खाने  से सेहत को होने वाले नुकसान से बचें और खाने का स्वाद भी सुधारे

1. यदि किसी सब्जी  में नमक ज्यादा पड़ गया हो, तो आधा चम्मत चीनी डालें।

2. क्रीम मिलाकर सब्जी का स्वाद बेहतर बनायें ।

3. सब्जी को फिर से उबालें,आलू के टुकड़े या आटे की गोलियां डालें। ये नमक को सोख  लेंगी । आलू और आटे की गोलियां निकाल लें। नमक ठीक  हो गया है अब खाइए और खिलाइए।

4.गले में खराश होने पर गुनगुने पानी में नमक घोलकर गरारे करने से खराश दूर होती है

विशेष :-नमक खाओ तो सेंधा

सेंधा नमक सफ़ेद और लाल रंग का होता  है । सफ़ेद रंग वाला नमक सबसे अच्छा  होता है। यह ह्रदय के लिये उत्तम, ठंडी तासीर वाला, पचने मे हल्का होता  है । इससे पाचक रस बढ़्ते हैं। रक्त दोष जिसमे नमक खाने को मना हो उसमे भी इसका उपयोग हो  सकता है। यह पित्त नाशक और आंखों के लिये हितकारी है  तथा  कृमि रोग और दस्त  मे काफ़ी उपयोगी होता है

काला नमक भी ह्रदय के लिये उत्तम, दीपन और पाचन मे मददगार तथा  वायुनासक  है । पेट फ़ूलने की समस्या मे मददगार है। इसके सेवन से डकार शुद्ध आती है कब्ज की समस्या मे इसका उपयोग होता है । काले नमक की तासीर ठंडी होती  है इसका प्रयोग एक रेचक और पेट की गैस और पेट की जलन व पाचन सहायक के रूप में किया जाता है। यह रक्तचाप और पेट की जलन को कम करने में मदद करता है।  हरड़ के बीजों का जो निर्माण प्रक्रिया के दौरान काला नमक का हिस्सा बन जाते हैं।

काला नमक बनाने की विधि

1.साजीखार और सेंधा नमक  सामान मात्रा मे लेकर पानी मे घोलें । पूरा पानी जलने तक धीमी आंच पर गर्म करे ।  जो बचेगा  वो ही  काला नमक है

2 .काला नमक को बनाने के लिए नमकीन पानी में हरड़ के बीज डाल कर उबाला जाता है, उबलने के बाद पानी तो भाप बन कर उड़ जाता है और शेष बचता है क्रिस्टलीय नमक, जिसका रंग काला होता है इसलिए इसका नाम काला नमक है। जब इसे पीसा जाता है तब इसका पाउडर गुलाबी हो जाता है।

 

RK Rao

मिर्च (Chilli)
April 3rd, 2011

मिर्च:-काली मिर्च ,लाल मिर्च, हरी मिर्च व शिमला मिर्च

लाल या हरी मिर्च लगभग पूरे भारत में पाई जाती है। यह कई किस्मों की होती है। मिर्च की 25 वैध किस्मे  है मुखत: मिर्च 3 -4 नामों से जानी जाती है काली मिर्च ,लाल मिर्च, हरी मिर्च व शिमला मिर्च मुख्य हैं।
हरी मिर्च की पत्तियों का रंग हरा, फल हरा व फूल सफेद रंग के होते हैं। पकने के बाद इसका रंग बदल कर लाल हो जाता है मिर्च का स्वाद तीखा होता है। भारतीय वैज्ञानिकों ने  पेप्रिका नाम से मिर्च की नई किस्म विकसित की है। यह तीखी नहीं होती तथा अपने प्राकृतिक रंग के कारण महिलाओं की सौंदर्य सामग्री एवं लिपस्टिक के निर्माण में विशेष योगदान देगी। मिर्च अब चेहरे की सुंदरता भी बढ़ाएगी। हरी मिर्च का अधिक मात्रा में उपयोग मसाने, फेफडे़ और पेट(आमाशय) के लिए हानिकारक होता है। लाल मिर्च 2 साल की उम्र के  बच्चों को नहीं दिया जाना चाहिए. बड़े बच्चों को कम  मात्रा में दिया जाना चाहिए।

विभिन्न रोगों में उपयोग

एक हरी मिर्च के बीज को निकालकर बुखार आने के दो घंटे पहले अंगूठे में पहनाकर बांध दें। इसी प्रकार दो से तीन बार बांधने से मलेरिया बुखार आना बंद हो जाता है। हरी मिर्च बांधने से जलन होती है। ध्यान रहे कि जितनी देर तक सहन हो सके इसे उतनी देर तक ही बांधें।
गठिया के दर्द को दूर करने के लिए लाल या हरी मिर्च को डंठल सहित पीसकर लेप करें।
आग से शरीर के जले हुए भाग पर हरी मिर्च को पानी में पीसकर लेप करने से आराम आता है।

 

काली मिर्च

काली मिर्च खाने में तो स्वाद बढ़ाने के लिए डाली जाती है और  त्वचा पर सफेद धब्बे  की बीमारी का इलाज होता  है  शोध के अनुसार तेज मिर्च खाने से ट्यूमर से छुटकारा मिल सकता है मिर्च में कैपसाइसिन नामक यौगिक मौजूद रहता है ।कारण ही मिर्च खाने पर मुंह में जलन झेलनी होती है। जिस से कैंसर की दवा बनाना सम्भव है कैपसाइसिन बिना साईड  इफेक्ट के ट्यूमर के आकार को 80% तक घटाने की छमता रखता है । खाने में  प्रोटीन और स्वादिष्ट खाने के बेहतरीन स्रोत है। यह वसा, कम करने  के लिए बहूत उपयोगी है भारतीय रसोई में जब चटपटा खाने की बात हो, या सलाद को जायकेदार बनाने की बात आये, तो काली मिर्च सबसे ऊपर रहती है। इसकी विशेष सुगन्ध रसोई घर को और डाइनिंग टेबल को भी महकाती है। यह देसी मसाला बहुत ब़डी औषधि का भी काम करता है। इसके प्रयोग से सांस की बीमारी, बुखार, खाँसी, पेट के रोग, पित रोग आदि में काफी मददगार है
देसी घी में काली मिर्च का चूर्ण मिलकर  दूध के साथ पिए  तो किसी कीड़े के कटाने से उठे  दाफड(चकतों) से आराम मिलेगा

उल्टी व जी मिचला रहा हो, तो नींबू के साथ काली मिर्च और सेंधा नमक लगाकर चूसने से जी मिचलाना बंद हो जाता है और उल्टी भी नहीं आती। कब्ज होने पर दूध के साथ काली मिर्च के चार-पाँच साबुत दाने रात को लेने से कब्ज में लाभ मिलता है।
यदि पेट में काँटा, काँच का टुक़डा चला जाये तो पके हुए अन्नानास के साथ काली मिर्च और सेधा नमक लगाकर खाने से पेट में गया हुआ काँच या काँटा निकल जाता है।
मलेरिया बुखार होने पर काली मिर्च व  तुलसी को साथ पिस कर  पीने से लाभ होता है।
काली मिर्च के चूर्ण को घी और मिश्री समान मात्रा में मिलाकर चटनी बनायें। सुबह-शाम एक-एक चम्मच लेने से फेफ़डें और सांस से संबंधित बीमारी में आराम मिलता है।
जुकाम में काली मिर्च का चूर्ण शहद में मिलाकर लेने से फायदा होता है।
छाछ या मट्ठे में काली मिर्च का चूर्ण मिलाकर पीने से पेट की बीमारियां दूर होती हैं और पेट के कीड़े भी नष्ट होते हैं।
हैजा की बीमारी में काली मिर्च हींग और अजवायन के साथ लेने से आराम मिलता है


लाल मिर्च रोक सकती है मधुमेह और दिल की बीमारी

यदि आप मधुमेह और हृदय रोग से दूर रहना चाहते हैं तो रोजाना उचित मात्रा में मिर्च का सेवन कीजिए.
पता चला है कि मिर्च से न सिर्फ जायका बढ़ता है बल्कि यह इंसान को स्वस्थ रखने में भी काफी मददगार है।
मिर्च में मधुमेह और हृदय रोगों को रोकने की क्षमता है ,रक्त में शर्करा को कम करने इंसुलिन का स्तर बनाए रखने तथा वसीय अम्लों को कम करने और रक्त के थक्के रोकने की क्षमता है मिर्च युक्त भोजन करने से रक्त शर्करा और इंसुलिन का स्तर संतुलित हो जाता है लाल  मिर्च अतिरिक्त कैलोरी को जलाने और शरीर की वसा और कोलेस्ट्रॉल को शुद्ध कर में मदद करता है।

लाल शिमला मिर्च खाइए और अपना बुढ़ापा भगाइए


अगर आपको अपना बुढ़ापा दूर भगाना है तो लाल शिमला मिर्च खाइए। अगर बैज्ञानिको की माने तो शिमला मिर्च के खास प्रजाति लाल शिमला मिर्च के खाने से बुढ़ापे को रोका जा सकता है । क्योकि इस मिर्च में एंटी आक्सीडेंट तत्व पाए जाते है । ये तत्व उम्र बढ़ने के साथ स्वास्थ्य पर पड़ने वाले नुकसान को रोकता है जिसके कारण अधिक उम्र के बाद भी शारीर पर बुढ़ापा दिखाई नहीं देता।
आम तौर आप शिमला मिर्च हरे रंग के बारे में ही जानते होगे। लेकिन शिमला मिर्च हरे रंग के आलावा लाल, सफ़ेद ,चाकलेटी,पिला रंग के भी होते है। इनमे लाल रंग आम आदमी के शेहत के लिए बहुत लाभकारी है। इसके उपयोग करने से इन्सान के चेहरे पर उम्र की शीमा दिखाई नहीं देती है। क्योंकी इसमे पाए जाने एंटी आक्सीडेंट तत्व पाए जाते है जो उम्र के साथ शारीर पर होने  वाले हानिकारक तत्वों को रोकने में सहायक होता है।
सावधानी :- जब लाल मिर्च के साथ काम करे तो दस्ताने अवश्य पहनो,और अपनी आँखें कभी न छूये जब तक आपने अपने हाथ न धो लिया हो।

सेहत के लिए जरूरी है मिर्च

अगर आप अपना मोटापा कम करना चाहते हैं और इसके लिए किए गए आपके सभी उपाय बेकार हो चुके हैं तो मिर्च खाने से इसमें मदद मिल सकती है।
एक नए अध्ययन से पता चला है कि मिर्च मोटापा कम करने में मददगार हो सकती है। मिर्च शरीर में मौजूद प्रोटीन्स में कुछ लाभदायक परिवर्तन कर वसा से निपटने मदद करती है।  स्वास्थ्य के लिए घातक मोटापा मधुमेह, उच्च रक्तचाप, दिल के रोगों और स्वास्थ्य संबंधी अन्य परेशानियों से निपटने मदद करती है। यह अध्ययन बताता है कि मिर्च कैलोरी की मात्रा को कम करके, वसा ऊतकों को संकुचित करके और रक्त में वसा का स्तर कम करके मोटापे से ल़डने में मददगार हो सकती है। मिर्च के मोटापा विरोधी प्रभाव की दिशा में नई बहुमूल्य अंतर्दृष्टि मिली है।
शोध के मुताबिक मिर्च में डायबिटीज और हृदयरोगों को रोकने की क्षमता होती है। मिर्च में मौजूद कैप्साइसिन व डीहाइड्रोकैप्साइसिन नामक तत्वों में रक्त शर्करा (ब्लड शुगर या ग्लूकोज) को कम करने, इंसुलिन का स्तर सामान्य रखने, धमनियों की दीवारों पर जमने वाला वसा को घटाने व रक्त के थक्के-(ब्लड क्लॉट्स) को रोकने की क्षमता होती है।
लाल मिर्च अच्छे दिल के लिए यह एक टॉनिक है पाचन क्रिया और सुस्त आंत क्रिया में सुधार के लिए यह विशेष रूप से सर्दी और फ्लू ,के लिए लाल मिर्च मांसपेशियों और जोड़ों में दर्द का इलाज के लिए उपयोगी है

 

R K Rao

हस्त्मुद्राए,अक्कुप्रेशेर और स्वास्थ लाभ
March 19th, 2011

 

हस्त्मुद्राए

हस्त्मुद्राए और इनका स्वास्थ पर  प्रभावी लाभ

 

एक्यूप्रेशर एक  प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति  है जिस से सभी रोगों का इलाज आसानी से  किया जा सकता है। इस  पद्धति के अनुसार अनेक प्रकार के रोग बिना दवा के ही दूर किये जाते हैं क्योंकि रोगी की बीमारी को ठीक करने के प्राकृतिक गुण  मनुष्य के शरीर में ही मौजूद होती है।
इस  पद्धति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसका असर चमत्कारिक रूप से होता है। और एक्यूप्रेशर चिकित्सा पद्धति  पुराने से पुराने रोग कुछ ही समय में ठीक किये जा सकते हैं। इससे रोगी बिना किसी डॉक्टर और  खर्च के अपने रोग का इलाज स्वयं भी कर सकते हैं। इस पद्धति से किसी भी रोग का उपचार बिना किसी भी प्रकार की हानि के होता  है।

 

हमारा शारीर पञ्च तत्वों पृथ्वी ,जल ,वायु ,आकाश और अग्नि से बना है तथा सवस्थ शरीर के लिए  इन सब का संतुलित होना अत्यंत आवश्यक है  तथा इन का असंतुलित होने का अर्थ है की बिमारियों का आगमन होना और अगर इन तत्वों के असंतुलन को किसी  भी  तरह से संतुलित किया जाता है तो स्वास्थ पुन: लोटने लगता है इन तत्वों को संतुलित करने के लिए तरह तरह के तरीके जैसे दवाये प्राणायाम आसन भोजन  और दिन चर्या की नियमावली  आदि का प्रयोग किया जाता है और  इन की ही तरह से हाथ की विशेष  मुद्राओं के द्वारा भी इन को संतुलित किया जा सकता है कियोंकि हमारे शरीर में सेल्फ मैंटिनन्स  यानि स्वयं से सुधार की  प्रक्रिया का गुण होता हैं और रहस्यों से भरा  हुआ है  हमारा शरीर  इन हस्थ मुद्राओं को आदि काल में खोजा गया था  तथा चिकित्सको और ऋषि मुनियों ने भी अपनाया परखा व इनका प्रचार प्रसार भी  किया  आओ जाने की ये विशेष मुद्राएँ  किया है तथा ये किस तरह से कम करती है
हमारे हाथ की पांचो उंगलिया पञ्च तत्वों यानि  पृथ्वी ,जल, वायु ,आकाश और अग्नि का नेतृत्व करती है अंगूठा अग्नि तत्व से तर्जनी  वायु तत्व से , मध्यमा आकाश तत्व से , अनामिका  पृथ्वी तत्व से व कनिष्ठा  जल तत्व से  ऊर्जा प्राप्त करता है तथा सभी उँगलियों को आपस में फसा दे तो इससे प्राप्त होने वाली उर्जा सब तत्वों का मिश्रित रूप होता है
पद्मासन, स्वस्तिकासन, सुखासन या वज्रासन आदि में बठ कर  जैसे ही हम ये मुद्राएँ धारण करते हैं तो ये हस्त्मुद्राए अपना-अपना असर दिखाना शुरू कर देती हैं यह मन में भाव की मेरा  रोग ठीक हो रहा है इसके प्रभावी असर को  काफी बढा देता है ऐसी अनेक मुद्राएं हैं जिन्हें हम अपने जीवन में आराम से कर सकते हैं और अपने अनेक रोगों का उपचार  कर सकते हैं। यहां  कुछ मुद्राओं का वर्णन किया जा रहा है।
ज्ञान मुद्रा
इस मुद्रा में अंगूठे को तर्जनी अंगुली के सिरे पर लगाएं व बाकी तीनों अंगुलियां सीधी रखें। इस  मुद्रा  से एकाग्रता और  संकल्प शक्ति को बढावा मिलता  है। मस्तिष्क के स्नायु और स्मरण शक्ति,को बल मिलता है पढ़ाई में मन लगता है तथा  नींद न आने व सिर दर्द जैसी शिकायतें दूर होती हैं। इससे  क्रोध, चिड़चिड़ापन, तनाव, मन की चंचलता,व चिंता होने  जैसी बिमारियाँ दूर होती हैं और ध्यान में स्थिरता कायम होती हैं।
वायु मुद्रा

इस मुद्रा में तर्जनी अंगुली को मोड़कर अंगूठे के मूल में लगाकर हल्का सा दबाते है । बाकी अंगुलियां सीधी रहती है   वात रोगों में यह मुद्रा विशेष कर  लाभकारी है। इस मुद्रा से  पारकिंसन साइटिका, कमर का, गर्दन का जोड़ों का दर्द, , गठिया, लकवा, घुटने का दर्द दूर होता है।

आकाश मुद्रा

इस मुद्रा में मध्यमा अंगुली को अंगूठे के अग्रभाग से लगाकर बाकी अंगुलियों को सीधा करते है । यह मुद्रा कान के रोगों जैसे  बहरापन, कान में आवाजें आना आदि को ठीक करने में मदद कराती है और  हड्डियों को भी मजबूत बनाती है।
शून्य मुद्रा

इस मुद्रा में मध्यमा अंगुली को मोड़कर अंगूठे के मूल में लगाते है व  अंगूठे से दबा कर बाकी अंगुलियां सीधी रखते है । इस मुद्रा से कान की बीमारियां गले के रोग व थाइराइड  में लाभ होता है और दांत मजबूत होते हैं।
पृथ्वी मुद्रा

इस मुद्रा में अनामिका अंगुली को अंगूठे के अग्रभाग से लगाते है  बाकी अंगुलियां सीधी रखते है । यह मुद्रा  वजन को बढ़ाती है, शरीर में स्फूर्ति, कान्ति एवं तेज उत्पन्न करती है दुर्बलता को  दूर करती है  जीवनी  शक्ति का संचार करती है और पाचन तंत्र को मजबूत करती  है।
सूर्य मुद्रा
इस मुद्रा में अनामिका अंगुली को अंगूठे के मूल भाग में लगाकर अंगूठे से दबाते है और  बाकी सभी अगुलियों को सीधा रखते है ।
यह  मुद्रा मोटापा को कम करती है, वजन को घटाती  है, शरीर में शक्ति का संचार करके  उष्माँ को  बढ़ाती है और   शरीर को संतुलित करती है  कोलेस्ट्राल, मधुमेह व लीवर के रोगों में फायदा पहुंचाती है।
नोट: कमजोर व्यक्ति को यह  मुद्रा नहीं करनी चाहिए।
वरुण मुद्रा
इस मुद्रा में  कनिष्ठा अंगुली को अंगूठे के अग्रभाग पर लगाते है  बाकी सभी अंगुलियों को सीधा रखते है।
इस मुद्रा से त्वचा सम्बन्धी रोग चर्म रोग, रक्त सम्बन्धी रोग दूर होते  है इस से  शरीर का  रूखापन दूर होता त्वचा  मुलायम व चमकदार होती है, यह चेहरे की सुन्दरता को भी  बढ़ती है।
नोट: कफ प्रकृति वाले व्यक्तियों को यह अभ्यास अधिक नहि करना चाहिए।
अपान मुद्रा
इस मुद्रा में मध्यमा तथा अनामिका अंगुलियों को अंगूठे के अग्रभाग से लगाते है तथा सभी  बाकी अंगुलियों को सीधा रखते है ।
इस से  कब्ज, मधुमेह, किडनी विकार, वायु दोस नाड़ी दोष तथा बवासीर ठीक  होती ती है , रोम छिद्र को खोल कर यह  शरीर की सफाई कर ती है पसीना भी लाती है। मूत्र का अवरोध दूर होता है और  दांतों को  मजबूत भी करती है।
नोट: यह मुद्रा मूत्र अधिक लाती है।
हृदय मुद्रा
इस मुद्रा में तर्जनी अंगुली को अंगूठे के मूल में लगाते है व  मध्यमा व अनामिका अंगुलियों को अंगूठे के अग्रभाग पर लगाकर छोटी अंगुली को सीधा करते है।

नाम से ही जाहिर है इससे हृदय मजबूत होता है, दिल का दौरा पड़ते ही इसको करने से आराम मिलता है, पेट , गैस, सिरदर्द, अस्थमा व उच्च रक्तचाप व फेफड़ो में लाभकारी है। व इसे करने से सांसे  नहीं फूलती।

प्राण मुद्रा
अनामिका तथा कनिष्ठा अंगुलियों को अंगूठे के अग्रभाग पर लगाकर यह मुद्रा बनती है बाकी दोनों अंगुलियों को सीधा रखते हैं।

यह शरीर की कमजोरी को दूर करती है  मन को शान्त करती है, यह शरीर प्रतिरोधक शक्ति, नेत्र ज्योति  को बढ़ती है, इस से थकान दूर होती है, आंखों व त्वचा  को निर्मल होती है, विटामिन की कमी को दूर होती है।

लिंग मुद्रा
दोनों हाथों की अंगुलियों को आपस में फंसाकर बांधकर बाएं हाथ के अंगूठे को खड़ा करके यह मुद्रा बनती है।

खांसी,सर्दी, जुकाम,  अस्थमा, निम्न रक्तचाप को दूर करती है और शरीर की गर्मी को बढ़ाती है, कफ साफ करती है
आवश्यक सुचना  : यह मुद्रा अनायास न करें आवश्यकता पड़ने पर ही करें

Yoga – Accupressure & Its Benefits – Baba Ramdev

एक्यूप्रेशर एक  प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति  है जिस से सभी रोगों का इलाज आसानी से  किया जा सकता है। इस  पद्धति के अनुसार अनेक प्रकार के रोग बिना दवा के ही दूर किये जाते हैं क्योंकि रोगी की बीमारी को ठीक करने के प्राकृतिक गुण  मनुष्य के शरीर में ही मौजूद होती है।
इस  पद्धति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसका असर चमत्कारिक रूप से होता है। और एक्यूप्रेशर चिकित्सा पद्धति  पुराने से पुराने रोग कुछ ही समय में ठीक किये जा सकते हैं। इससे रोगी बिना किसी डॉक्टर और  खर्च के अपने रोग का इलाज स्वयं भी कर सकते हैं। इस पद्धति से किसी भी रोग का उपचार बिना किसी भी प्रकार की हानि के होता  है।

योग अक्कुप्रेशेर और इसके प्रभावबाबा राम देव

Acupressure and its benefits Swami  Ramdev

योग अक्कुप्रेशेर और इसके प्रभाव स्वामी रामदेव

Demonstrating the benefits of Acupressure.

अक्कुप्रेशेर और इसके प्रभावों के बारे में दिखा कर समझा रहे हैं

It is a most effective tool for Your health.

यह आपके स्वस्थ के लिए  अत्यंत महत्वपूर्ण किर्याये है

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यह शारीर के रोगों का उपचार में सहायक है इन्हें आजमाइए और इनके प्रभाव देखिये

R K Rao